पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Adhvaryu - Adhvaa अध्वर्यु - अध्वा

अध्वर

टिप्पणी : जिस यज्ञ में असुरों की हिंसा की आवश्यकता न रह गई हो, उसे अध्वर कहते हैं। - फतहसिंह

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

अध्वर्यु

टिप्पणी : उणादि कोश के अनुसार अध्वर्यु का अर्थ होता है अध्वर से जोडने वाला। यज्ञ कर्म में अध्वर्यु ऋत्विज के महत्त्व को समझने के संदर्भ में प्राणाग्निहोत्र उपनिषद ४ में उल्लेख है कि आध्यात्मिक यज्ञ में आत्मा यजमान है और अहंकार अध्वर्यु है लेकिन इस कथन की वैदिक साहित्य में अन्यत्र पुनरुक्ति नहीं हुई है। संभवतः शतपथ ब्राह्मण ३.७.१.३० में अध्वर्यु द्वारा यूप शकल की आहुति के द्वारा अहंकार की व्याख्या की जा सकती है। शतपथ ब्राह्मण १.५.१.२१, ४.६.७.२० तथा १२.१.१.४ में अध्वर्यु को मन कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण ११.२.७.३२ के अनुसार यजमान संवत्सर है जिसका ऋतु रूपी ऋत्विज यजन करते हैं। इन ऋतुओं में ग्रीष्म ऋतु अध्वर्यु है(हेमन्त होता आदि)। वह यजमान का तापन करती है। बृहदारण्यक उपनिषद ३.१.४ के अनुसार चक्षु अध्वर्यु है जिसकी सहायता से यजमान अहोरात्र की आप्ति से मुक्त होता है। चक्षु रूपी अध्वर्यु ही आकाश का आदित्य है। तैत्तिरीय आरण्यक १०.६४.१ तथा गोपथ ब्राह्मण २.५.४ के अनुसार आत्मा यजमान है, श्रद्धा पत्नी, - - - - चक्षु अध्वर्यु, मन ब्रह्मा इत्यादि। षड्-विंश ब्राह्मण २.५.२ में तीन सवनों में अध्वर्यु के तीन रूप कहे गए हैं। प्रातः, माध्यन्दिन और सायं सवनों में यजमान क्रमशः प्राण, अपान और उदान रूप है जबकि अध्वर्यु क्रमशः आदित्य, चक्षु व अपान का रूप है(अग्नि, वाक्, प्राण क्रमशः होता)।

तैत्तिरीय आरण्यक ३.२.१ में चार, पांच, छह और सात होताओं के अन्तर्गत क्रमशः द्यौ, अश्विनौ, वात और सत्यहवि को अध्वर्यु कहा गया है। गोपथ ब्राह्मण १.१.१३ तथा १.२.२४ में प्रजापति के यज्ञ में वायु को अध्वर्यु(अग्नि होता, आदित्य उद्गाता आदि) कहा गया है जिसका आयतन अन्तरिक्ष है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.३.९.१२ के अनुसार यज्ञ का अध्वर्यु होने का अधिकारी वह है जो यज्ञ को जोड सकता हो। वात द्वारा अध्वर्यु यज्ञ को जोड सकता है(प्रयुंक्ते)। वायु के अध्वर्यु होने का क्या निहितार्थ हो सकता है, इस हेतु महाभूत पर टिप्पणी पठनीय है।

    वैदिक साहित्य में अश्विनौ के अध्वर्यु-द्वय होने का प्रायः उल्लेख आता है। इस कथन से अध्वर्यु की प्रकृति के विषय में क्या ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। अश्विनौ द्वारा यज्ञ के शिरः के स्थापन का उल्लेख आता है। इस संदर्भ में यह कथन महत्त्वपूर्ण है - स होवाच। शिरो वा एतद्यज्ञस्य। यद् व्रतम्। आत्मा दीक्षा। एतत् खलु वै व्रतस्य रूपम्। यत् सत्यम्। एतद्दीक्षायै। यत् श्रद्धा। मनो यजमानस्य रूपम्। वाग् यज्ञस्येति॥माश १२.८.२.४॥ स यत् वाचा व्रतमुपैति। आत्मन्येवैतद्यज्ञस्य शिरः प्रतिदधाति। सत्यं श्रद्धायां दधाति। यजमानं यज्ञे॥माश १२.८.२.५

     अध्वर्यु को चक्षु कहने का तात्पर्य कर्मकाण्ड में अध्वर्यु द्वारा दो बैलों(अनड्वान्) की अनः/शकट पर सोमलता को लादकर वेदीस्थल तक लाने के प्रकरण से समझा जा सकता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.३.७.५ के अनुसार जैसे अनः या रथ को जोडते हैं, ऐसे ही अध्वर्यु यज्ञ को जोडता है। अथर्ववेद ७.५५.५ तथा ११.६.१३ के अनुसार अनड्वान प्राण को कहते हैं जिसके दो रूप होते हैं प्राण और अपान। यही गाडी के दो बैल हैं। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.९.३ तथा गोपथ ब्राह्मण १.२.११ के अनुसार प्राणापानौ अध्वर्यु-द्वय हैं। शतपथ ब्राह्मण ४.२.५.३, ५.५.१.११ तथा १२.७.३.२२ के अनुसार प्राणोदानौ(प्राण-उदान) अध्वर्यु-द्वय हैं। पुराणों में शिव के गण नन्दी को भी अनड्वान कहा जाता है। नन्दी की प्रकृति भी यही है कि वह एक भी है, दो भी। यह श्वास-प्रश्वास का रूप है जो साधना के एक स्तर पर पहुंचने पर आनन्द उत्पन्न करने लगता है अन्दर जाता हुआ श्वास भी आनन्द देता है, बाहर निकलता हुआ श्वास भी। ऋग्वेद ८.२४.१६ में इसे मधु कहा गया है जिसकी प्राप्ति अध्वर्यु अन्धस् सोम से करता है। जैसा कि अन्तरिक्ष शब्द की टिप्पणी में कहा गया है, प्राण का आयतन अन्तरिक्ष होता है क्योंकि वायु अन्तरिक्ष में ही होती है। शरीर में अन्तरिक्ष का सर्वोच्च स्थान भ्रूमध्य होता है। यह ॐ रूपी वायु है, तीसरा चक्षु है। इसके विकसित होने पर अन्तरिक्ष अन्धकारमय नहीं रहता, अपितु ज्योति से पूर्ण हो जाता है। जैमिनीय ब्राह्मण २.२०२ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण १.८.२.३ के अनुसार अग्निष्टोम यज्ञ में अध्वर्यु को दक्षिणा स्वरूप प्रकाश-द्वय(होता को रुक्म आदि) मिलते हैं। यह प्रकाश-द्वय चक्षु-द्वय के सूर्य और चन्द्रमा रूप हो सकते हैं। अथर्ववेद ७.७७.५, तैत्तिरीय आरण्यक ५.५.३ तथा शतपथ ब्राह्मण १४.१.३.३३ में प्रवर्ग्य कर्म के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि चक्षु के विकास से पूर्व घर्म/गरमी उत्पन्न होती है जिसमें रुचि/दीप्ति उत्पन्न करना अध्वर्यु का कर्तव्य है। चक्षु रूपी प्रकाश के उत्पन्न होने के पश्चात् इस ज्योति को आकाश में प्रतिष्ठित करना होता है। अध्वर्यु यजमान रूपी सूर्य के तेज का क्रमशः विकास करता है। उस सूर्य को आकाश में विचरण करने योग्य, पतन रहित, १२ मास के १२ सूर्यों और १३वें मास के सूर्य को धारण करने वाला, चन्द्रमा, नक्षत्रों और ऋतुओं को धारण करने वाला बनाता है(अपश्यं गोपामनिपद्यमानं इत्यादि तैत्तिरीय आरण्यक ४.७.१ तथा ५.६.११)।

     प्राणापानौ के अध्वर्यु-द्वय होने के उपरोक्त वर्णन के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद २.१४ आदि सूक्तों में अध्वर्यु शब्द का प्रयोग बहुवचन में हुआ है। सायण भाष्य में अध्वर्यवः शब्द की व्याख्या यज्ञ के १० चमसाध्वर्युओं के द्वारा की गई है जो यज्ञ में ऋत्विजों के पात्रों का मार्जन आदि कर्म करते हैं। दूसरी संभावना यह है कि अध्वर्यु ऋत्विज के सहायकों के रूप में प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा और उन्नेता ऋत्विजों का नाम आता है। वह अध्वर्यवः हो सकते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में जब भी अध्वर्यु-द्वय(अध्वर्यू) शब्द की व्याख्या करनी होती है तो वह अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता द्वारा की जाती है। प्रतिप्रस्थाता में कुछ आसुरी पक्ष होता है(काठक संहिता २७.५)। वह यजमान-पत्नी के साथ गार्हपत्य अग्नि पर रहता है, जबकि अध्वर्यु यजमान के साथ आहवनीय अग्नि पर बैठता है। अध्वर्यु का कार्य जहां यजमान रूपी सूर्य को आकाश में प्रतिष्ठित करना होता है, प्रतिप्रस्थाता का कार्य यजमान-पत्नी को १० दिशाओं में व्याप्त होने वाली बनाना होता है। तैत्तिरीय आरण्यक में प्रवर्ग्य कर्म के अन्तर्गत वर्णन आता है कि यज्ञ की वेदी रूपी यजमान-पत्नी विस्तीर्ण चेतना को प्राप्त करके उत्तरवेदी बन जाती है। यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद ६.४१.२ तथा ८.४.११ ऋचाओं की व्याख्या सायण भाष्य में अध्वर्यु के हविर्धान स्थान से उत्तरवेदी को जाने के द्वारा की गई है। पुराणों में यजमान रूपी सूर्य और यजमान-पत्नी रूपी वडवा के उत्तरवेदी में पहुंचने पर अश्विनौ के जन्म का सार्वत्रिक वर्णन आता है। ब्राह्मण ग्रन्थों जैसे शतपथ ब्राह्मण ४.१.५.१५ १२.८.२.२२, जैमिनीय ब्राह्मण ३.३७४ तथा ऋग्वेद १०.४१.३ १०.५२.२ में अश्विनौ को देवताओं के अध्वर्यु-द्वय कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण आदि में च्यवन-सुकन्या आख्यान द्वारा यह भी वर्णन किया गया है कि अश्विनौ देवताओं के अध्वर्यु कैसे बने। ऋग्वेद १०.४१.३ की ऋचा में अश्विनौ को मधु पाणि वाला कहा गया है जो देवताओं को सोम प्रस्तुत करते हैं। तैत्तिरीय संहिता ६.४.३.१ के अनुसार ऐसे अध्वर्यु का चुनाव करना चाहिए जो सब देवताओं को सोम प्रस्तुत कर सके। इस प्रकार अध्वर्यु हृदे त्वा इत्यादि मन्त्र से मनुष्यों को, मनसे त्वा इत्यादि से पितरों को तथा दिवे त्वा सूर्याय त्वा इत्यादि मन्त्र से देवों को सोम प्रस्तुत करता है। इस प्रकार अध्वर्यु के तीन रूप हैं जिनमें देव रूप अश्विनौ के माध्यम से स्पष्ट हो जाता है। मन से पितरों को प्रस्तुति के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण १.५.१.२१ आदि में अध्वर्यु को मन कहा गया है(वाक् होता)। इसके अतिरिक्त, यज्ञ कर्म में अध्वर्यु बहुत से कार्य मन से करता है(उदाहरण के लिए, आश्वलायन श्रौत सूत्र ८.१३.२०)। शतपथ ब्राह्मण ४.६.७.२० के अनुसार मन अध्वर्यु पुर की भांति विचरण करता है। हो सकता है कि यह पुराणों में अग्निष्टोम यज्ञ में पुलस्त्य(पुरस्त्यान, पुर का विस्तार) ऋषि को अध्वर्यु बनाने की व्याख्या हो। पुराणों में पुलस्त्य ऋषि की उत्पत्ति उदान प्राण से होने के तथ्य को भी व्याख्या करते समय ध्यान में रखना आवश्यक है।

     मनुष्य कोटि के अध्वर्यु के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण १.८.१.२७ में कहा गया है कि जो गौ का वत्स बनना जानता है, वह दैविक अध्वर्यु है, अन्य अध्वर्यु मानुषी हैं। कर्मकाण्ड में अध्वर्यु सोम विक्रयी से गौ के बदले सोमलता का क्रय करता है(शतपथ ब्राह्मण ३.३.३.३ तथा तैत्तिरीय संहिता ६.१.१०.१)। सोमविक्रयी अपने सोम की महिमा का वर्णन करने में असमर्थ होता है, जबकि अध्वर्यु को गौ के अंग-अंग की महिमा का ज्ञान होता है जिसका वह सोमविक्रयी को लालच देता है। अन्त में अध्वर्यु सोम भी प्राप्त कर लेता है और गौ भी अपने और यजमान के लिए रख लेता है। शतपथ ब्राह्मण १४.३.१.३३ में प्रवर्ग्य कर्म की दक्षिणा के रूप में अध्वर्यु द्वारा घर्मदुघा(गौ) प्राप्त करने का उल्लेख है। यह ध्यान देने योग्य है कि पुराणों में अध्वर्युओं के रूप में जिन ऋषियों का नाम आया है, उनमें जमदग्नि, वसिष्ठ और गौतम गौ रखने वाले हैं, जबकि विश्वामित्र गौ प्राप्ति का यत्न करते हैं। गौ के वत्स का कार्य गौ को पयःदान के लिए केवल प्रेरित करना होता है। पयः का उपयोग यजमान आदि यज्ञ कार्य में करते हैं। कर्मकाण्ड में ओ श्रावय बोलकर विराज गौ का आह्वान करते हैं, अस्तु श्रौषट् से वत्स के बन्धन खोलते हैं, यज से स्तनों को वत्स के मुख में देते हैं आदि आदि। इस वाक्य समूह में ओ(ओम) श्रावय तथा यज यह आदेश अध्वर्यु के लिए होता है जिससे वह पुरोवात(ओ श्रावय) और विद्युत(यज) का मन से ध्यान करता है। अन्य आदेश अन्य ऋत्विजों के लिए होते हैं(शतपथ ब्राह्मण १.५.२.१९, ३.३.७.३? तथा काण्व शतपथ २.४.४.९)। जब विद्युत उत्पन्न होती है तो यह अभ्र/बादलों और पुरोवात का एकीकरण कर देती है। अन्त में वषट्कार बोलने पर वर्षा होती है। ऋग्वेद ७.१०३.८ में अध्वर्युओं की तुलना मण्डूकों से की गई है जो घर्म से पीडित होकर वर्षा की कामना करते रहते हैं।

     अध्वर्यु के उल्लेखनीय कार्यों में से एक है दिव्य जल या सोम को ग्रहों/पात्रों में ग्रहण करना, उसका मार्जन करना और उसे यजमान के लिए प्रस्तुत करना(ऋग्वेद सूक्त २.१४ १०.३०, १.१३५.६, ३.४६.५, ८.२४.१६, शतपथ ब्राह्मण १.३.३.१, २.६.१.१४, ३.५.२.४ तथा १३.२.७.१)। सोम को छानने वाली छलनी पवित्र के संदर्भ में आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १९.६.८ में उल्लेख है कि अध्वर्यु का पवित्र अज और अवि के लोमों से बना होता है, जबकि प्रतिप्रस्थाता का गौ और अश्व के लोमों से। अध्वर्यु पयः को छानता है, जबकि प्रतिप्रस्थाता सुरा को। ऐसा अनुमान है कि अध्वर्यु सोम को छानने का कार्य प्राणों अथवा वायुओं द्वारा करता है। ऋग्वेद २.१४ सूक्त की १२ ऋचाओं में इन्द्र द्वारा विभिन्न शत्रुओं के निग्रह के उल्लेखों के साथ-साथ अध्वर्युओं से भी इन्द्र के लिए सोम का सिंचन करने का अनुरोध किया गया है जिसका अर्थ होगा कि ब्राह्मण अध्वर्यु और क्षत्र इन्द्र दोनों को सोम प्रदान करने और ग्रहण करने के लिए तैयारी करनी पडती है।

     शतपथ ब्राह्मण ५.३.४.४ में राजसूय यज्ञ में यजमान के अभिषेक हेतु अध्वर्यु द्वारा आपः/जल की १६ प्रकार की ऊर्मियों के संग्रह का वर्णन है। उनके द्वारा वह यजमान का अभिषेक करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन ऊर्मि वाले जलों का सम्बन्ध ऋग्वेद १०.३० के सूक्त से है।

     अध्वर्यु की प्रकृति के बारे में कुछ प्रकाश होता और अध्वर्यु के सम्बन्धों के वर्णन से मिलता है। शतपथ ब्राह्मण १३.५.२.१२ में होता अध्वर्यु से पूछता है कि एकाकी विचरण कौन करता है? अध्वर्यु उत्तर देता है कि सूर्य एकाकी विचरण करता है। फिर अध्वर्यु होता से प्रश्न करता है कि सूर्य समान ज्योति कौन सी है? होता उत्तर देता है कि ब्रह्म ही सूर्य समान ज्योति है, इत्यादि। तैत्तिरीय संहिता ६.३.१.५ में होता को यज्ञ की नाभि कहा गया है।

     स्कन्द पुराण में त्रिशंकु के यज्ञ में विश्वामित्र के अध्वर्यु होने के संदर्भ में ऐसा कहा जा सकता है कि अध्वर्यु-द्वय का स्वरूप प्रायः प्राणापानौ का होता है जहां अपान का कार्य दुर्गुणों को, मल को निकाल फेंकने का है। शतपथ ब्राह्मण ५.५.१.११ में प्राणोदानौ को मित्रावरुण और अध्वर्यु-द्वय कहा गया है। ऋग्वेद ३.५.४ में उल्लेख है कि इषिर और दमूना(?) बनने पर अग्नि अध्वर्यु सिन्धुओं और पर्वतों का मित्र हो जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि उदान प्राण का विकास होने पर अध्वर्यु मित्र/विश्वामित्र बन जाता है। पुराणों में अध्वर्यु के रूप में प्रायः भृगु का उल्लेख आया है। जमदग्नि भी भार्गव गोत्रीय हैं। भृगु अर्थात् भून देने वाला, हमारे कर्मों को जला डालने वाला। भृगु की उत्पत्ति के संदर्भ में ब्राह्मण ग्रन्थों में उल्लेख आता है कि प्रजापति से उत्पन्न पहली ज्वाला तो आदित्य बन गई, दूसरी भृगु बनी और तीसरी अंगार/अग्नि। जैमिनीय ब्राह्मण ३.१८८ में गौर आंगिरस के अध्वर्यु होने का उल्लेख है। गोपथ ब्राह्मण १.२.९ का कथन है कि अग्नि, आदित्य और यम यह अङ्गिरस हैं। यह इदं सर्वं का समाप्नुवन करते हैं। दूसरी ओर, वायु, आपः व चन्द्रमा भार्गव हैं। यह इदं सर्वं का समाप्यायन करते हैं। पुराणों में भृगु ऋषि द्वारा सोते हुए विष्णु के वक्ष पर पदाघात करने और विष्णु द्वारा भृगु के पद को अपने हृदय में धारण करने का वर्णन आता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णन आता है कि जितने स्थान में विष्णु लेटकर सो गए, वह स्थान देवताओं के यज्ञ की वेदी हो गया। शेष स्थान असुरों को मिला। बाद में विष्णु ने अपने शरीर का विस्तार कर लिया और उन्होंने सारी पृथिवी को व्याप्त कर लिया। शतपथ ब्राह्मण ३.५.३.२१ में दक्षिण हविर्धान को टेक लगाते समय अध्वर्यु जिस मन्त्र का पाठ करता है, उसमें भी विष्णु के तीन उरुक्रमों का उल्लेख है। अतः यह विचारणीय है कि भृगु ऋषि विष्णु को यज्ञ रूपी वेदी का विस्तार करने के लिए किस प्रकार प्रेरित करते हैं।

     ब्राह्मण ग्रन्थों में अध्वर्युओं के जिन नामों का उल्लेख आया है, वह इस प्रकार हैं : ऐतरेय ब्राह्मण ७.१६ में हरिश्चन्द्र के राजसूय यज्ञ में जमदग्नि अध्वर्यु हैं तथा विश्वामित्र होता। अथर्ववेद १८.४.१५ में प्रेत कर्म के संदर्भ में अग्नि होता और बृहस्पति अध्वर्यु का उल्लेख है। जैमिनीय ब्राह्मण १.३६३ में सोमशुष्म गृहपतियों के सत्र में शितिबाहु ऐषकृत अध्वर्यु थे। जैमिनीय ब्राह्मण ३.२३४ में मेधातिथि गृहपतियों के सत्र में सनक-नवक अध्वर्यु-द्वय थे। शतपथ ब्राह्मण ११.४.२.१७ में अयःस्थूण गृहपतियों के सत्र में शौल्बायन अध्वर्यु थे।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

अध्वा

टिप्पणी : अध्वा मार्ग को कहते हैं। ऋग्वेद ३.३०.१२ में सूर्य के गमन मार्ग को अध्वा कहा गया है। वेदों के विभिन्न मन्त्रों में विभिन्न देवों, विशेषकर अग्नि से अध्वा को सुगमता से पार कर लेने की प्रार्थना की गई है। अग्नि इस अध्वा पथ को अच्छी तरह जानता है(ऋग्वेद ६.१६.३)। ऋग्वेद ८.३१.११ में पूषा देवता से इस उरु अध्वा में स्वस्ति के लिए धन आदि लाने की प्रार्थना की गई है। इस अध्वा को या तो रथ पर बैठकर पार किया जा सकता है(ऋग्वेद १०.५१.६) अथवा अश्व द्वारा। यह पथ कौन सा है, यह पुराण में ६ अध्वों के रूप में स्पष्ट किया गया है। यज्ञ में अध्वर्यु नामक ऋत्विज का लक्ष्य यजमान को अध्वा के पार कराना है, ऐसा प्रतीत होता है। अध्वर्यु को  षड्-विंश ब्राह्मण २.७ आदि में अपान कहा गया है। अतः यह कल्पना कर सकते हैं कि प्राण रूप में जो शक्ति प्राप्त हुई है, उसका जीवन रूपी यज्ञ में, अध्वा में सम्यक् उपयोग करने का, उसे अपान बनाने का, यज्ञ से असुरों को निकाल बाहर करने का कार्य अध्वर्यु का है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

अध्वर

१. अध्वरो वै यज्ञः । माश १, , , ; ,, ३८; ३९; ,; , ,, १०; ,, , १७;,,११ ।

२. अध्वर्तव्या वा इमे देवा अभूवन्निति तदध्वरस्याध्वरत्वम् । तैसं ३,,,३ ।

३. ते (असुराः)ऽध्वृतोऽयमभूदित्यपक्रामँस्तदध्वरस्याध्वरत्वम् । मै ३,,१० ।

४. तेऽसुरा अपक्रामन्तोऽब्रुवन्न वा इमे ध्वर्तवा अभवन्निति। तदध्वरस्याध्वरत्वम् । क ३६,४ ।

५. देवान्ह वै यज्ञेन यजमानान्त्सपत्ना असुरा दुधूर्षाञ्चक्रुः (= हिंसितुमिच्छां कृतवन्तः) ते दुधूर्षन्त एव न शेकुर्धूर्वितुं ते परा बभूवुस्तस्माद्यज्ञोऽध्वरो नाम । माश १,,,४०।

६. प्राणो (रसो [माश ७,,,६]) ऽध्वरः । माश ७,,,५॥

७. यज्ञो वा अध्वरः । काठ ३१,११; क ४७,११; तैआ ५,,६०।

अध्वर्यु

मित्रो अग्निर्भवति यत्समिद्धो मित्रो होता वरुणो जातवेदाः।
मित्रो अध्वर्युरिषिरो दमूना मित्रः सिन्धूनामुत पर्वतानाम्॥ऋ. ३.५.४

एदु मध्वो मदिन्तरं सिञ्च वाध्वर्यो अन्धसः ।
एवा हि वीर स्तवते सदावृधः ॥ऋ. ८.२४.१६

अध्वर्युं वा मधुपाणिं सुहस्त्यमग्निधं वा धृतदक्षं दमूनसम् ।
विप्रस्य वा यत्सवनानि गच्छथोऽत आ यातं मधुपेयमश्विना ॥ऋ. १०.४१.३

अहं होता न्यसीदं यजीयान्विश्वे देवा मरुतो मा जुनन्ति ।

अहरहरश्विनाध्वर्यवं वां ब्रह्मा समिद्भवति साहुतिर्वाम् ॥ऋ. १०.५२.२

तप्तो वां घर्मो नक्षतु स्वहोता प्र वामध्वर्युश्चरतु पयस्वान् ।
मधोर्दुग्धस्याश्विना तनाया वीतं पातं पयस उस्रियायाः ॥अ. ७.७७.५

प्रोक्षणीरध्वर्युरादत्ते । स इध्ममेवाग्रे प्रोक्षति कृष्णोऽस्याखरेष्ठोऽग्नये
त्वा जुष्टं प्रोक्षामीति तन्मेध्यमेवैतदग्नये करोति – माश १.३.३.[१]

प्रोक्षणीरध्वर्युरादत्ते । स इध्ममेवाग्रे प्रोक्षत्यथ वेदिमथास्मै बर्हिः प्रयच्छन्ति तत्पुरस्ताद्ग्रन्थ्यासादयति तत्प्रोक्ष्योपनिनीय विस्रंस्य ग्रन्थिं न प्रस्तरं गृह्णाति सकृदु ह्येव पराञ्चः पितरस्तस्मान्न प्रस्तरं गृह्णाति - २.६.१.[१४]

शफेन ते क्रीणानीति । भूयो वा अतः सोमो राजार्हतीत्याह सोमविक्रयी भूय एवातः सोमो राजार्हति महांस्त्वेव गोर्महिमेत्यध्वर्युरेतान्येव दशवीर्याण्युदाख्यायाह पदा तेऽर्धेन ते गवा ते क्रीणामीति क्रीतः सोमो राजेत्याह सोमविक्रयी वयांसि प्रब्रूहीति – माश ३.३.३.[३]

प्रोक्षणीरध्वर्युरादत्ते । स पुरस्तादेवाग्रे प्रोक्षत्युदङ्तिष्ठन्निन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात्पात्वितीन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्ताद्गोपायत्वित्येवैतदाह - ३.५.२.[४]
अथ पश्चात्प्रोक्षति । प्रचेतास्त्वा रुद्रैः पश्चात्पात्विति प्रचेतास्त्वा रुद्रैः पश्चाद्गोपायत्वित्येवैतदाह - ३.५.२.[५]
अथ दक्षिणतः प्रोक्षति । मनोजवास्त्वा पितृभिर्दक्षिणतः पात्विति मनोजवास्त्वा पितृभिर्दक्षिणतो गोपायत्वित्येवैतदाह - ३.५.२.[६]
अथोत्तरतः प्रोक्षति । विश्वकर्मा त्वादित्यैरुत्तरतः पात्विति विश्वकर्मा त्वादित्यैरुत्तरतो गोपायत्वित्येवैतदाह - ३.५.२.[७]

अथोत्तरेण पर्येत्याध्वर्युः । दक्षिणं हविर्धानमुपस्तभ्नाति विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं - - - -अथ प्रतिप्रस्थाता । उत्तरं हविर्धानमुपस्तभ्नाति दिवो वा विष्ण उत वा पृथिव्या - - -माश ३.५.३.२१

स यत्रैतां होतान्वाह। अप्नस्वतीमश्विना वाचमस्मे इति तदध्वर्युरुपोत्तिष्ठन्नाह रुचितो घर्म इति स यदि रुचितः स्याच्छ्रेयान्यजमानो भविष्यतीति विद्यादथ – माश १४.१.३.३३

विशीर्ष्णा वै यज्ञेन यजध्व इति कथं विशीर्ष्णेत्युप नु नौ ह्वयध्वमथ वो वक्ष्याव इति तथेति ता उपाह्वयन्त ताभ्यामेतमाश्विनं ग्रहमगृह्णस्तावध्वर्यू यज्ञस्याभवतां तावेतद्यज्ञस्य शिरः प्रत्यधत्तां तददस्तद्दिवाकीर्त्यानां ब्राह्मणे व्याख्यायते – माश ४.१.५.१५

विप्रुड्होमम् -- अथ स्तीर्णायै वेदेः । द्वे तृणे अध्वर्युरादत्ते तावध्वर्यू प्रथमौ प्रतिपद्येते प्राणोदानौ यज्ञस्य – माश ४.२.५.३

अथ यैषा मैत्रावरुणी पयस्या भवति । तस्यै वशा दक्षिणा - - - -तामध्वर्युभ्यां ददाति प्राणोदानौ वा अध्वर्यू प्राणोदानौ मित्रावरुणौ – माश ५.५.१.११

अध्वर्युश्च प्रतिप्रस्थाता च जघनेन वेदिं प्रांचमावृत्तं यजमानं श्येनपत्राभ्यामूर्ध्वं चावांचं च पावयतः। प्राणोदानयोस्तत् रूपम्। माश १२.७.३.२२

आश्विनमध्वर्यवो भक्षयन्ति। अश्विनौ वै देवानामध्वर्यू। स्वमेवैतत् भागधेयं स्व आयतने भक्षयन्ति॥१२.८.२.२२

नियुक्तेषु पशुषु प्रोक्षणीरध्वर्युरादत्तेऽश्वं प्रोक्षिष्यन्नन्वारब्धे यजमान आध्वरिकं यजुरनुद्रुत्याश्वमेधिकं यजुः प्रतिपद्यते - १३.२.७.[१]

स होताध्वर्युं पृच्छति कः स्विदेकाकी चरतीति तं प्रत्याह सूर्य एकाकी चरतीति - १३.५.२.[१२]
अथाध्वर्युर्होतारं पृच्छति किं स्वित्सूर्यसमं ज्योतिरिति तं प्रत्याह ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिरिति - १३.५.२.[१३]

अथ यैषा घर्मदुघा। तामध्वर्यवे ददाति तप्तऽइव वै घर्मस्तप्तमिवाध्वर्युर्निष्क्रामति तस्मात्तामध्वर्यवे ददाति – माश १४.३.१.[३३]

 यत् कलया ते शफेन ते क्रीणानीति पणेतागोअर्घम्̇ सोमं कुर्याद् अगोअर्घं यजमानम् अगोअर्घम् अध्वर्युम् । तैसं ६.१.१०.१

त एतम् आदित्यास् सद्यःक्रीयं यज्ञं समभरन्। ते ऽब्रुवन्न् अग्ने - - - -तेषां नस् त्वं होतासि, गौर् आंगिरसो ऽध्वर्युर्, बृहस्पतिर् उद्गाता, अयास्यो ब्रह्मेति सर्वान् अवृणत। सो ऽब्रवीद् - दूतो वा अहं चरामीति। - जैब्रा ३.१८८

अध्वर्यू वृणीते ऽतिच्छन्दसं तच्छन्दसां वृणीते – काठ २६.९

चत्वारो वरा देया ब्रह्मण उद्गात्रे होत्रे अध्वर्यवे एते ह यज्ञस्येन्द्राः – काठ ३५.१६

दैवी ऋत्विजः – अग्निर्होता, आदित्यो अध्वर्युः, चन्द्रमा ब्रह्मा - - - ष ३.३.२

पञ्च होता – अग्निर्होता, अश्विनावध्वर्यू – तैआ ३.३.१

प्राणो अध्वर्युरभवत् इदँ सर्वँ सिषासताम् । अपानो विद्वानावृतः प्रति प्रातिष्ठदध्वरे । तै.ब्रा. ३.१२.९.

यथानो वा रथं वा युञ्ज्यात् एवमेव तदध्वर्युर्यज्ञं युनक्ति - तैब्रा. ३.३.७.

स त्वा अध्वर्युः स्याद् यो यथासवनम् प्रतिगरे छन्दाम्̇सि सम्पादयेत् तेजः प्रातःसवन आत्मन् दधीतेन्द्रियम् माध्यंदिने सवने पशूम्̇स् तृतीयसवन इति । - तैसं ३.२.९.२

१. होतर्यज पोतर्यज नेष्टर्यज ॥ इति सा सह वषट्कारेणाहवनीयं गच्छति, तां पुरोऽध्वर्युर्विभजति ॥ होतर्यज पोतर्यज नेष्टर्यज ॥ इति अध्वर्युः पुरो वाचं विभजति, मैत्रावरुणः पश्चात् । मै ,,

२. अध्वर्युणा दक्षिणाः (स्वर्गं लोकं यन्ति) । मै ४,,८।

३. अध्वर्युणा वै यज्ञो विधृतः । मै ३,,१०।।

प्राणापानाभ्याम् एवाध्वर्युर् आध्वर्यवं करोति - - - -मनसैव ब्रह्मा ब्रह्मत्वं करोति
मनसा हि तिर्यक् च दिश ऊर्ध्वं यच् च किं च मनसैव करोति तद् ब्रह्म – गो १.२.११

४. पृथिव्य् एव भर्गो ऽन्तरिक्ष एव महो द्यौर् एव यशो ऽप एव सर्वम् - - -होतैव भर्गो ऽध्वर्युर् एव मह उद्गातैव यशो ब्रह्मैव सर्वम् , वाग् एव भर्गः प्राण एव महश् चक्षुर् एव यशो मन एव सर्वम्  । गो ,,१५ ।।

५. अध्वर्युर्वै श्रेयान् पापीयान् प्रतिप्रस्थाता । काठ २७,; क ४२,५।

६. अध्वर्योर्लोके तिष्ठञ्जुहोति । काठ २७,६ ।।

७. अश्वं ब्रह्मणे इन्द्रियमेवावरुन्धे। अनड्वानध्वर्यवे , वह्न्येव यज्ञस्यावरुन्द्धे(धेनुर्होत्रे, आशिषमरुन्धे) । काठ ८,८, तै १.१.६.

८. अन्तराहवनीयं च हविर्धानं चाध्वर्योर्लोकः (अन्तरा हविर्धानं च सदश्च यजमानस्य, सदः सदस्यानां ) । मै ,,

९. अपानो मेऽध्वर्युः (तृतीयसवने प्राणो होता, उदानो यजमानः) । ष २,७ ।।

१०. प्रावेपा अर्यमा इव ह्यध्वर्युः । मै ,,।।

पृथिवी होता , द्यौरध्वर्युस्त्व,ष्टाग्नीत् , मित्र उपवक्ता , - - - अग्निर् होता , अश्विनाध्वर्यू , रुद्रो अग्नीत् , बृहस्पतिरुपवक्ता , - - - -महाहविर् होता , सत्यहविरध्वर्युर, चित्तपाजा अग्नीत् , अचित्तमना उपवक्ता , अनाधृष्यश्चाप्रतिधृष्यश्चाभिगरौ - मै १.९.१

११. अश्विनावध्वर्यू (°नाऽध्वर्यू ।मै.J) । मै ,,; ,, ; काठ ९,; ऐ १,१८; गो २,,; तै ३,,,; माश १,,,१७; ,,,; तैआ ३,,१ ।

१२. असावध्वर्युः (द्यौः) । तैसं ३,,,६ ।।

१३. आदित्यो मेऽध्वर्युः (प्रातःसवने अग्निर्होता, प्राणो यजमानः)। ष २,५।।

१४. आश्विनौ वाऽअध्वर्यू । काठ २८,; क ४४,५ । ।

१५. एतम् (आत्मानमादित्यम्) अग्नावध्वर्यवः (मीमांसन्ते) । शांआ ८,४।

१६. ग्रहानध्वर्युस्स्पाशयेत । काठ ३५,१६ ।।

१७. चक्षुर्मे अध्वर्युः (माध्यन्दिनसवने – वाङ होता, अपानः यजमानः) ष २,

१७. चक्षुर् अध्वर्युः । कौ १७,; गो २,,; तैआ १०, ६४ ।।

१८. तद्वा अध्वर्योः स्वं यदाश्रावयति, - - तद्वा अध्वर्योः स्वं यद्वायव्यम् । मै ,,

१९. तमेतमग्निरित्यध्वर्यव उपासते । यजुरित्येष हीदं सर्वं युनक्ति । माश १०,,,२०

२०. अध्वर्युः प्रथमो युज्यते। तस्य प्रातस्सवनम् आयतनम्। अथ होता। तस्य माध्यंदिनं सवनम् आयतनम्। अथोद्गाता। तस्य तृतीयसवनम् आयतनम्।। जै ,३४३

२१. तावध्वर्यू प्रथमौ प्रतिपद्येते प्राणोदानौ यज्ञस्य । माश ४२,,३ ।

२२. द्यौरध्वर्युः । मै १,,; । काठ ९,; तैआ ३,,१।।

२३. राजसूये अभिषेकः – पर्णमयेन अध्वर्युरभिषिञ्चति ब्रह्मवर्चसमेवास्मिन्त्विषिं दधाति(औदुम्बरेण राजन्यः, आश्वत्थेन वैश्यः)। तै ,, ,

२४. पशवो हाध्वर्युमनु । ष २,८ ।

२५. पूर्वार्धो वै यज्ञस्याध्वर्युर्जघनार्धः पत्नी । माश ,,,

२६. प्रतिगरोऽध्वर्यूणाम् । तैसं ३,,,६ ।।

२७. मध्यं वा एतद्यज्ञस्य यद्धोता मध्यत एव यज्ञं प्रीणाति अथाध्वर्यवे प्रतिष्ठा वा एषा यज्ञस्य यदध्वर्य्युः । तै ,,,१०

२८. प्रतीच्यध्वर्योः ( प्राची दिग्घोतुर्दक्षिणा ब्रह्मणः) । माश १३,,,२४

२९. प्राकाशावध्वर्यवे ददाति - - -अनड्वाहमग्नीधे वह्निर्वा अनड्वान्  । तैसं ,, १८, , तै १.८.२.३

३०. प्राचीनं वै धिष्ण्येभ्योऽध्वर्योर्लोकः (यत् प्राचीनं धिष्ण्येभ्यस्तद्देवानां , यत् प्रतीचीनं तन्मनुष्याणां । मै ,, १०।।

३१. प्राणापानावेवाध्वर्य्यू । गो १, ,१०; माश ५,,,११ ।।

३२. प्राणो यज्ञस्य (अध्वर्युः) । जै १,८५।।

मनो वा अध्वर्युर्वाग्घोता तन्मनश्चैवैतद्वाचं च संदधाति माश १.५.१.२१

३३. अथाध्वर्युं प्रतिप्रस्थाता दीक्षयति। मनो वा अध्वर्युः। वाग् होता। - माश १२.१.१.५

मन एव यजूंषि स य ऋचा च साम्ना च चरन्ति वाक्ते
भवन्त्यथ ये यजुषा चरन्ति मनस्ते भवन्ति तस्मान्नानभिप्रेषितमध्वर्युणा किं चन क्रियते यदैवाध्वर्युराहानुब्रूहि यजेत्यथैव ते कुर्वन्ति - माश ४.६.७.१९

३४. इयम् वै होतासाव् अध्वर्युः ।  - - - -यत् तिष्ठन् प्रतिगृणात्यमुष्या (दिवः) एव तदध्वर्युर्नैति, तिष्ठतीव ह्यसौ (द्यौः) । - - -यद् आसीनः शम्̇सति तस्माद् इतःप्रदानं देवा उप जीवन्ति यत् तिष्ठन् प्रतिगृणाति तस्माद् अमुतःप्रदानम् मनुष्या उप जीवन्ति
यत् प्राङ् आसीनः शम्̇सति प्रत्यङ् तिष्ठन् प्रतिगृणाति तस्मात् प्राचीनम्̇ रेतो धीयते प्रतीचीः प्रजा जायन्ते  तैसं ,,,६-७ ।।

३५. यत् प्रयाजेष्वनिष्टेषु प्राङङ्गारस्स्कन्देदध्वर्यवे च यजमानाय चाकं  स्यात् । काठ ३५, १८; क ४८,१६ ।।

३६. यद्धोतारं वृणीते जगतीं तद् वृणीते, यदध्वर्युं पङ्क्तिं तत् , यदग्नीधमतिछन्दसं तत् , यन् मैत्रावरुणं गायत्रीं तत् , यद् ब्राह्मणाञ्शँसिनं त्रिष्टुभं तत् , यत् पोतारं उष्णिहं तत् , यन् नेष्टारं ककुभं तत् , यदाह । मै ,,।।

३७. राज्यं वा अध्वर्युः । तै ३,,,१ ।

३८. अश्वं ब्रह्मणे इन्द्रियमेवावरुन्धे धेनुँ होत्रे आशिष एवावरुन्द्धे अनड्वा-
हमध्वर्यवे वह्निर्वा अनड्वान् वह्निरध्वर्युः  । तै ,,,१०

३९. तस्याग्निर् होतासीत् , वायुर् अध्वर्युः, सूर्य उद्गाता, चन्द्रमा ब्रह्मा, पर्जन्यः सदस्यः, ओषधिवनस्पतयश् चमसाध्वर्यवः, विश्वे देवा होत्रकाः, अथर्वाङ्गिरसो गोप्तारस्। गो ,,१३ ।।

वाग्घोता । दीक्षा पत्नी । वातोऽध्वर्युः । आपोऽभिगरः – तैआ ३.६.१

यजुर्विदम् एवाध्वर्युं वृणीष्व स ह्य् आध्वर्यवं वेद , वायुर् वा अध्वर्युः , अन्तरिक्षं वै यजुषाम् आयतनम् , वायुर् देवता त्रैष्टुभं छन्दो भुव इति शुक्रम् , तस्मात् तम् एवाध्वर्युं वृणीष्वेत्य् एतस्य लोकस्येत्य् एव – गो १.२.२४

४०. वायुर्वा अध्वर्य्युः (+ अधिदैवं प्राणोऽध्यात्मम् । गो १,,५ ]) गो १,,२४ ।

४१. सत्यहविरध्वर्युः । मै १,,; काठ ९,; तैआ ३,,१ ।।

४२. सामाध्वर्युः । मै १,,; तैआ २,१७, , ,,१ ।।

सिंहा अध्वर्युर् ध्यायति, व्याघ्रौ प्रतिप्रस्थाता, वृकौ यजमान , एषा सुरा भवति – मै २.३.९

४३. सिंहाध्वर्युर (+ मनसा [काठ.J) ध्यायति (°येत् ।काठ.J)(शार्दूलौ प्रतिप्रस्थाता)। मै २, ,; काठ १२,१० ।

 

अध्वर्युपात्र

अध्वर्युपात्रं वै यजमानस्य पात्रं प्रतिप्रस्थानं भ्रातृव्यस्य । मै ४, , २।।

अध्वर्यव

१. अश्विनाऽऽध्वर्यवम् । मै ४,१३,८ ।

२. यजुषाऽऽध्वर्यवं (क्रियते)। जै १,३५८ ।