पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Aghora -Anka - Ankusha अघोर - अंक - अंकुश

अघोर

टिप्पणी : शुक्ल यजुर्वेद १६.२ में रुद्र के अघोर तनु का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त, अथर्ववेद ७.६२.१, १४.२.१२ तथा १४.२.१७ में अघोर चक्षु होने का उल्लेख है। बृहज्जाबालोपनिषद १.५ में अघोर से क्रमशः वह्नि, विद्या, रक्तवर्णा सुरभि व गोमय भस्म उत्पन्न होने का उल्लेख है। नारद पूर्वतापिन्युपनिषद १.३ में अघोर को ओंकार की अकारादि मात्राओं में मकार कहा गया है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

अंक

टिप्पणी : अथर्ववेद १.१२.२ के आधार पर प्रतीत होता है कि शरीर के अंगों में ज्योति उत्पन्न होने पर किसी प्रकार के अंक/चिह्न/लक्षण उत्पन्न होते हैं। ऋग्वेद ४.४०.४ के अनुसार दधि बिखेरने वाले अश्व के पथ में अंक बिखेरते हैं? ऋग्वेद १.१६२.१३ में भी अंकों को अश्व का भूषण कहा गया है। अथर्ववेद ७.१२०.१ में अलक्ष्मी नाश के लिए अयोमय अंक का उपयोग किया जाता है। ऋग्वेद ३.४५.४ में इन्द्र से कहा गया है कि वह अंकी की भांति वृक्ष के पक्व फल को धुनकर वसु ग्रहण करे।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

अंकुश

टिप्पणी : ऋग्वेद ८.१७.१० में इन्द्र के अंकुश के दीर्घ होने व वसु प्रदान करने की कामना की गई है। ऋग्वेद १०.१३४.६ में दीर्घ अंकुश से मन को वश में करने वाली शक्ति प्राप्त करने का उल्लेख है। ऋग्वेद १०.४४.९ में सुकृत रूपी अंकुश से हाथियों आदि को पीडित करने का उल्लेख है। अथर्ववेद ६.८२.३ में बृहद् हिरण्यय अंकुश से उत्पन्न जाया को प्राप्त करने का उल्लेख है। मुक्तिकोपनिषद २.४४ में चित्त रूपी हाथी पर जय प्राप्त करने के लिए अध्यात्म विद्या, साधु संगति, वासना त्याग आदि युक्तियों को अंकुश कहा गया है।