पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Amsha-Amshu अंश-अंशु

अंश

टिप्पणी : वेद में अंश की १२ आदित्यों के अन्तर्गत परिगणना की गई है। तैत्तिरीय ब्राह्मण १.१.९.२ तथा मैत्रायणी संहिता १.६.१२ के अनुसार अदिति देवी द्वारा ब्रह्मोदन का उच्छिष्ट भाग भक्षण करने से अंश व भग मिथुन की उत्पत्ति होती है। ऋग्वेद २.१.४ में अग्नि को अंश का देवों में विभाजन करने वाला कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण ५.३.५.९ में अभिषेक कर्म में वीर्य से अभिषेक करते समय कहा गया है कि वीर्य अंश है, वीर्य भग भी है। उपरोक्त वर्णन से प्रतीत होता है कि भोजन से जो अंश रूप शक्ति प्राप्त होती है, उसका देवशक्तियों में सम्यक् वितरण करना अंश और भग/भाग का कार्य है। ब्रह्मसूत्र २.३.४१ के अनुसार जीव अंश शक्ति का उपयोग कितव/जूए के रूप में करता है। जाबालदर्शनोपनिषद ८.४ में धारणा के अन्तर्गत शरीर के भागों को पांच महाभूतों का अंश कहा गया है। सरस्वती रहस्योपनिषद ३.२३ में समाधि से व्युत्थान के अन्तर्गत अंशपञ्चकों अस्ति, भाति, प्रिय, रूप व नाम की गणना की गई है जिनमें पहले तीन ब्रह्म रूप हैं और अन्तिम दो जगत रूप। मैत्रायणी उपनिषद ५.२ में ब्रह्मा, विष्णु व रुद्र को राजसिक, सात्त्विक व तामसिक अंश कहा गया है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

संदर्भ

अंशो नानाव्यपदेशाद् अन्यथा चापि दाशकितवादित्वम् अधीयत एके- ब्रसू-२.३.४१

सा तृतीयमपचत् । तस्या उच्छेषणमददुः । तत्प्राश्नात् । सा रेतोऽधत्त । तस्या अँशश्च भगश्चाजायेताम् – तै.ब्रा. १.१.९.२

श्लोकाय स्वाहेति वीर्यं वै श्लोको वीर्येणैवैनमेतदभिषिञ्चत्यंशाय स्वाहेति वीर्यं वा अंशो वीर्येणैवैनमेतदभिषिञ्चति भगाय स्वाहेति वीर्यं वै भगो वीर्येणैवैनमेतदभिषिञ्चत्यर्यम्णे स्वाहेति तदेनमस्य सर्वस्यार्यमणं करोति – मा.श. ५.३.५.९

भेदस्तयोर्विकारः स्यात्सर्गे न ब्रह्मणि क्वचित् ।
अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् ॥ २३ ॥
आद्यत्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ।
अपेक्ष्य नामरूपे द्वे सच्चिदानन्दतत्परः ॥ सरस्वतीरहस्योपनिषत् ३.२४

जान्वन्तं पृथिवी ह्यंशो ह्यपां पाय्वन्तमुच्यते ।
हृदयांशस्तथाग्नंशो भ्रूमध्यान्तोऽनिलांशकः ॥ ४॥
आकाशांशस्तथा प्राज्ञ मूर्धांशः परिकीर्तितः ।
ब्रह्माणं पृथिवीभागे विष्णुं तोयांशके तथा ॥ ५॥
अग्न्यंशे चे महेशानमीश्वरं चानिलांशके ।
आकाशांशे महाप्राज्ञ धारयेत्तु सदाशिवम् ॥ ६॥ - जाबालदर्शनोपनिषत् ८.६

 

अंशु

टिप्पणी : अंशु का सामान्य अर्थ किरण होता है। सोमलता जिससे सोम निचोडा जाता है, का नाम भी अंशु है। वैदिक साहित्य में अंशु एक वचन और बहुवचन में आता है। व्यक्तित्व के सर्वोच्च कोश में स्थित सोम से नीचे के सात कोश अंशुओं द्वारा प्रकाशित होते हैं(अथर्ववेद १९.६.१६)। इन अंशुओं या प्राणों को अन्तर्मुखी करने की आवश्यकता होती है। शतपथ ब्राह्मण ४.१.१.१, ४.६.१.१ तथा ११.५.९.२ के अनुसार प्राण, मन, चक्षु यह सब अंशु हैं। लेकिन यह अंशु नीचे के स्तरों तक आते-आते बहुत दुर्बल पड गए हैं। उनमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह हमारे व्यक्तित्व के शत्रुओं का नाश कर सकें और न ही वह कोई आनन्द प्रदान करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में इन अंशुओं का शोधन करके उन्हें उच्चतर स्तरों पर स्थापित करने का वर्णन है। इस प्रकार प्राण का रूपान्तरण उदान में, मन का वाक् में तथा चक्षु का श्रोत्र में करने का उल्लेख है। इस रूपान्तरण करने में आत्मा या व्यान प्राण शोधन करने वाला उपकरण का कार्य करते हैं। इस रूपान्तरण को श्येन का रूप दिया गया है जिसके प्राण और उदान दो पक्ष हैं और आत्मा मध्य भाग है। श्रौत ग्रन्थों में इस प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन है। ऋग्वेद ९.६८.६ तथा ४.२६.६ में उल्लेख है कि श्येन उडकर स्वर्ग से जो सोम लाया, उसका स्वरूप अन्धा है। उस अन्धे सोम का सम्यक् परिमार्जन करके उसमें चमकते हुए अंशु आदि उत्पन्न करने की आवश्यकता होती है। यजुर्वेद ५.७ के सार्वत्रिक यजु के अनुसार सोम ऐसा होना चाहिए जिसका एक-एक अंशु इन्द्र को आह्लाद से अभिभूत कर दे। ऐसे सोम को ही देवगण स्वीकार करते हैं। ऋग्वेद ४.५८.१, ९.८९.६ तथा ९.९१.३ आदि में ऐसे अंशु को घृत व मधु की सृष्टि करने वाला व महान् नाद करने वाला कहा गया है।

     जैमिनीय ब्राह्मण १.११४ व १.११५ में एक ऐसी एकाक्षरा गायत्री वाक् की कल्पना की गई है जो अक्षर है। प्राण इसका अंशु है। यह वाक् स्वयं भी अंशु हो सकती है। चन्द्रमा की १६वीं कला को जो भक्षण करने पर भी अक्षीण रहती है, अंशु कहा गया है(अथर्ववेद ७.८६.६)।

     पुराणों में प्रांशु आदित्य के शकटासुर से युद्ध का उल्लेख है। शकट का उल्लेख रोहिणी की शकट के संदर्भ में आता है। यह आरोहण-अवरोहण करने वाली शक्ति है। चन्द्रमा/शीतांशु की १६वीं कला इस आरोहण-अवरोहण से मुक्त है।

     पुराणों में अंशु को पुरुमित्र का पुत्र कहने का तात्पर्य शतपथ ब्राह्मण ४.१.१.१ तथा ४.६.१.१ में दिए गए उपांशु ग्रह व अंशु ग्रह के वर्णन से समझा जा सकता है। इस वर्णन के अनुसार प्रजापति आत्मा है, वही अंशु है, अर्थात् अपने प्राणों को आत्मोन्मुखी बनाने की आवश्यकता है। पुराणों में इस व्यक्तित्व या शरीर रूपी पुर में स्थित आत्मा को पुरु और अन्तर्मुखी प्राणों को पुरुमित्र कहा गया है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

अंशुमती

टिप्पणी : ऋग्वेद ८.९६.१३, अथर्ववेद २०.१३७.७ तथा बृहद्देवता ६.१०९ में अंशुमती नदी के तट पर इन्द्र व मरुतों का कृष्ण नामक असुर से युद्ध दिखाया गया है। तैत्तिरीय आरण्यक १.६.३ में मन्त्र की व्याख्या करते हुए अंशुमती को पृथ्वी कहा गया है जिसमें संवत्सर स्थित रहता है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.  

संदर्भ

*दश त्वा एते सोम अंशवः ।
प्रत्नो अंशुर् यम् एतम् अभिषुण्वन्ति ।
तृप्तो अंशुर् आपः ।
रसो अंशुर् व्रीहिः ।
वृषो अंशुर् यवः ।
शुक्रो अंशुः पयः ।
जीवो अंशुः पशुः ।
अमृतो अंशुर् हिरण्यम् ।

ऋग् अंशुर् यजुर् (यजुर्) अंशुः साम अंशुर् इति ।
एत वा उ दश सोम अंशवः ।
यदा वा एते सर्वे संगच्छन्ते ।
अतः सोमो अतः सुतः । - कौशीतकि ब्राह्मणम् १३.४

(प्रत्नः – पुराण नाम, सनातनः, स्वर्गः)