पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Anguli अङ्गुलि

अङ्गुलि

टिप्पणी : अङ्गुलि शब्द के लिए अङ्कुर(ज्योति पुञ्ज का अङ्कुरण) शब्द पर विचार करना चाहिए। स्वयं वेदों में अङ्गुलि शब्द कम स्थानों पर आया है। लेकिन वैदिक निघण्टु में अग्रुवः आदि २२ नाम दिए गए हैं जो वेद में अङ्गुलि के वाचक हैं। शतपथ ब्राह्मण १.१.२.१६ में पांच अङ्गुलियों को पंक्ति छन्द का प्रतीक कहा गया है और पंक्ति छन्द पांच दिशाओं में साधना से सम्बन्धित है। इसके अतिरिक्त दस हाथों व १० पैरों की अङ्गुलियों को मिलाकर पुरुष में प्राणों की गणना १९, २१, २३, २५, २७, २९, ३१, ३३ रूपों में की गई है(शतपथ ब्राह्मण ८.४.३.१०)।

     पुराणों में अङ्गुलियों से सम्बन्धित वर्णन का आधार यह है कि वायु तत्त्व पर जय के पश्चात् अङ्गुलियों में प्राण, अपान, उदान, व्यान व समान वायुओं का विकास हो जाता है(द्र. शतपथ ब्राह्मण ८.१.३.८)। पुराणों में मङ्कणक ऋषि के हस्त से शाक रस स्रवित होने तथा तत्पश्चात् शिव द्वारा अङ्गुष्ठ व अङ्गुलि के ताडन से भस्म उत्पन्न करने की सार्वत्रिक कथा से यह संकेत मिलता है कि अङ्गुलियों में शक्ति का विकास होने से पूर्व हस्त से शाक रस/शक्ति का स्रवण होता है जो मदकारी है। इस मादक अवस्था को नियन्त्रित करने के लिए शक्ति का अङ्गुलियों में स्रवण कराना होता है(शतपथ ब्राह्मण ७.५.२.४४), उसे देवों को अर्पित करना होता है। अथर्ववेद ४.१४.७ तथा पैप्पलाद संहिता १.५२.९६ के अनुसार अज अवस्था वह होती है जहां अङ्कुरण न हो। ओदन उदान प्राण का रूप है। शतपथ ब्राह्मण ११.५.२.१ में चातुर्मास यज्ञ के संदर्भ में दक्षिण बाहु की कल्पना चातुर्मास यज्ञ के चार खण्डों वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेध व शुनासीर में से प्रथम वैश्वदेव के रूप में की गई है। इस यज्ञ से जो प्राप्ति होती है, उसे दक्षिण बाहु की पांच अङ्गुलियों में प्राप्त शक्ति/हवि के रूप में दिखाया गया है। अङ्गुष्ठ आग्नेय, तर्जनी सौम्य, मध्यमा सावित्र, अनामिका सारस्वत व कनिष्ठिका पूषा देवता सम्बन्धी हवि बनती है(हवि अर्थात् ऐसा अन्न, ऐसी ज्योति या शक्ति जिसे देवताओं को अर्पित किया जा सकता है)। इसके पश्चात् यज्ञ के दूसरे भाग वरुण प्रघास(शत्रु विनास से सम्बन्धित) को दक्षिण ऊरु कहा गया है जिससे हवि की प्राप्ति दक्षिण पाद की पांच अङ्गुलियों के रूप में होती है। यज्ञ के तीसरे भाग साकमेध (मरुतों व इन्द्र द्वारा मिल कर वृत्र का वध) की कल्पना उत्तर ऊरु के रूप में की गई है जिससे उत्तर पाद की पांच अङ्गुलियों का विकास हवि के रूप में होता है। यज्ञ के चतुर्थ भाग शुनासीर(श्री और सीर/रस का परस्पर योग) की कल्पना उत्तर बाहु के रूप में की गई है जिससे हवि की प्राप्ति उत्तर बाहु की पांच अङ्गुलियों के रूप में होती है। यह उल्लेखनीय है कि पुराणों में अङ्गुलियों का विशद वर्णन होने पर भी अङ्गुलियों में इतना स्पष्ट विभाजन दिखाई नहीं देता जितना चातुर्मास के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण में किया गया है। केवल स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में कमला देवी द्वारा हस्ताङ्गुलियों व उग्रा देवी द्वारा पादाङ्गुलियों की रक्षा के उल्लेख से चातुर्मास सम्बन्धी उपरोक्त वर्णन की पुष्टि होती है।

     स्कन्द पुराण अवन्तिका खण्ड में विष्णु की बाहु से उत्पन्न रुधिर का अङ्गुलियों द्वारा मन्थन के संदर्भ में अथर्वशिरोपनिषद ६.१४, वटुकोपनिषद ३१७.२० तथा गायत्री रहस्योपनिषद ४०५.५ में कहा गया है कि उच्छ्वास से तम होता है, तम से आपः, आपः का अङ्गुलियों द्वारा मन्थन करने पर शिशिर, शिशिर का मन्थन करने पर फेन, फेन से अण्ड, अण्ड से ब्रह्मा, ब्रह्मा से वायु, वायु से ओङ्कार, ओङ्कार से सावित्री, सावित्री से गायत्री और गायत्री से लोक। ऐसा प्रतीत होता है कि पुराण की कथा में जिस नर की उत्पत्ति कही गई है, वह नॄ नृत्य का, आनन्द का रूप है। तैत्तिरीय ब्राह्मण २.६.५.४ के अनुसार अङ्गुलियां मोद-प्रमोद हैं। यह मोद-प्रमोद प्रत्येक अङ्गुलि में अलग-अलग प्रकार का होता है(तैत्तिरीय संहिता ६.१.९.५)। दर्श-पौर्णमास यज्ञ के संदर्भ में कात्यायन श्रौत सूत्र ३.४.६ तथा आपस्तम्ब श्रौत सूत्र ३.२.३ में उल्लेख आता है कि होता ऋत्विज की अङ्गुलियों पर इडा पात्र रखते हैं। फिर अङ्गुलियों पर आज्य लगाकर उसे ओष्ठ से छूते हैं। इडा भी आनन्द का ही रूप है। यह संभव है कि पुराण कथा में जिस नर की उत्पत्ति कही गई है, वह अङ्गुष्ठ पुरुष का, ओङ्कार का, ओष्ठ का प्रतीक हो।

     अग्नि पुराण में तार्क्ष्य मुष्टि द्वारा विष के निराकरण के संदर्भ में अथर्ववेद २.३३.६ व २०.९६.२२  में अङ्गुलियों से यक्ष्मा को निकालने का, तथा अथर्ववेद ४.६.४, पैप्पलाद संहिता ५.८.३, १६.१४७.८ व १६.१४९.१ में हाथ व पैर की अङ्गुलियों से विष और दौर्भाग्य निकालने का उल्लेख है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह विष या यक्ष्मा अङ्गुलियों में शक्ति का सर्पण है। शांखायन ब्राह्मण १६.५ में सर्पि/घृत में आत्मा के दर्शन करके अङ्गुलियों से सर्पि का स्पर्श करने का उल्लेख भी इसी संदर्भ में हो सकता है। शतपथ ब्राह्मण ३.२.१.६ तथा ३.१.३.२५ आदि के अनुसार दीक्षा ग्रहण करते समय यजमान अङ्गुलियों का संकुचन करके जो मुष्टि बनाता है, वह गर्भ की अवस्था है, क्योंकि गर्भ में भी जन्तु की अङ्गुलियां मुष्टि रूप में होती हैं। इस प्रकार वह छन्दों में प्रवेश करता है। शतपथ ब्राह्मण ४.३.३.४ में अङ्गुलियों से वज्र का निर्माण किया गया है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण आदि में अभिनय कर्म और मुद्राओं के वर्णन में मुष्टि निर्माण के संदर्भ में इसी दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है। कथासरित्सागर में अङ्गुलीयक द्वारा विष के निरसन का वर्णन है जिसकी व्याख्या अपेक्षित है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.