पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Angiraa अङ्गिरा

अङ्गिरा

टिप्पणी : पुराणों में अङ्गिरा को अङ्गिरसों के पिता कहा गया है। इसकी पुष्टि वैदिक साहित्य में भी होती है। जैसा कि अङ्गिरस शब्द की टिप्पणी में कहा जा चुका है, मुण्डकोपनिषद १.१.२ के अनुसार ब्रह्मा ने ब्रह्मविद्या का उद्घाटन सर्वप्रथम अथर्वा को, अथर्वाने अङ्गिरा को, अङ्गिरा ने भारद्वाज को और भारद्वाज ने अङ्गिरस को किया। यह समाधि से व्युत्थान की क्रमिक अवस्था है। जैमिनीय ब्राह्मण ३.३८२ के अनुसार सर्प अङ्गिरामुख होकर मधु का पान करते हैं, जबकि अङ्गिरस अथर्वमुख होकर घृत? का पान करते हैं।जैमिनीय ब्राह्मण २.११६ के आधार पर ऐसा कहा जा सकता है कि जब अङ्गिरा शब्द का प्रयोग बहुवचन में हो तो वह अङ्गिरसों का सूचक है।

     पुराणों में आत्रेयी को अङ्गिरा-पत्नी कहा गया है। जैमिनीय ब्राह्मण १.८१ के अनुसार अङ्गिराओं के लिए सोम तीन भागों में बंट जाता है। इससे ऊपर तुरीयावस्था में सोम की प्राप्ति बृहस्पति को होती है। इस प्रकार पुराणों की आत्रेयी को जाग्रत, स्वप्न व सुषु्प्ति का एकीकृत रूप कह सकते हैं(अत्रि की व्युत्पत्ति अत्रि से तथा अद्-भक्षणे धातु से की जाती है, अर्थात् तीनों अवस्थाओं का भक्षण करके एक रूप हो जाना।

     शतपथ ब्राह्मण ६.५.२.५, ६.५.३.१०, ६.५.४.१७ आदि में वसुओं, रुद्रों, आदित्यों और विश्वेदेवों द्वारा अङ्गिरस्वत् होकर उखा के निर्माण का उल्लेख आता है। वहीं उल्लेख है कि प्राण ही अङ्गिरा हैं। शुक्ल यजुर्वेद १२.५३ तथा २७.४५ में यज्ञ में ध्रुवा पात्र के अङ्गिरस्वत् स्थित होने का उल्लेख है। शतपथ ब्राह्मण १०.५.१.२ में इस कथन की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि आत्मा के तीन रूप हैं स्त्री, पुमान् और नपुंसक। तीन ही रूप वाक् के हैं। जब ध्रुवा के अङ्गिरस्वत् स्थित होने की कामना की जाती है तो यह सर्वा, अर्थात् सर्वांगीण प्रकृति के स्थित होने की कामना की जाती है(तुलनीय : पुराणों में अङ्गिरा द्वारा ध्रुव को उपदेश)। इसके विपरीत जब कहते हैं कि अङ्गिरस्वत् ध्रुवं सीद इति, तो यह पुरुष रूप, आदित्य का रूप है, यह मृत्यु रूप है। गोपथ ब्राह्मण २.६.१४ से ऐसा प्रतीत होता है कि अङ्गिरा होकर राधा नामक आनन्द की प्राप्ति की जाती है।

     पुराणों में श्रद्धा को अङ्गिरा-पत्नी कहा गया है। लेकिन गोपथ ब्राह्मण १.५.२४ में श्रद्धा और वैश्वानर से अङ्गिरा के जन्म का उल्लेख है। ऋग्वेद १.१.६ के अनुसार अग्नि स्तोता के जिस अङ्ग को भद्र बनाती है, वह सत्य अङ्गिरा हो जाता है। ऋग्वेद में कईं स्थानों पर अग्नि को अङ्गिरा नाम से संबोधित किया गया है(उदाहरण के लिए, १.३१.१)। दूसरी ओर अग्नि के लिए अङ्गिरस्तम, अङ्गिरों में सर्वोच्च विषेषण भी आया है(ऋग्वेद ८.४३.३७)। इन्द्र के लिए भी कहा गया है कि वह अङ्गिराओं के द्वारा अङ्गिरस्तम हो गया (ऋग्वेद १.१००.४)। उषा के लिए अङ्गिरस्तमा विशेषण प्रयुक्त हुआ है(ऋग्वेद ७.७५.१)।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि। तवेतत् सत्यमङ्गिरः ऋ. १.१.६

आत्मा की सूक्ष्म तरंगों से तप कर स्तोता का व्यक्तित्व भृगु ऋषि हो जाता है तो शारीरिक और मानसिक स्तरों पर वह, आत्मा रूपी अग्नि पर तप कर, इतिहास के पन्नों पर अपनी छाप छोड जाने वाला, आत्मा के स्वरूप को जानने वाला अङ्गिरा देवता हो जाता है।

मनुष्य का जन्म लपटों(अर्चियों) और अंगारों के तप से तपने के लिए है भृगूणाम् अङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् यजुर्वेद १.१८। लपट(अर्चि) = भृगु, अंगार = अंगिरा। भृगु शान्त है, अंगिरा उग्र है। आत्मा की शांति और शरीर की हलचल, दोनों का मेल है जीवन।

सूर्य एक अंगारा है जो अपने मण्डल के ऋत-अग्नि के स्थूल रूप के लिए एक केन्द्रबिन्दु बना हुआ है। अतः अग्नि सूर्य-रूप अंगार से अंगिरा हो कर प्रकट है। उधर अग्नि सूर्य की लपटों से भृगु हो कर समूचे सौर मण्डल में ताप-रूप में फैला हुआ है। - डा. अभयदेव शर्मा, वेद सविता वर्ष३३/१, फरवरी २०१३, पृष्ठ१६

 

संदर्भ

*अङ्गिरा उ ह्यग्निः मा.श. ...२५

*विदेदग्निर्नभो नामाग्नेऽअङ्गिर आयुना नाम्नेहि। - मा.श. ३.५.१.३२

*प्राणो वा अङ्गिराः। - मा.श. ६.१.२.२८, ६.५.२.३

*अङ्गिरोभिरागहि यज्ञियेभिर्यम वैरूपैरिह मादयस्व। विवस्वन्तँँ हुवे यः पिता तेऽस्मिन् यज्ञे बर्हिष्यानिषद्य। - तै.सं. २.६.१२.६

*इमं यम प्रस्तरमा हि सीदाङ्गिरोभिः पितृभिः संविदानः। - तै.सं. २.६.१२.६

*ये पश्चात्(प्राणाः) तेऽङ्गिरोधामानः। - काठक सं. २०.११

*अङ्गिरोभिर्देवेभिर्देवतया पाङ्क्तेन त्वा छन्दसा युनज्मि हेमन्तशिशिराभ्याम्। - काठक सं. ४१.९

*तं वरुणं मृत्युमभ्यश्राम्यदभ्यतपत्समतपत्तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यो रसोऽक्षरत् सोऽङ्गरसोऽभवत्तं वा एतमङ्गरसं सन्तमङ्गिरा इत्याचक्षते गो.ब्रा. १.१.७

*आदित्यधामानो वा उत्तरे प्राणा अङ्गिरोधामानोऽधरे मै.सं. ३.२.९