पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Angada अङ्गद

अङ्गद

टिप्पणी : वैदिक साहित्य में अङ्गद जैसा कोई शब्द नहीं है. व्याकरण के नियमों के अनुसार अगद शब्द से अङ्गद शब्द की व्युत्पत्ति होती है। गद का साधारण अर्थ रोग होता है और रोग से मुक्ति पाना अगद कहलाता है। योग कीभाषा में गद का अर्थ होगा गद्गद हना, गुदगुदी उत्पन्न होना। इस गुदगुदी से मुक्त होना अगद प्राप्त करना है। अगद शब्द अथर्ववेद तथा पैप्पलाद संहिता के कईं मन्त्रों में प्रयुक्त हुआ है जहां अग्नि, सोम, ओषधियों आदि से अगद प्रदान करने की प्रार्थना की गई है। लेकिन यह अगद किस प्रकार प्राप्त होगा, यह प्रक्रिया अङ्गद के चरित्र के माध्यम से पौराणिक साहित्य में ही उद्घाटित की गई है। अङ्गद वालि का पुत्र है। वाल का अर्थ है शरीर में सूक्ष्म बालों की तरह फैली हुई ऊर्जा जो गुद्गुदी उत्पन्न करती है। यदि इस शक्ति का सम्यक् उपयोग न किया जाए तो यह आसुरी शक्ति बन जाती है(आश्वलायन श्रौत सूत्र ३.१०.३१), रोग बन जाती है, उन्मत्तता उत्पन्न करती है(पैप्पलाद संहिता ५.१७.६)। अगद प्राप्त करने के लिए इस वाल शक्ति का संयोग तारा से, विज्ञानमय कोश की शक्ति से करना होता है। तब अङ्गद का जन्म होता है। बाजूबन्द आदि आभूषण को भी अंगद कहा जाता है। जो शक्ति पहले बिखरी पडी थी, अब यह आभूषण बन गई है। इसी कारण से वाचस्पत्यम् शब्दकोश आदि में अङ्गद शब्द की निरुक्ति अंगं दायते इति, अर्थात् अङ्ग का शोधन करने वाले के रूप में की गई है। पद्म पुराण में अङ्गद दवारा राम को ताम्बूल व कर्पूर भेंट करना भी इसी लक्ष्य का द्योतक हैं। जब अङ्गों से कर्पूर की सुगन्ध उठने लगे तो वह अङ्गद काकार्य समझना चाहिए।

     रामायण में सुग्रीव द्वारा अङ्गद को दक्षिणापथ में सीता की खोज का कार्य सौंपा जाता है। कात्यायन श्रौत सूत्र १२.२.१८ के अनुसार अगद प्राप्त करना, दक्षता प्राप्त करना, यह दक्षिणापथ का कार्य है। यह असुरों से संघर्ष है। जब असुरों से संघर्ष समाप्त हो जाएगा, तब अङ्गद का क्या होगा? रामायण ७.१०२ में वर्णन आता है कि लक्ष्मण-पुत्र अङ्गद को कारुपथ में स्थित अङ्गदीया पुरा का राजा बनाया गया। यह कारुपथ उत्तर का मार्ग है(कारु स्तुति को कहते हैं)। ऐसा अनुमान है कि संहिताओं और श्रौत सूत्रों में जहां सोम से अगद प्रदान करने की प्रार्थना की गई है, वह कारुपथ का प्रतिनिधित्व करता होगा।

     लोक में प्रचलित कथा के अनुसार रावण की सभा में अङ्गद द्वारा स्थापित पद को विचलित न कर सकने के तथ्य को ब्रह्माण्ड पुराण में ध्रुव-पिता अङ्गद के उल्लेख से समझा जा सकता है। अङ्गद स्थिति स्वयं ही ध्रुवता की स्थिति है। अङ्गद द्वारा रावण-सेनानियों प्रजङ्घ, महोदर आदि के वध के संदर्भ में शरीर के विभिन्न अङ्गों में उत्पन्न होने वाले रोगों के वर्णन के रूप में अथर्ववेद का सूक्त ९.१३ उल्लेखनीय है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

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