पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

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अद्रि

टिप्पणी : कर्मकाण्ड में यज्ञ में सोमलता को पीसने वाले उपकरणों जैसे उलूखल व मुसल, दृषद व उपल आदि को अद्रि कहते हैं। अद्रि शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से ऋग्वेद में एकवचन और बहुवचन में बहुलता से हुआ है। सायणाचार्य ने वेद भाष्य में अद्रि की एक निरुक्ति अद् धातु से की है जिसके अनुसार अद्रि का अर्थ शत्रुओं का भक्षण करने वाला इन्द्र का वज्र है। दूसरी निरुक्ति दॄ धातु से की गई है जिसका अर्थ है कि जो जल का वर्षण न करता हो, उसे रोके रखने में समर्थ हो अर्थात् मेघ। अद्रि का तीसरा अर्थ गिरि लिया जाता है क्योंकि यज्ञ में सोम को पीसने के लिए पत्थरों का ही उपयोग होता है।यज्ञ में पत्थर को वृषभ की त्वचा पर रखकर उस पर सोम पीसते हैं। अतः ऋग्वेद ९.६६.२९ तथा ९.७९.४ में उल्लेख है कि सोम गौ की त्वचा के ऊपर अद्रियों से क्रीडा करता है। अध्यात्म में इसका रूप यह है कि भक्त को अद्रि बनना चाहिए अर्थात् ऊपर से क्षरित होने वाले इन्दु/बिन्दु रूपी सोम को धारण करने में समर्थ होना चाहिए, उसको व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए, उसका यज्ञ कार्य में समुचित उपयोग करना चाहिए(ऋग्वेद ९.१०१.२)। इस प्रकार भक्त सोम को एकत्रित करने वाले एक पात्र के समान हो जाता है जिसके पेंदे में सोम भरा रहता है(शुकल यजुर्वेद १३.४२)। यह सोम को धारण करना व्यर्थ नहीं है। इस अवस्था में इसको शुद्ध करना होता है, शुद्ध करने के पश्चात् भगवान् को अर्पित करना होता है(ऋग्वेद १.१३५.२)। ऋग्वेद की १.११८.३ व ३.५३.१० इत्यादि कुछ ऋचाओं में उल्लेख है कि अद्रियों के द्वारा श्लोक उत्पन्न करना होता है, अर्थात् हमारी सभी इन्द्रियां भगवान् की स्तुति करने लगें। ऋग्वेद ९.४.५ के अनुसार तो यह सारी शरीर ही जब बृहद् अद्रि बन जाए, तभी इन्द्र सोम का भक्षण स्वीकार करते हैं।

     एक बार अद्रि अवस्था प्राप्त हो जाए तो उस अद्रि को तोडने की, उसके अन्दर छिपी हुई गायों को, जिन्हें पणि नामक असुरों ने अथवा बल नामक असुर ने वहां छिपा दिया है, प्राप्त करने की आवश्यकता होती है(तुलनीय : पुराणों में बलाक असुर का पिता अद्रि)। इस संदर्भ में ऋग्वेद १.६२.३ इत्यादि के अनुसार बृहस्पति अद्रि को तोडकर उसमें से गाय प्राप्त कर लेते हैं। दूसरी ओर, इन्द्र के लिए कहा गया है कि वह अद्रिवः होकर गायों को व्रज से बाहर निकाल और राधा आनन्द की सृष्टि करे(ऋग्वेद १.१०.७ इत्यादि)। सायणाचार्य ने अद्रिवः का अर्थ अद्रि अर्थात् वज्र से युक्त इन्द्र किया है।

     जब अद्रि में निहित सोम को प्राप्त करना होता है तो ऋग्वेद ८.६०.१६ के अनुसार अग्नि तप व शोचि/किरणों के द्वारा अद्रि का भेदन करता है। ऋग्वेद १.९३.६ के अनुसार श्येन अद्रि से सोम का आहरण करने में समर्थ होता है। ऋग्वेद की सार्वत्रिक ऋचा १.७.३ के अनुसार अद्रि को तोडने के लिए इन्द्र ने स्वर्ग में सूर्य तक आरोहण किया और वहां से गौ/किरणों के द्वारा अद्रि को तोडा। ऋग्वेद ५.५२.९ के अनुसार ओज द्वारा अद्रि को तोडते हैं। ऋग्वेद में जब बहुवचन में अद्रि शब्द का प्रयोग होता है तो वह गौ त्वचा पर सोम को शुद्ध करने तथा श्लोक उत्पन्न करने के लिए प्रयुक्त होता है। जब अद्रि शब्द एक वचन में प्रयुक्त होता है तो उसके द्वारा शुद्ध किया गया सोम इन्द्र को प्रस्तुत करने लायक होता है(ऋग्वेद ७.२२.१)। यहां अद्रि को हर्यश्व संज्ञा दी गई है। गायों और सोम को भी एकवचन वाले अद्रि से ही प्राप्त किया जाता है। अथर्ववेद ९.४.५ में शरीर को बृहत् अद्रि कहा गया है। ऋग्वेद ३.३१.७ के अनुसार अद्रि अपने अन्दर से एक गर्भ को उत्पन्न करता है। शुक्ल यजुर्वेद १३.४२ में आपः को नदियों का शिशु कहा गया है जो अद्रिक बुध्न/पेंदे में रहता है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

अद्रिका

टिप्पणी : केसरी वानर की भार्याओं अञ्जना वानरी और अद्रिका मार्जारी के संदर्भ में, संन्यासोपनिषद २.१०२ में उल्लेख है कि प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है वानरी और मार्जारी। मार्जार शब्द को मृज धातु से मर्जन करने वाला, शुद्ध करने वाला कह सकते हैं। प्रवृत्ति अर्थात् भक्ति, संसार को भागवत सत्ता से पूर्ण देखने की प्रवृत्ति। ऐसी कल्पना की जा सकती है कि अञ्जना वानरी प्रवृत्ति में जो कुछ भी भला-बुरा है, वह सब भगवान् को अर्पण कर देना होता है। लेकिन अद्रिका मार्जारी प्रवृत्ति का मार्ग इसमें विश्वास नहीं करता। वह मूषक रूपी किसी भी बुराई के मार्जन में विश्वास रखता है। दोनों प्रवृत्ति मार्ग अपूर्ण हैं। अतः अञ्जना-पुत्र हनुमान अद्रिका मार्जारी को ढोकर गौतमी में स्नान कराते हैं, जबकि अद्रिका-पुत्र अद्रि अञ्जना को ढोकर गौतमी में स्नान कराता है। अद्रि पिशाच का अर्थ है बुराईयों को खाने वाला, पिशं अञ्चति इति पिशाचः।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.