पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Angaara - Angaaraka अङ्गार - अङगारक - अङ्गारका

अङ्गार

टिप्पणी : ऋग्वेद १०.३४.९ तथा शतपथ ब्राह्मण ५.३.१.१० में अक्षों/पांसों की पराकाष्ठा को दिव्य अङ्गारों की संज्ञा दी गई है जो शीतल होते हुए भी हृदय को जला देते हैं। जैमिनीय ब्राह्मण १.४५ तथा शतपथ ब्राह्मण १४.९.१.१२, गोपथ ब्राह्मण १.३.१३ में चार दिशाओं की अग्नियों में आहुति पडने से उत्पन्न अङ्गारों, अर्चि, धूम इत्यादि का वर्णन किया गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.२.८.१० तथा काठक संहिता ३१.७ में अङ्गार द्वारा अप के पतन पर एकत, द्वित व त्रित के जन्म का उल्लेख है। जैमिनीय ब्राह्मण ३.२६३ तथा ऐतरेय ब्राह्मण ३.३४ में अङ्गारों से अङ्गिरसों व बृहस्पति के जन्म का उल्लेख है। अभिधान राजेन्द्र कोश के अनुसार राग-द्वेष वाला आहार लेने पर अङ्गारों के साथ धूम भी उत्पन्न होता है। काठक संहिता ६.७ के अनुसार स्थूल अङ्गार ऋतु और लघु अङ्गार अर्धमासों के रूप हैं। छान्दोग्य उपनिषद २.१२.१ में साम गान में हिंकार, प्रस्ताव आदि में प्रतिहार कर्म को अङ्गारों की उपमा दी गई है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

अग्नि धधकता है तो लपट उठती है और अंगारे बनते हैं। अग्नि जिसे जलाता है, वह अंगारा बनता है। जिस शरीर में आत्मा का वास होता है, उसे आत्मा तप में जला कर अंगारा बना देता है। आत्मज्ञानी का शरीर, उसका व्यक्तित्व आभा-प्रभामय हो उठता है। - डा. अभयदेव शर्मा, वेद सविता, वर्ष३३/१, फरवरी २०१३, पृष्ठ१८

संदर्भ

* अधिदेवनं वाऽअग्निः। तस्यैतेऽअङ्गाराः - यदक्षाः। - मा.श. ५.३.१.१०

अङ्गारक

टिप्पणी : जैमिनीय ब्राह्मण १.४५ तथा शतपथ ब्राह्मण १४.९.१.१२ में चार दिशाओं? में चार प्रकार की अग्नियों में आहुति से उत्पन्न अङ्गारों व अङ्गारक ग्रह की उत्पत्ति में साम्य प्रतीत होता है। अङ्गों के अङ्गार बनने पर उत्पन्न रस से अङ्गिरस की उत्पत्ति(जैमिनीय ब्राह्मण ३.२६३) को पुराणों की रूप प्राप्ति कह सकते हैं।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

अङ्गारका

टिप्पणी : जैमिनीय ब्राह्मण १.४५ में अशनि को अङ्गार कहा गया है। अशनि अर्थात् शनि का विलोम। शनि छाया ग्रह है। शनि का कार्य मृत्यु समय में आत्मा के तैजस सत्त्व मात्र को ग्रहण करके प्रयाण कराना है। यदि अङ्गों में पहले ही अङ्गार बन चुके हों तो शनि अपना कार्य नहीं कर पाएगा। अङ्गों की अविकसित स्थिति अङ्गारका प्रतीत होती है। अथवा अङ्गों के दूषित रस का भक्षण करने वाली अङ्गारका राक्षसी हो सकती है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.