पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Angiraa - Angushtha अङ्गिरा - अङ्गुष्ठ

Puraanic contexts of words like Angiraa, Anguli/finger, Angushtha etc. are described here.

अङ्गिरा कूर्म २.११.१२८( अङ्गिरा द्वारा भारद्वाज को ज्ञान दान ), गरुड ३.७.५५(अङ्गिरा द्वारा हरि-स्तुति), पद्म १.३४( ब्रह्मा के यज्ञ में उद्गाता ), ६.५७( अङ्गिरा द्वारा मान्धाता को पद्मा एकादशी व्रत का कथन ), ब्रह्म २.७४( अङ्गिरा की अग्नि से उत्पत्ति, आत्रेयी - पति, अङ्गिरस गण - पिता, पत्नी को परुष वचन बोलने के कारण पत्नी का परुष्णी नदी बनना ), ब्रह्मवैवर्त्त १.२२.८( अङ्गिरा की निरुक्ति ), २.५१.१६( सुयज्ञ नृप द्वारा अतिथि द्विज के तिरस्कार पर अङ्गिरा की प्रतिक्रिया ), ४.१८( सप्तर्षि - पत्नियों पर आसक्ति के कारण अग्नि को सर्वभक्षी होने का शाप, सप्तर्षि - पत्नियों को द्वापर में याज्ञिक द्विजों की पत्नियां बनने का शाप, पुन: वरदान ), ब्रह्माण्ड १.१.५.७५( अङ्गिरा का ब्रह्मा के शिर से प्राकट्य ), २.३.१.४०( ब्रह्मा द्वारा अङ्गारों पर शुक्र होम से अङ्गिरा की उत्पत्ति, अग्नि - पुत्र बनना ), भविष्य ३.४.२१.१४( अङ्गिरा का कलियुग में कण्व - पौत्रों के रूप में जन्म ), ४.९३( शुभा - पति, उतथ्य से श्रेष्ठता विषयक विवाद, सूर्य व अग्नि के कार्यों का प्रतिस्थापन, अग्नि का बृहस्पति रूप में पुत्र बनना ), भागवत ३.१२.२४( ब्रह्मा के मुख से अङ्गिरा की उत्पत्ति का उल्लेख ), ३.२४.२२( कर्दम - पुत्री श्रद्धा से परिणय ), ४.१.३४( अङ्गिरा द्वारा श्रद्धा से बृहस्पति, उतथ्य पुत्री व सिनीवाली, कुहू, राका व अनुमति कन्याओं की प्राप्ति ), ६.६.१९( अङ्गिरा का दक्ष - पुत्रियों स्वधा व सती से विवाह, स्वधा से पितरों की व सती से अथर्वाङ्गिरस वेद की पुत्रों के रूप में उत्पत्ति ), ६.१४+ ( राजा चित्रकेतु को पुत्रवान् होने का आशीर्वाद, पुत्र की मृत्यु पर राजा को वैराग्य का उपदेश ), ९.२.२६( संवर्त ऋषि - पिता ), ९.६.२( अङ्गिरा द्वारा रथीतर की भार्या से पुत्रों की उत्पत्ति ), मत्स्य ३.६( अङ्गिरा सहित सप्तर्षियों की ब्रह्मा से उत्पत्ति का क्रम ), १५.१६( हविष्मान् नामक पितरों के पिता ), १२६.१०( श्रावण - भाद्रपद मास में अङ्गिरा की सूर्य रथ पर स्थिति ), १४५.१०५( अङ्गिरा गोत्रीय मन्त्रकर्ता ३३ ऋषियों के नाम ), १६७.४३( मार्कण्डेय - पिता ), १९६( ब्रह्म के वीर्य के अग्नि में होम से अङ्गिरा की उत्पत्ति, वंश व गोत्र का वर्णन ), लिङ्ग १.२४.२३( चतुर्थ द्वापर में व्यास ), वराह २१.१५( दक्ष यज्ञ में अङ्गिरा के आग्नीध्र बनने का उल्लेख ), वामन २.१०( चन्द्रा - पति, दक्ष द्वारा यज्ञ में आमन्त्रण ), ५२.३१( अङ्गिरा द्वारा सप्तर्षियों की ओर से हिमालय को शिव - पार्वती विवाह का प्रस्ताव ), ८९.४६( अङ्गिरा द्वारा वामन को कौश चीर देने का उल्लेख ), वायु ६५.७८/२.४.७८( बृहदङ्गिरा : वरूत्री के ब्रह्मिष्ठ पुत्रों में से एक ), ६५.९७( अङ्गिरा वंश का वर्णन ), विष्णु १.११.४५( अङ्गिरा द्वारा ध्रुव को परमपद प्राप्ति के उपाय का कथन ), विष्णुधर्मोत्तर १.११२( सुरूपा - पति, १० अङ्गिरसों के पिता ), शिव २.२.३.५७( अङ्गिरा ऋषि से हविष्मन्त पितरों की उत्पत्ति का कथन ), ३.४.१७( चतुर्थ द्वापर में व्यास ), ५.३४.४७( दशम मन्वन्तर में सप्तर्षियों में से एक ), ५.३४.५१( ११वें मन्वन्तर में सप्तर्षियों में से एक ), ७.२.४.५०( गङ्गाधर शिव का रूप ), स्कन्द ३.१.४९.६८( अङ्गिरा द्वारा रामेश्वर की स्तुति ), ४.१.१८.२०( अङ्गिरा द्वारा हरिकेश वन में स्थापित अङ्गिरेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य ), ४.१.१९.१११( अङ्गिरा द्वारा ध्रुव को परम पद प्राप्ति हेतु कमलकान्त की आराधना करने का निर्देश ), ५.३.११२.२( अङ्गिरा द्वारा नर्मदा तट पर तप करके बृहस्पति/अङ्गिरस पुत्र प्राप्त करने का संक्षिप्त वर्णन ), ६.१८०( ब्रह्मा के यज्ञ में सुब्रह्मण्य ), ७.१.२१.५( अङ्गिरा द्वारा दक्ष से २ कन्याओं की प्राप्ति ), ७.१.२३( चन्द्रमा के यज्ञ में उन्नेता ), ७.३.४१.१८(अङ्गिरा को मार्कण्डेय बालक की अल्पायु का ज्ञान होना), हरिवंश २.१२२.३५( अङ्गिरा का कृष्ण से युद्ध, पराजय ), लक्ष्मीनारायण १.२५७.८५( अङ्गिरा द्वारा मान्धाता राजा को राज्य में वृष्टि हेतु एकादशी व्रत का परामर्श ), १.५४०.८१( अङ्गिरा द्वारा अन्य ऋषियों को राजा वृषादर्भि से प्रतिग्रह रूप में स्वर्ण - पूरित उदुम्बर स्वीकार न करने के लिए प्रेरित करना ), ३.३२.१०( अथर्वा अग्नि - पुत्र ),कथासरित् १४.१.२२( अश्रुता - पति अङ्गिरा मुनि की सावित्री पर आसक्ति के कारण पत्नी द्वारा आत्महत्या की चेष्टा ) angiraa

Remarks on Angiraa

 

अङ्गुल अग्नि २४.१( अग्नि कुण्ड निर्माण में खात, मेखला आदि के अङ्गुल मानों का वर्णन ), ४४( प्रतिमा के अवयवों का अङ्गुलि मान ), पद्म २.८.१४( गर्भ का २५ अङ्गुल विकास होने पर माता को प्रसव पीडा होने का उल्लेख ), ब्रह्माण्ड १.२.७.९६( अङ्गुल मान ), १.२.३२( प्रजा उत्सेध/ऊंचाई का अङ्गुल मान ), भविष्य १.१३२.७( आदित्य की ८४ अङ्गुल मान की मूर्ति में विभिन्न अङ्गों के अङ्गुल मान ), १.१४९.२( काल चक्र के ६४ अङ्गुल प्रमाण व ८ अङ्गुल नेमि आदि का उल्लेख ), २.१.१२.५( ८४ अङ्गुल प्रतिमा के विभिन्न अङ्गों के अङ्गुल मान ), २.१.१९.७( यज्ञ के स्रुवा आदि यज्ञ पात्रों के अङ्गुल मान ), २.१.२१.६८( अनन्त, वासुकि, तौलिक आदि नागों के अङ्गुल परिमाण का कथन ), मत्स्य १४५( विभिन्न युगों में अङ्गुल अनुसार शरीर परिमाण ), वायु ८.१०२( अङ्गुल मान ), ५९.६( शरीर का अङ्गुल परिमाण ), विष्णुधर्मोत्तर ३.३६.१( शरीर के अङ्गों के अङ्गुल परिमाण का वर्णन ) angula

Remarks on Angula

 

अङ्गुलि कूर्म २.१३.१५( अङ्गुष्ठमूल में ब्राह्म तीर्थ, तर्जनी मूल में पितृ तीर्थ, कनिष्ठिका मूल में प्राजापत्य तीर्थ, अङ्गुलि अग्र देवकामार्थ, मध्य अग्नि कर्मार्थ तथा मूल सोम कर्मार्थ होने का कथन ; आचमन कर्म में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों के संयोग से शरीर के अङ्गों के स्पर्श का वर्णन ), गरुड १.९.८( दीक्षा में गुरु के हस्त की पद्म के रूप में कल्पना करने पर अङ्गुलियों का पद्म - पत्र तथा नखों का केशरों के रूप में कथन ), ३.१३.२७(अङ्गुलि पर्वतों से ब्रह्मा द्वारा सृष्टि का कथन), देवीभागवत ११.१५.८२( ऊर्ध्वपुण्ड्र के संदर्भ में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों में गायत्री के अक्षरों का न्यास ), ११.२२.२७( प्राण, उदान आदि की आहुतियां देने में अङ्गुलियों का नियोजन ), नारद १.५०.८०( सामगान में अङ्गुलियों व अङ्गुष्ठ द्वारा स्वरों के निर्देश का वर्णन ), १.५०.१०३( सामगान में अङ्गुलियों में षडज आदि स्वरों की स्थिति ), १.५१.५५( मुद्राओं हेतु अङ्गुलि विन्यास का कथन ), पद्म ३.५२.१६( अङ्गुष्ठ मूल में ब्राह्म तीर्थ, अङ्गुष्ठ व प्रदेशिनी अङ्गुलि के बीच पितृ तीर्थ, कनिष्ठिका मूल में प्राजापत्य तीर्थ, अङ्गुल्यग्र में दैव, मूल में दैव - आर्ष व मध्य में आग्नेय तीर्थ की स्थिति ), ब्रह्म १.११३.९६( तर्जनी व अङ्गुष्ठ के बीच पितृतीर्थ, अङ्गुलि अग्र में दैव तथा कनिष्ठिका मूल में प्राजापत्य तीर्थों का उल्लेख ), २.२०.२२( गरुड का विष्णु की कराङ्गुलि के भार को वहन करने में असमर्थ होना, गर्व भङ्ग ), २.९३.३०( नृसिंह से अङ्गुलि की रक्षा की प्रार्थना ), ब्रह्मवैवर्त्त २.१६.१३६(रति के अङ्गुलीयक रत्न के हरण का उल्लेख), ३.४.४६( अङ्गुलियों के सौन्दर्य हेतु लक्ष अङ्गुलीयक दान का निर्देश ), ४.५९.४८(सावित्री के अङ्गुलीयक रत्नों की श्रेष्ठता का उल्लेख), ४.५९.५१(कुबेर पत्नी के पादाङ्गुलि भूषण की श्रेष्ठता का उल्लेख),  ४.९३.५३( राधा द्वारा उद्धव को रत्नसार निर्मित अङ्गुलीयक प्रदान करने का कथन ), ब्रह्माण्ड ३.४.२९.१२६( नरकासुर आदि के वध के लिए विष्णु का देवी की अनामिका के नख से उत्पत्ति का कथन ), भविष्य १.५.१४, १.५.४९( पाद व हस्त की अङ्गुलियों के शुभाशुभ लक्षण ), मत्स्य १८७.४२( बाण - पत्नी अनौपम्या की ननन्द कुम्भीनसी द्वारा सर्वदा अङ्गुलि भङ्ग कर्म करना ), मार्कण्डेय ८२.१५/७९.१५( अर्क के तेज से देवी की पादाङ्गुलियों व वसुओं के तेज से कराङ्गुलियों की रचना ), लिङ्ग १.९.४१( वायु तत्त्व पर विजय होने पर अङ्गुलि अग्र निपात द्वारा भूमि के कम्पन का उल्लेख ), १.२६.१३( अङ्गुलि के अग्र से देवों, कनिष्ठाङ्गुलि से ऋषियों और दक्षिणाङ्गुष्ठ द्वारा पितरों के तर्पण का उल्लेख ), १.८५.११४( मोक्ष, शत्रुनाश आदि लक्ष्यों के अनुसार माला जप में अङ्गुलियों का विनियोजन ), वराह ९८( सत्यतपा ऋषि की अङ्गुलि छिन्न होने पर रक्त के बदले भस्म निकलने का आश्चर्य ), वामन ३८.१५( शिव द्वारा अङ्गुष्ठ का अङ्गुलि से ताडन करके भस्म उत्पन्न करना और इस प्रकार हाथ से शाकरस स्रवण करने वाले मङ्कणक ऋषि को शान्त करना ), ६२.५०( वही), विष्णुधर्मोत्तर ३.२६.१३( अभिनय कर्म में अङ्गुलियों की विभिन्न मुद्राओं का वर्णन ), ३.३२.१+ ( विभिन्न हस्त मुद्राओं में अङ्गुलियों के विन्यास का वर्णन ), ३.२३३.१( अङ्गुलियों में दैव, पितृ व मानुष तीर्थों की स्थिति ), ३.२३८.२१( अङ्गुलियों द्वारा श्रोत्रों को बन्द करने पर शब्द श्रवण न होने पर सद्य: मरण का उल्लेख ), ३.३४१.१९३( पादाङ्गुलीयक दान से गुह्यकाधिपति बनने का उल्लेख; हस्ताङ्गुलीयक दान से सौभाग्य प्राप्ति ), शिव ७.२.१४.३९( माला जप में अङ्गुलि विशेष का महत्त्व : मोक्षप्रद, शत्रुनाशक, धनदायक, शान्तिदायक, क्षरणी आदि ), स्कन्द १.२.५५.११४( योगी द्वारा वायु तत्त्व की सिद्धि होने पर अङ्गुलि अग्र निपात से भूमि के कम्पन का उल्लेख ), ३.२.५.११०( अङ्गुलियों के अग्र, मध्य व मूल में दैव, प्राजापत्य व आर्ष तीर्थों की स्थिति आदि का उल्लेख ), ४.१.३५.७१( शौच/शुद्धि प्राप्ति हेतु विभिन्न कराङ्गुलियों के संयोग से शरीर के विभिन्न अङ्गों को स्पर्श करने का वर्णन ), ४.१.३५.१७८( तर्पण प्रसंग में अङ्गुलियों में स्थित तीर्थों के नाम ), ४.१.३७.८२( अङ्गुलियों की शुभ व अशुभ आकृतियों का उल्लेख ), ४.१.४०.११३( केवल अङ्गुलि द्वारा दन्त शोधन का निषेध ), ४.२.७२.६०( कमला देवी द्वारा हस्ताङ्गुलियों की रक्षा ), ४.२.७२.६२( उग्रा देवी द्वारा पादाङ्गुलियों की रक्षा ), ५.१.३.२१( शिव द्वारा कपाल में संगृहीत विष्णु के रुधिर का अङ्गुलि द्वारा मन्थन करने पर अन्त में नर/अर्जुन की उत्पत्ति ), ५.१.४.९०( रुद्र द्वारा अग्नि को दक्षिण हस्त की अङ्गुलि के नख में स्थान देना? ), ५.१.४९( शिव द्वारा छिन्न विष्णु की अङ्गुलि के रक्त से शिप्रा नदी का प्राकट्य ), ५.३.१९३.२६( अप्सराओं द्वारा नारायण के पादतल व अङ्गुलियों आदि में पिशाच, यक्ष, उरग व सिद्धों के दर्शन करने का उल्लेख ), ७.१.१७.१९( अङ्गुलि द्वारा दन्त शोधन का निषेध ), महाभारत आदि १३१.५९( एकलव्य द्वारा द्रोणाचार्य को अङ्गुष्ठ दान पर अङ्गुलियों से तीर चलाना ), वन ८३.१२५( शिव द्वारा स्व अङ्गुष्ठ का अङ्गुलि से ताडन करके शीतल भस्म उत्पन्न करना व हाथ से शाकरस स्रवित करने वाले मङ्कणक ऋषि को शान्त करना ), शल्य ३८.४८( वही), स्त्री १५.३०( गान्धारी द्वारा युधिष्ठिर की पादाङ्गुलियों पर दृष्टि डालने से नखों का काला पडना ), शान्ति २३६.२३( योगी द्वारा वायु तत्त्व की सिद्धि पर अङ्गुलि अङ्गुष्ठ मात्र से पृथिवी को कम्पित करने का उल्लेख ), योगवासिष्ठ १.२३.३५( काल की क्रिया रूपी अङ्गुलि ), ३.७०.३८( हस्ताङ्गुलियों में कर्कटी राक्षसी/विषूचिका के छिपने का स्थान ), वा.रामायण ४.४४.१२( अङ्गुलीयक : राम द्वारा अभिज्ञान हेतु हनुमान को अङ्गुलीयक देना ), लक्ष्मीनारायण १.२९.२( लक्ष्मी के पादाङ्गुष्ठों व अङ्गुलियों में शङ्ख, विमान, यव, कमल आदि चिह्नों का वर्णन ), १.६८.१०, १.६८.३०( पादों की अङ्गुलियों के श्लिष्ट होने व हाथों की अङ्गुलियों के सूक्ष्म आदि होने से श्रेष्ठता का उल्लेख ), १.६९.७( लक्ष्मी के पदों में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों में स्थित चिह्नों का कथन ), १.६९.३३( पाद की कनिष्ठिका या अनामिका द्वारा भूमि स्पर्श न होने पर स्त्री के कुलटा लक्षण का उल्लेख ), १.१५५.५४( अलक्ष्मी की जलौका सदृश अङ्गुलियों का उल्लेख ), १.४६१.३४( कुलटा या पतिहन्ता आदि नारी की पादाङ्गुलियों के लक्षण ), ३.१३०.८२( ३ प्रकार के चक्रों में अङ्गुलीयक चक्र का महत्त्व, अङ्गुलीयक रूपी चक्र दान विधि व माहात्म्य ), ३.१८६.६५( साधु की अङ्गुलियों में ग्रहों का वास ), कथासरित् २.२.५०( श्रीदत्त द्वारा दैत्य - कन्या से विष नाशक अङ्गुलीयक की प्राप्ति ), १२.५.६१( विनीतमति द्वारा कालजिह्व यक्ष से ईति नाशक अङ्गुलीयक की प्राप्ति ) anguli

Remarks on Anguli

 

अङ्गुष्ठ अग्नि २५.२५( अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों में श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि के न्यास का उल्लेख ), २५.२७( अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों में भुव:, स्व: आदि लोकों का न्यास ), २५.३२( दोनों कराङ्गुष्ठों में जीव का तथा बुद्धि, अहंकार, मन आदि ८ तत्त्वों का ८ अङ्गुलियों में न्यास ), २५.३६( अङ्गुष्ठ - द्वय में श्रोत्र तथा ८ अङ्गुलियों में त्वक्, चक्षु, जिह्वा आदि का न्यास ), २५.४०( अङ्गुष्ठ तथा अङ्गुलियों में मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन आदि का न्यास ), २५.४३( अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों में बुद्धि, अहंकार, मन, चित्त आदि का न्यास ), २९५.१५( सर्प दंश की चिकित्सा के संदर्भ में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों में क्रमश: पृथिवी आदि तत्त्वों का न्यास, तार्क्ष्य रूपी मुष्टि के निर्माण से अङ्गुष्ठ के विष का नाश होने का उल्लेख, तार्क्ष्य हस्त की अङ्गुलियों के चालन से विष का स्तम्भन आदि ), ३१०.३२( विभिन्न मुद्राओं में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों के विन्यास का वर्णन ), गरुड २.१०.७४(मृत्यु पश्चात् अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष के निष्क्रमण और पिण्डदान से अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष के एकता को प्राप्त होने का कथन), देवीभागवत ११.१५.८२( ऊर्ध्वपुण्ड्र/तिलक बनाने के संदर्भ में अङ्गुष्ठ व तीन अङ्गुलियों की क्रमश: विशेषता : पुष्टिकर, मुक्तिदायक, आयुष्य, अन्नदायक ), ११.१६.७९( अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों में गायत्री मन्त्राक्षरों के न्यास का कथन ), ११.२२.२७( प्राणाग्निहोत्र के संदर्भ में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों के संयोग से प्राण, उदान आदि की आहुतियों का कथन ), नारद १.२७.२०( शौच के पश्चात~ आचमन के संदर्भ में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों के परस्पर स्पर्श से स्वरों, मात्राओं, छन्दों आदि का कल्पन ), १.९१.५२( अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों में ईशान, तत्पnरुष, अघोर आदि का न्यास ), २.४५.२( गया में प्रेतशिला के अङ्गुष्ठ में स्थित ईश का प्रभासेश नाम, तत्स्थान पर पिण्ड दान के महत्त्व का कथन ), पद्म १.३०.१७५( विराट रूप धारी वामन के पादाङ्गुष्ठ से बलि के ब्रह्मरन्ध|/ब्रह्माण्ड के स्फोट व परिणामस्वरूप गङ्गा के उद्भव का वृत्तान्त ), ५.८०.१४( कृष्ण के चरणों में अङ्गुष्ठ मूल में चक्र, मध्यमाङ्गुलि मूल में कमल, कनिष्ठा मूल में वज्र, अङ्गुष्ठ पर्व में यव आदि चिह्नों का कथन ), ५.८१.४६( कृष्ण स्वरूप के ध्यान के संदर्भ में राधिका द्वारा अङ्गुष्ठ व तर्जनी से कृष्ण के मुखकमल में पूगफल आदि समर्पित करने का उल्लेख ), ६.२४०.१६( विप्र को अङ्गुष्ठ मात्र भूमि के दान मात्र से पृथिवीपति होने का उल्लेख ), ब्रह्म १.१.१०९( ब्रह्मा के अङ्गुष्ठ से दक्ष व वाम अङ्गुष्ठ से दक्ष - पत्नी की उत्पत्ति का उल्लेख ), १.३८.९०( सब देहधारियों में अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष की स्थिति का उल्लेख ), १.११३.९५( दक्षिण पाणि में अङ्गुष्ठोत्तर रेखा के ब्राह्म तीर्थ होने का उल्लेख ; तर्जनी व अङ्गुष्ठ के बीच पितृ तीर्थ होने का उल्लेख आदि ), ब्रह्मवैवर्त्त २.३६.१५४( मृत्यु पर यम किङ्करी द्वारा अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष को ग्रहण करना ), ब्रह्माण्ड १.२.७.९७( शरीर के अङ्गों के अङ्गुल मान के संदर्भ में हाथ व पैरों के अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों का अङ्गुल मान ), भविष्य १.२४.२२( सामुद्रिक लक्षणों के संदर्भ में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों की विकृत आकृतियों का वर्णन ), १.३०.१( विभिन्न द्रव्यों के अङ्गुष्ठ पर्व मात्र गणपतियों के निर्माण का कथन ), २.२.२१.१०३( वरुण की अङ्गुष्ठ मात्र प्रतिमा की स्थापना का उल्लेख ), ३.४.१७.१२( मरुतों की उत्पत्ति के संदर्भ में अङ्गुष्ठ मात्र इन्द्र द्वारा वज्र से दिति के गर्भ का छेदन ), ४.८९.६( मृत्यु पर यमदूतों द्वारा अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष का बन्धन करके ले जाने का उल्लेख ), भागवत १.१२.८( उत्तरा के गर्भ में स्थित परीक्षित के अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से जलने पर अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष द्वारा गर्भ की रक्षा का वर्णन ), ३.१२.२३(  ब्रह्मा के अङ्गुष्ठ से दक्ष के जन्म का उल्लेख ), ३.१३.१८( ब्रह्मा के नासाछिद्र से अङ्गुष्ठ परिमाण वराह का उत्पन्न होना व विराट रूप होकर यज्ञ वराह बनना ), मत्स्य ६१.४६( अगस्त्य को अर्घ प्रदान के संदर्भ में कुम्भ में सुवर्ण निर्मित, चतुर्मुख अङ्गुष्ठ पुरुष को रखने का उल्लेख ), ७२.३४( अङ्गारक/मङ्गल की अर्चना के संदर्भ में पात्र में सुवर्ण निर्मित, चतुर्भुज अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष रखने का निर्देश ), २५८.४७( शरीर के अङ्गों के अङ्गुल मान के संदर्भ में हाथ व पैरों में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों के अङ्गुल मान का वर्णन ), मार्कण्डेय ३४.१०७( आचमन के संदर्भ में दक्षिण पाणि में अङ्गुष्ठोत्तर रेखा के ब्राह्म तीर्थ, अङ्गुष्ठ व तर्जनी मध्य में पितृ तीर्थ आदि होने का कथन ), वराह ६२.१०(राजा अनरण्य द्वारा पद्म में अङ्गुष्ठमात्र पुरुष के दर्शन, पद्म तोडने के प्रयास पर कुष्ठ प्राप्ति की कथा), वायु ८.९८( अङ्गुष्ठ से अङ्गुलियों तक के आयामों के प्रादेश, ताल, गोकर्ण आदि नामों का कथन? ), १०८.१४( गयासुर पर स्थित शाला का प्रभास अद्रि द्वारा आच्छादन, शिलाङ्गुष्ठ का प्रभास का भेदन करके प्रकट होना, अङ्गुष्ठ प्रदेश में पिण्ड दानादि का महत्त्व ), विष्णु १.१५.८०( ब्रह्मा के दक्षिण हस्त के अङ्गुष्ठ से दक्ष प्रजापति की उत्पत्ति का उल्लेख ), विष्णुधर्मोत्तर १.२२.२३( विराट रूप धारी वामन के अङ्गुष्ठ द्वारा ब्रह्माण्ड का भेदन होने पर ब्रह्माण्ड के बाहर स्थित जल का अन्दर प्रवेश करना ), १.६५.२३( चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल व आत्मा में ध्यानयोग द्वारा अङ्गुष्ठ पुरुषों के दर्शन का निर्देश ), १.९२.३३( हस्त प्रमाण स्रवा के होम स्थान को अङ्गुष्ठ मध्य समान बनाने का उल्लेख ), १.१६५.५( रवि मध्य में स्थित सोम, उसके मध्य में स्थित अच्युत के अङ्गुष्ठ पुरुष होने का उल्लेख ), २.३७.४२( सावित्री - सत्यवान् आख्यान में यम द्वारा सुप्त सत्यवान् के अङ्गुष्ठ मात्रपुरुष को पाशबद्ध करके ले जाने का उल्लेख ), २.१६५.१३( शरीर में अङ्गों के पुरुष, स्त्री व नपुंसक लिङ्गों में विभाजन के संदर्भ में अङ्गुष्ठ के पुरुष होने का उल्लेख ), ३.२६.१३( अभिनय कर्म में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों की विभिन्न मुद्राओं का वर्णन ), ३.३२.१+ ( अङ्गुष्ठ मूल में ब्राह्म तीर्थ, अङ्गुलि अग्र में दैव, तर्जनी मूल में पितृ व कनिष्ठा में मानुष तीर्थों का उल्लेख ), शिव २.३.१५.२४( तारकासुर द्वारा अङ्गुष्ठ से भुव/भूमि का स्पर्श करके तप करने का उल्लेख ), २.५.२४.४५( शिव द्वारा पादाङ्गुष्ठ से निर्मित सुदर्शन चक्र द्वारा जलन्धर वध का उल्लेख ), ५.४०.३५( मार्कण्डेय द्वारा विमान में स्थित अङ्गुष्ठ मात्रपुरुष रूप में सनत्कुमार के दर्शन ), ७.२.१४.३९( माला जप के संदर्भ में अङ्गुष्ठ व अङ्गुलियों की क्रमश: मोक्षप्रद, शत्रुनाशिनी, धनाप्रदा आदि संज्ञाएं ), ७.२.३८.७१( भ्रूमध्य में शिव व शिवा के अङ्गुष्ठ मात्र रूप के ध्यान का उल्लेख ), स्कन्द ५.१.५०.१३( सर्प द्वारा राजा दमन के अङ्गुष्ठ में काटने का उल्लेख ), ५.२.२.२१( मङ्कणक के अङ्गुष्ठ ताडन से भस्म निर्गमन का कथन ), ५.२.६०.२३( मतङ्ग द्वारा १०० वर्ष तक अङ्गुष्ठ से बैठकर तप करने का उल्लेख ), ५.३.६७.५१( नारद द्वारा विष्णु को जगाने के लिए उनके पादाङ्गुष्ठ का मर्दन करने का उल्लेख ), ५.३.१९२.६( नारायण के दक्षिण अङ्गुष्ठ से दक्ष की उत्पत्ति का उल्लेख ), महाभारत आदि ३१.८( कश्यप के यज्ञ के संदर्भ में इन्द्र द्वारा अङ्गुष्ठोदर पर्व मात्र शरीर वाले वालखिल्य ऋषियों का दर्शन ), ११४.२०( गान्धारी से उत्पन्न मांस पिण्ड का सिंचन होने पर उसका एक सौ अङ्गुष्ठ पर्वमात्र गर्भों में विभाजित होने का उल्लेख ), वन २९७.१७( यम द्वारा सत्यवान् के अङ्गुष्ठ मात्रपुरुष का कर्षण ), उद्योग ४६.२७( अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष के सबके हृदय में स्थित होने पर भी न दिखाई देने का उल्लेख ), १३१.५( दुर्योधन द्वारा कृष्ण के बन्धन की चेष्टा पर कृष्ण के शरीर में स्थित अङ्गुष्ठ मात्र देवों द्वारा आग की लपटें छोडना ), द्रोण १.७५.६३( कर्ण से युद्ध में घटोत्कच का अङ्गुष्ठ मात्र रूप धारण करना ), १८१.१९( एकलव्य के साङ्गुष्ठ होने पर देवों, दानवों आदि से अविजित होने का उल्लेख ), अनुशासन १०४.१००( भोजन के पश्चात~ दक्षिण चरण के अङ्गुष्ठ के अवसेचन का उल्लेख ), १०४.१०३( अङ्गुष्ठ मूल में ब्राह्म तीर्थ, अङ्गुष्ठ व तर्जनी के बीच पितृ तीर्थ होने का उल्लेख ), १४१.१०१( वालखिल्य ऋषियों के अङ्गुष्ठ पर्व मात्र होकर तपोरत होने का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण १.४३४.४९( विष्णुमती द्वारा पादाङ्गुष्ठ से वह्नि का उत्पादन कर पति सहित भस्म होना ), १.४३८.१०८( पुण्यनिधि - पत्नी विन्ध्यावली द्वारा पादाङ्गुष्ठ से वह्नि प्रज्वलित करने का उल्लेख ) angushtha

Remarks on Angushtha