पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Ajaamila अजामिल

In vedic mantras, words Jaami and Ajaami generally appear together. Literal meaning of Jaami is a relative – a brother, sister etc. Ajaami means one who is our enemy. But Braahmanical texts explain Jaami in a different way. Jaami means a process which is repeated again and again, without any change, which creates boredom. On the other hand, if something new happens in a repetitive process, it is called Ajaami. Word Jaami is a synonym of Yaami, one who tries to control. Thus, Ayaami will mean one who does not control his instincts. From spiritual point of view, Yaami will be a worship, a way of life where our activities are controlled by our conscious mind. Sometimes it happens during our activities that something unusual takes place and we lose control over our conscious mind. This state will be called Ajaami, uncontrolled. One is supposed to control this state also. One who does so, will be called Ajaaamila. How it can be done, is a matter of further investigation.

 

अजामिल

टिप्पणी : ऋग्वेद की ऋचाओं में प्रायः जामि और अजामि शब्द साथ - साथ प्रकट होते हैं । उदाहरण के लिए, ऋग्वेद १०.१०.१०(यम - यमी सूक्त) निम्नलिखित है -

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि ।।

इस पद का अर्थ है कि हम उस उत्तर युग में प्रवेश करें जहां जामियों को अजामि बना लिया जाता है । ऋग्वेद की ऋचाओं के सायण भाष्य में जामि का अर्थ प्रायः बन्धु और अजामि का शत्रु लिया जाता है । लेकिन ब्राह्मण ग्रन्थों में जामि का अर्थ पुनरुक्ति/पुनरावृत्ति दोष वाला और अजामि का अर्थ पुनरावृत्ति दोष से रहित किया गया है । इसको इस प्रकार समझ सकते हैं कि श्वास की विपश्यना में आते - जाते श्वास पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है - वह श्वास हमारे अन्दर कहां - कहां स्पर्श कर रहा है, कर भी रहा है या नहीं और यदि कर रहा है तो क्या स्पर्श स्थान से कोई संवेदना, हर्ष आदि उत्पन्न हो रहे हैं ? यदि नहीं, तो यह क्रिया जामि, पुनरावृत्ति दोष वाली कहलाएगी । अंदर जाते हुए श्वास से भी आनन्द उत्पन्न होना चाहिए, बाहर निकलते हुए श्वास से भी । और यह आनन्द प्रत्येक श्वास में नवीन रूप वाला होना चाहिए । अतः यह वाञ्छनीय है कि जामि का रूपान्तरण अजामि प्रक्रिया में किया जाए । लेकिन वैदिक ऋचाओं में अजामि को जामि भी बनाने का निर्देश है ( और जामि व अजामि दोनों को समाप्त करने के भी निर्देश हैं ( ४.४.५, ६.४४.१७) । वैदिक निघण्टु में जामयः शब्द का वर्गीकरण अंगुलि नामों में तथा जामि: व जामिवत् शब्दों का वर्गीकरण उदक व पद नामों में किया गया है ।

          जामि शब्द का एक रहस्योद्घाटन इस तथ्य से होता है कि पुराणों में दक्ष - कन्या व धर्म - पत्नी जामि को यामि/यामी भी कहा गया है । इस यामि से यदु, ययाति आदि १२ याम देव उत्पन्न होते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि जामि/यामि यम - नियम की स्थिति है, अपनी चेतना पर नियन्त्रण स्थापित करने की स्थिति है । लेकिन ऋग्वेद १०.१०.१० से संकेत मिलता है कि साधना की उत्तर स्थिति में अपनी चेतना पर से सारा नियन्त्रण हटा लिया जाता है( अथवा अपने आप हट जाता है ) । सभी प्रक्रियाएं स्वाभाविक रूप में, अपने आप होनी चाहिएं । यह अजामि/अयामि की स्थिति है । भागवत पुराण का अजामिल इसी अजामि स्थिति का लालन - पालन करता है । तब वह वेश्या के, मांसल भोगों के वशीभूत हो जाता है । उस स्थिति से बचने का एक ही उपाय है - नारायण । नारायण के संदर्भ में कहा गया है कि आपः नारा हैं और जो इन नार: का अयन है, मूल है, वह नारायण है । आपः व्यक्त आनन्द की स्थिति है । इस आनन्द के मूल की खोज करनी है । अजामिल की कथा में नारायण को अजामिल का कनिष्ठतम पुत्र कहा गया है । यह पुत्र रूप अजामिल की साधना का एक फल हो सकता है ।

          राधावल्लभ सम्प्रदाय आदि में राधा व कृष्ण की अष्टयाम पूजा का निर्देश है । एक याम एक प्रहर के बराबर होता है । अतः यह पूजा २४ घण्टे हो गई । इस पूजा में राधा व कृष्ण को प्रातःकाल जगाना, उनका भोग लगाना आदि सभी कुछ सम्मिलित है । इस पूजा में राधा व कृष्ण में, प्रकृति व पुरुष में भेद समाप्त हो जाता है । श्याम गौर वर्ण राधा बन जाते हैं, राधा श्याम बन जाती है । यह कहा जा सकता है कि साधना का पहला चरण याम/यम स्थिति है जहां सभी कार्य नियमों के अन्तर्गत किए जाते हैं । फिर कभी आह्लाद की एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जहां अपनी चेतना पर से सारा नियन्त्रण समाप्त हो जाता है । यह अयाम की, अजामि की स्थिति है । इस स्थिति को संभालने वाले साधक को अजामिल कहा जा सकता है ।

 

जामयः, अजामयः और अजामिल

- फतहसिंह ( १९९४ ई. )

 

          निघण्टु के अङ्गुलि नामानि की सूची में परिगणित सभी शब्द उन शक्तियों के द्योतक हैं जो शरीर के अङ्गों में लीन रहने के कारण °अङ्गुलि° कही जा सकती हैं । इन शक्तियों के दो प्रमुख गुण ज्वलनशीलता तथा क्रियाशीलता हैं । ये देवों के गुण हैं । निघण्टु में प्रथम का संकेत निघण्टु ने °ज्वलतोनामानि° में पठित °जमत्° शब्द द्वारा दिया, जबकि निघण्टु की °गतिकर्मा° क्रियाओं में सम्मिलित °जमति° से उन शक्तियों के दूसरे गुण का पता चलता है । इन दोनों के विरोधी °अन्धकार° और °तामस° गुण जिन शक्तियों में होते हैं, वे आसुरी शक्तियां °जामयः° से विपरीत अजामयः हैं । अजामयः का लालन - पालन करने वाला °अजामिल° है ।

          पुराणों के अजामिल का जन्म धार्मिक परिवार में हुआ । एक धर्मपरायण व्यक्ति है । पिता की आज्ञा से अरण्यवास के लिए जाता है, परन्तु वहां वह अरण्यवासी ऋषि - मुनियों के विपरीत एक मदिरा पीकर मस्त हुई एक नग्न वेश्या पर मोहित होता है और स्वपत्नी समेत समस्त परिवार को छोडकर उसी के साथ रहने लगता है । उसके दस पुत्र होते हैं । सबसे छोटा दशम पुत्र °नारायण° है । उसके कुकर्मों को ध्यान में रखकर उसे लेने यमदूत उपस्थित होते हैं तो विष्णु के पार्षद उन्हें भगा देते हैं , क्योंकि जो प्रायः नारायण का नाम लेता रहा, वह अन्त समय में भी °नारायण° को पुकारता है ।

          अजामिल के नौ पुत्र उन शक्तियों के प्रतीक हैं जो नौ इन्द्रिय द्वारों में सक्रिय होती हैं , जबकि दशम पुत्र °नारायण° उस नारायणी शक्ति का द्योतक है जो उक्त सभी शक्तियों से सूक्ष्मतम होने से कनिष्ठतम पुत्र के रूप में कल्पित है । अभिप्राय यह है कि °अजामि° नामक आसुरी शक्तियों के लालन - पालन में रत रहने वाला अजामिल भी नारायणी के सूचक °नारायण° का जप करने वाला सब कुकर्मों के फल से मुक्त होकर स्वर्ग पहुंचता है । गीता में इसी ओर संकेत करने के लिए अर्जुन से कृष्ण भगवान् ने कहा था -

सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्वपापेभ्य: मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।

 

In the first three chapters of 6th part(skandha) of Bhaagawata puraana, there is a story of Ajaamila describing the method of getting rid of sorrows.

The story tells that although the ultimate method to get rid of sorrow is self – realization but living in body consciousness, one can adopt special method of acceptance.

First of all, a person should acquire power of control on self. When the control is ingrained, one becomes Ajaamila. Such personality is able to accept the whole as it is . He equally accepts good or bad person, thing, idea and situation. This great quality of acceptance is called Naaraayana – a son of Ajaamila.

                   This acceptance does him  a good favour. As soon as bad and miserable condition occurs, he accepts it and as a result the lights of peace, power, purity etc. fluctuate in the midst of sorrow. These fluctuations of peace, power and purity etc. have been described as Vishnu  dootas/messengers, while the sorrows have been described as  Yama dootas/messengers.

The story says that although these fluctuations of peace, power and purity etc. come for a moment and vanish immediately but this little moment makes a person stable and he comes to know the laws of nature and spirit. These two situations of sorrow and peace, experienced simultaneously inspire the person to think again and again who am I.

This thought process awakens him, his consciousness transforms from body to soul and living in soul consciousness he ultimately joins with Supreme power – an ocean of peace, power, purity, love, knowledge, happiness and bliss. This has been called the arrival of Ajaamila in Vaikuntha loka.

         

 

अजामिल कथा - एक विवेचन

- राधा गुप्ता

कथा का संक्षिप्त स्वरूप

कान्यकुब्ज नगर में अजामिल नाम का एक दासी - पति ब्राह्मण रहता था । दासी(जिसे कुलटा वेश्या भी कहा गया है ) के संसर्ग से दूषित होने के कारण ही उसका उच्च शील - सदाचार नष्ट हो गया था और वह अत्यन्त निन्दनीय वृत्ति का आश्रय लेकर अपना और अपने कुटुम्ब का पालन करता था । अजामिल के दस पुत्र थे, जिनमें सबसे छोटे पुत्र का नाम था - नारायण । वृद्ध अजामिल ने अत्यन्त मोह के कारण अपना सम्पoर्ण हृदय पुत्र नारायण को सौंप दिया था । नारायण में अतिशय आसक्ति के कारण वह मूढ हो गया था और उसे इस बात का पता ही न चला कि मृत्यु मेरे सिर पर आ पहुंची है । एक दिन अजामिल पुत्र नारायण के सम्बन्ध में ही सोच - विचार कर रहा था कि उसे (अजामिल को ) लेने तीन यमदूत पहुंच गए । भयानक स्वरूप वाले यमदूतों को देखकर अजामिल अत्यन्त व्याकुल हो गया और उसने ऊंचे स्वर से पास ही खेल रहे पुत्र नारायण को पुकारा । नारायण का नाम सुनकर भगवान् के पार्षदों ने सोचा कि यह हमारे प्रभु का कीर्तन कर रहा है, इसलिए वे तुरन्त अजामिल के निकट पहुंचे । उन्होंने अजामिल के अन्तर्हृदय का कर्षण करने वाले यमदूतों को कर्षण करने से बलपूर्वक रोक दिया । यमदूतों ने अपने कृत्य के औचित्य का समर्थन करने के लिए विष्णु - दूतों के समक्ष कर्म - फल - नियम का तथा अजामिल की कुलटा वेश्या पर आसक्ति एवं दुराचारता का विस्तार से निरूपण किया । यमदूतों के कथन के प्रत्युत्तर में विष्णुदूतों ने भी नारायण के नाम - स्मरण रूपी भागवत - धर्म का निरूपण करते हुए अजामिल को यमदूतों के पाश से छुडा दिया । यमदूतों के पाश से छूटकर स्वस्थ एवं निर्भय हुए अजामिल ने जैसे ही विष्णुदूतों से कुछ कहना चाहा, वैसे ही वे सहसा अन्तर्धान हो गए । यमदूतों द्वारा कहे गए त्रिगुणात्मिका प्रकृति से सम्बन्ध रखने वाले प्रकृति धर्म तथा विष्णुदूतों द्वारा कहे गए भागवत धर्म को सुन कर अजामिल का आत्म - चिन्तन जाग्रत हो गया और उसने मोह का परित्याग कर हर - द्वार में प्रवेश किया । आत्म - जागरण के द्वारा अन्त में अजामिल ने अपने हृदय को परम ब्रह्म से जोडकर वैकुण्ठधाम को प्राप्त किया ।

कथा का तात्पर्य

          अजामिल कथा एक अवान्तर कथा है और इसका अवतरण राजा परीक्षित के इस प्रश्न के उत्तर के रूप में हुआ है कि मनुष्य किस उपाय का अनुष्ठान करके नरक - यातनाओं अर्थात् दु:खों से मुक्त रह सकता है ।

          कथा इस अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथ्य को निरूपित करती है कि यद्यपि दु:खों से आत्यन्तिक मुक्ति का उपाय आत्म - जागरण(self - awakening) द्वारा आत्म - स्वरूप में अवस्थिति ही है, तथापि यदि मनुष्य देह - चेतना में स्थित है अर्थात् देह को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझता है, तब वह भगवत्परायणता रूप एक विशिष्ट उपाय का आश्रय लेकर आत्म - जागरण द्वारा दु:खों से मुक्ति रूप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है ।

          कथा संकेत करती है कि सबसे पहले मनुष्य यम - नियम आदि ९ गुणों को अपने व्यक्तित्व में प्रयत्नपूर्वक धारण करे । ये ९ गुण महर्षि पतञ्जलि द्वारा निर्दिष्ट सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, सन्तोष, स्वाध्याय तथा ईश्वर - प्रणिधान भी हो सकते हैं अथवा अजामिल - कथा में ही निर्दिष्ट तप, ब्रह्मचर्य, शम, दम, त्याग, सत्य, शौच, यम तथा नियम (६.१.१३) भी हो सकते हैं । इन यम - नियमों अथवा ९ गुणों को अपने व्यक्तित्व में प्रयत्नपूर्वक धारण करना जामि(यम - यामि) कहलाता है । परन्तु शनैः - शनैः जब मनुष्य इन यम - नियमों को आत्मसात् कर ले अर्थात् उसका प्रयत्न समाप्त होकर ये गुण मनुष्य में स्वाभाविक रूप से ओतप्रोत हो जाएं तब वह स्थिति ही अजामि कहलाती है ।

          इस अजामि स्थिति में स्थित मनुष्य की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विशिष्टता है - उसका भगवत्परायण होना । भगवत्परायणता का अर्थ है - अनन्त नाम - रूपों में व्याप्त भगवत्सत्ता को उसकी समग्रता में स्वीकार कर लेना अर्थात् इस दृश्यमान् नाना रूपात्मक जगत् में एक ही परमात्मसत्ता को विद्यमान समझते हुए सर्वत्र उसके दर्शन करना तथा प्रत्येक नाम, रूप, परिस्थिति अथवा घटना के प्रति स्वीकार भाव रखना । इस भगवत्परायणता से मनुष्य को यह लाभ होता है कि जीवन में किसी भी समय दैहिक, दैविक अथवा भौतिक तापों(दु:खों) के उपस्थित हो जाने पर वह कुछ क्षणों के लिए भयभीत होकर व्याकुल तो अवश्य होता है, परन्तु उसकी भगवत्परायणता अर्थात् समग्र अस्तित्व के प्रति उसकी स्वीकार्यता अतिशीघ्र उसमें शक्ति, शान्ति, सुख तथा पवित्रता आदि भावों का प्रस्फुरण कर देती है जिसके फलस्वरूप मनुष्य आगत दु:खों के ताप से बच जाता है । इसके साथ ही दु:खों का ताप और शान्ति का आगमन - ये दोनों समवेत रूप में अनुभूत हुई स्थितियां मनुष्य को दो प्रकार का ज्ञान भी देती हैं ।

          प्रथम प्रकार का ज्ञान - दु:खों के द्वारा मनुष्य व्यष्टि तथा समष्टि प्रकृति में क्रियाशील नियमों(laws of nature) को समझने में समर्थ होता है । उसे ज्ञात हो जाता है कि जब तक मनुष्य देह - चेतना में स्थित है, अर्थात् स्वयं को देह मानकर ही चल रहा है, तब तक सभी कर्मों को कर्त्ता - भोक्ता भाव से करने के कारण वे कर्म निश्चित् रूप से फल लाएंगे तथा उस कर्म - फल नियम(law of karma or the law of cause and effect) से बंधे होने के कारण मनुष्य के सामने दुःख - सुख रूप फल निश्चित् रूप से आएंगे ही । अब उसे यह भी ज्ञात होता है कि जब तक मनुष्य देह रूपी पृथ्वी से बंधा रहेगा, तब तक यह देह (मन - बुद्धि - चित्त) रूपी पृथ्वी अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति (force of gravitation) आसक्ति, मोह आदि के बल पर मनुष्य को स्वार्थ, अहंकार आदि के रूप में नीचे की ओर खींचती ही रहेगी । ऊपर उठने के लिए मनुष्य को इस देह रूपी पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से बाहर आकर आत्म - चेतना में स्थित होना अनिवार्य होगा ।

          द्वितीय प्रकार का ज्ञान - दु:खों के साथ ही प्रादुर्भूत हुए शान्ति - सुख आदि भावों के प्रस्फुरण से मनुष्य इस आध्यात्मिक नियम को भी समझने में समर्थ होता है कि भगवत्परायणता अर्थात् समग्र अस्तित्व के प्रति स्वीकार एवं समर्पण भाव में ही शान्ति, सुख, पवित्रता आदि निहित हैं । कथा यह भी संकेत करती है कि भगवत्परायण होने के कारण मनुष्य को दुःख के समय जिस शान्ति - सुख का अनुभव होता है - वह यद्यपि तात्कालिक ही होता है, परन्तु उपर्युक्त वर्णित देह(प्रकृति) तथा आत्मा ( पुरुष) के नियमों का ज्ञान हो जाने से मनुष्य की अज्ञान - निद्रा टूटती है और वह इस चिन्तन की ओर प्रवृत्त होता है कि मैं वास्तव में हूं कौन? मैं क्यों अभी तक स्वयं को शरीर मात्र समझकर जीवन के अमूल्य क्षणों का दुरुपयोग करता रहा । यही आत्म - जागरण है जो मनुष्य को शीघ्र ही परमात्म - सत्ता से जोडकर वैकुण्ठ अर्थात् कुण्ठा रहित स्थिति की प्राप्ति करा देता है । अतः देहभाव में जीवन जीते हुए मनुष्य का यह प्रथम कर्तव्य है कि वह अजामि (यम - नियमों को आत्मसात् करके) होकर भगवत्परायण बने ।

कथा की प्रतीकात्मकता

कथा को सम्यक् रूप से हृदयंगम करने के लिए कतिपय प्रतीकों को समझ लेना उपयोगी होगा -

१- कथा का मुख्य पात्र है - अजामिल । अजामि शब्द वेदों में प्रकट हुआ है । ऋग्वेद की ऋचा १०.१०.१० में कहा गया है -

°आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि °

अर्थात् हम उस उत्तर युग में प्रवेश करे जहां जामियों को अजामि बना लिया जाता है । ऐसा प्रतीत होता है कि जामि शब्द यम/यामि से निष्पन्न हुआ है । यम/यामि का अभिप्राय दो प्रकार से लिया जा सकता है । पहले प्रकार में यम का अर्थ यम - नियम आदि गुणों के रूप में ग्रहण किया जा सकता है जिसका विवेचन हम °कथा के तात्पर्य ° के अन्तर्गत कर चुके हैं । दूसरे प्रकार में यम का अर्थ है - संयत करना, नियन्त्रित करना, वश में करना । अतः तदनुसार यम/यामि चेतना पर नियन्त्रण स्थापित करने की स्थिति है । इसके विपरीत अजामि वह स्थिति है जब चेतना पर नियन्त्रण स्थापित करने की आवश्यकता न पडे, सभी प्रक्रियाएं स्वाभाविक रूप से होने लगें । दोनों ही प्रकारों में एक ही तथ्य स्पष्ट होता है कि गुणात्मक दृष्टि से उच्च स्तर पर स्थित चेतना अजामि है । इस अजामि स्थिति का जो लालन - पालन करता है - वही भागवत पुराण में अजामिल नाम से कहा गया है ।

२. कथा में कहा गया है कि अजामिल पहले एक शील, सदाचार युक्त ब्राह्मण था परन्तु बाद में दासी अर्थात् कुलटा वेश्या पर आसक्त होकर वह दुराचारी हो गया ।

          इस कथन द्वारा सृष्टि सृजन के अन्तर्गत मनुष्य की जीवन यात्रा की ओर संकेत किया गया है । प्रत्येक मनुष्य अपनी जीवन - यात्रा की प्रारम्भिक स्थिति में शुद्ध एवं शान्त आत्म स्वरूप में स्थित था, परन्तु जन्मों - जन्मों की यात्रा के अन्तर्गत वह अपने शुद्ध एवं शान्त आत्मस्वरूप को भूलकर अशुद्ध - अशान्त देह - स्वरूप को प्राप्त हो गया । ठीक उसी प्रकार जैसे यात्रा पर जाने के लिए जब मनुष्य अपनी यात्रा प्रारम्भ करता है , तब वह स्वयं भी तथा उसका वस्त्र भी स्वच्छ होता है परन्तु यात्रा के अन्तर्गत वह स्वयं तथा उसका वस्त्र मलिनता को धारण कर लेता है । प्रस्तुत कथा में सदाचारी शब्द से मनुष्य की आत्म - स्वरूप में स्थिति को तथा दुराचारी शब्द से उसकी देह - स्वरूप में स्थिति को इंगित किया गया है ।

३. कथा में कहा गया है कि अजामिल ने अपनी कुलीन, नवयुवती पत्नी का परित्याग करके कुलटा वेश्या को पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया ।

          कुलीन, नवयुवती पत्नी आत्म - केन्द्रित विवेकयुक्त बुद्धि की तथा कुलटा वेश्या देह - केन्द्रित अविवेकी बुद्धि की प्रतीक है । मनुष्य जब अपने वास्तविक आत्म - स्वरूप को भूलकर देह को ही अपना स्वरूप मान लेता है, तब वह विवेकी बुद्धि का परित्याग करके अविवेकी बुद्धि से जुड जाता है ।

४. कथा में कहा गया है कि अजामिल के दस पुत्र थे । उनमें सबसे छोटे पुत्र का नाम नारायण था । अजामिल नारायण के प्रति आसक्त था ।

          पौराणिक साहित्य में °पुत्र° शब्द सर्वदा ही किसी न किसी गुण का प्रतिनिधित्व करता है । यहां भी ९ पुत्र तो अजामिल के यम - नियम आदि ९ गुणों का तथा नारायण नामक दसवां पुत्र उसके भगवत्परायणता (समग्र अस्तित्व के प्रति स्वीकार भाव ) नामक गुण का प्रतिनिधित्व करता है । गुणों से सम्पन्न हुए मनुष्य का भगवत्परायण हो जाना नारायण के कनिष्ठतम पुत्र होने की ही पुष्टि करता है । अजामिल की नारायण के प्रति आसक्ति उसकी भगवत्परायणता की अतिशयता अथवा पराकाष्ठा को इंगित करती है ।

५. नारायण के प्रति अति आसक्त अजामिल को कथा में मूढ और अज्ञ कहा गया है ।

          वास्तव में भगवत्सत्ता अर्थात् समग्र अस्तित्व के प्रति पूर्णतः समर्पित हुए हृदय वाला मनुष्य किसी भी प्रकार की उद्विग्नता से रहित पूर्णतः शान्त रहने के कारण बहिर्मुखी लोगों की दृष्टि में अज्ञ और मूढवत् ही प्रतीत होता है । इसलिए उपर्युक्त शब्दों का प्रयोग युक्तिसंगत ही है ।

६. कथा में कहा गया है कि अजामिल को ले जाने के लिए तीन भयंकर यमदूत आए । उन्हें देखकर अजामिल ने व्याकुल होकर उच्च स्वर से पुत्र नारायण को पुकारा, जो कुछ ही दूरी पर खेल रहा था ।

          तीन भयंकर यमदूत दैहिक, दैविक तथा भौतिक - तीन तापों अथवा दु:खों के प्रतीक हैं । इन दु:खों के आने पर अजामिल द्वारा पुत्र नारायण को पुकारने का अर्थ है - गुणी मनुष्य द्वारा अपनी ही उस भगवत्ता(भगवत् - परायणता) का स्मरण कर लेना जो उसी के हृदय के भीतर क्रीडा कर रही होती है अर्थात् विद्यमान होती है ।

७. कथा में कहा गया है कि जैसे ही अजामिल ने पुत्र नारायण को पुकारा, वैसे ही विष्णु के दूत अजामिल के समीप वेगपूर्वक पहुंच गए और उन्होंने यमदूतों को अजामिल के हृदय का कर्षण करने से रोक दिया ।

          जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है - अजामिल द्वारा पुत्र नारायण को पुकारने का अर्थ है - यम - नियम आदि गुणों से युक्त मनुष्य के भगवत्परायण होने के कारण जीवन में उपस्थित हुई प्रत्येक घटना, परिस्थिति, व्यक्ति अथवा वस्तु के प्रति उसका स्वीकार भाव । मनुष्य तभी तक दुःख से दु:खित होता है जब तक वह सर्वात्मना उसे स्वीकार नहीं करता । जैसे ही वह अपने दुःख को पूर्ण हृदय से स्वीकार कर लेता है, वैसे ही तप्त हृदय में शक्ति, सुख तथा शान्ति आदि भावों का प्रस्फुटन होता है । उन भावों के प्रस्फुटन को ही यहां विष्णुदूत कहकर इंगित किया गया है । उन भावों के प्रस्फुटन से दुःख से उत्पन्न हुआ कर्षण समाप्त हो जाता है ।

८. कथा में कहा गया है कि यमदूतों तथा विष्णुदूतों द्वारा कहे हुए धर्मों को सुनकर जैसे ही अजामिल ने कुछ स्वस्थ होकर विष्णुदूतों से कुछ कहना चाहा, विष्णुदूत अन्तर्धान हो गए ।

          यमदूतों तथा विष्णुदूतों के धर्मों को हम °कथा के तात्पर्य° में स्पष्ट कर चुके हैं । विष्णुदूतों का अन्तर्धान होना इस तथ्य को इंगित करता है कि समग्र अस्तित्व के प्रति स्वीकार भाव होने से मनुष्य को अकस्मात् आए दुःख के समय उस दुःख को स्वीकार कर लेने से जिस सुख - शान्ति का अनुभव होता है, वह सुख - शान्ति यद्यपि तात्कालिक ही होती है और झलक मात्र होती है, परन्तु यह झलक मात्र ही मनुष्य को दुःख से उत्पन्न हुई अशान्ति एवं अस्थिरता से उबारकर शान्ति और स्थिरता प्रदान करके उसे स्वस्थ चिन्तन - आत्म चिन्तन की ओर प्रवृत्त कर देती है ।

 

अजामिल

वैदिक संदर्भ

*स जामिभिर्यत्समजाति मीळ्हे ऽजामिभिर्वा पुरुहूत एवै: । - ऋ. १.१००.११

*सातिं नो जैत्रीं संमहेत विश्वहा जामिमजामिं पृतनासु सक्षणिम् ।। - ऋ. १.१११.३

जामिम् - सहजातम् - सायण

*एवेदेषा पुरुतमा दृशे कं नाजामिं न परि वृणक्ति जामिम् । - ऋ. १.१२४.६

*अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्र मृणीहि शत्रून् ।। - ऋ. ४.४.५

जामिम् - पूर्वं प्रहृतम्ä अजामिं - पूर्वमप्रहृतम् - सायण

*प्रियं दुग्धं न काम्यमजामि जाम्योः सचा । घर्मो न वाजजठरोऽदब्धः शश्वतो दभः ।। - ऋ. ५.१९.४

अजामि - दोषरहितंä जाम्योः - द्यावापृथिव्यो: - सायण

*येन वंसाम पृतनासु शत्रून्तवोतिभिरुत जामींरजामीन् ।। - ऋ. ६.१९.८

*इन्द्र जामय उत येऽजामयोऽर्वाचीनासो वनुषो युयुज्रे । - ऋ. ६.२५.३

*एना मन्दानो जहि शूर शत्रूञ्जामिमजामिं मघवन्नमित्रान् । - ऋ. ६.४४.१७

*अजामिमन्यः श्नथयन्तमातिरद्दभ्रेभिन्यः प्र वृणोति भूयसः ।। - ऋ. ७.८२.६

*गन्धर्वो अप्सु अप्या च योषा सा नो नाभि: परमं जामि तन्नौ - ऋग्वेद १०.१०.३

*दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य बिभृयादजामि - ऋ. १०.१०.९

अजामि - अभ्रातरं - सायण

*आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि ।। - ऋ. १०.१०.१०

*स नो अजामींरुत वा विजामीनभि तिष्ठ शर्धतो वाध्र्यश्व ।। - ऋ. १०.६९.१२

*ऋतवो हि प्रयाजा: तत्तदनादिश्य आज्यस्यैव रूपेण गृह्णाति - अजामितायै । जामि ह कुर्यात् - यद् वसन्ताय त्वा ग्रीष्माय त्वेति गृह्णीयात्( ऋतुभ्यस्तद् गृह्णाति ) - श.ब्रा. १.३.२.८

*अनुयाजः -  जामि ह कुर्याद् यद् गायत्र्यै त्वा त्रिष्टुभे त्वा इति गृह्णीयात् । आज्यस्यैव रूपेण गृह्णाति - श. ब्रा. १.३.२.९

*किमिदं जामि क्रियते - अग्नीषोमयोरेव आज्यस्यä अग्नीषोमयो: पुरोडाशस्यä यदनन्तर्हितं तेन जामि इति । - - - - - अनेन ह त्वेवाजामि - उपांश्वाज्यस्य यजतिä उच्चैः पुरोडाशस्य - शतपथ ब्राह्मण १.६.३.२७

*जामि ह कुर्याद् यद् इडोपहूता इडोपहूता इत्येवोपह्वयेत उपहूतेडेति वा । - श.ब्रा. १.८.१.२५

* न द्वे चन सहाजामितायै । जामि ह कुर्याद् - यद्द्वे चित् सह स्याताम् । - श.ब्रा. २.२.३.२७

*जामि ह कुर्याद् यदाग्रयणोऽस्याग्रयणोऽसीति गृह्णीयात् । तस्मादाह - आग्रयणोऽसि स्वाग्रयण इति । - श.ब्रा. ४.२.२.९

*उक्थग्रहः- जामि ह कुर्यात् यदेनमत्राप्युपयामेन गृह्णीयात् । यद्योनौ सादयेत् । - श.ब्रा. ४.३.५.११

*तस्य सच्छन्दसौ याज्यापुरोनुवाक्ये निगदो व्यवैति तेनाजामि भवति - शां. ब्रा. ३.६

*अथ यदसन्नयत्पुरोडाशान्तरेणोपांश्वा यजत्यजामिताया - शां.ब्रा. ३.६

*नि वो जामयो जिहतान्यजामयः - शां.ब्रा. २८.५

*आज्यानि सर्वाणि समाननिधनानि केनाजामि क्रियन्त इति । नानादेवत्यानीति ब्रूयात् तेनाजामीति । अथो यन् नानारूपाणीति ब्रूयात् - जै.ब्रा. १.१०६

*जामीव ह खलु एतत् स्तोत्राणां यत् षोडशी । अन्त्येन स्तोत्रेण समस्तोमो भवत्य~ अजामितायै - जै.ब्रा. १.२०१

*अमिथुनं तद् अप्रजननं यज् जामि । यथा पुमांसो वा सह शयाताg स्त्रियौ वा । - - -अथो यद् एवाजामि तन् मिथुनं तत् प्रजननम् - जै.ब्रा. १.३००

*समाना ह्य् ऋक्समस्य च (स्वारस्य च ) जाम्यजामिता - जै.ब्रा. १.३०७

*समाननिधनानि पृष्ठानिä केनाजामी क्रियन्त इति । वैराजं च महानाम्नयश्च च वैरूपं च रेवत्यश् चैतेनास्यानेनाजामीति । अथो यद् एवैतानि मध्ये निधनानि भवन्ति तेनो एवेति । - जै.ब्रा. २.१८८

*उत्तरस्याह्नः कण्वरथन्तरं माध्यन्दिने पवमाने प्रोहेयु: । प्रजा वा एषा बृहद्रथन्तरयोर् यद् एते सामनी । तद् यद् एवम् उपयन्त्य अजामिताया एव । - जै.ब्रा.२.३५८

*षड् एते स्वरसामानो भवन्ति । षड् ऋतव: । स यथा पुत्रः पितॄन् अनुसंचरेत् तादृग् एवैतद्ä अजामितायै । अजामि हि पुत्रः पितॄन् अनुसंचरति । - जै.ब्रा. २.३८६

*स्वसारो जामयस~ पतिम् इतीमा ह वाव स्वसारः । इमा उ एव जामयः । महाम् इन्दुं महीयुव इतीमा ह वाव महीयुव: । ता एवैनम् एतद् धिन्वन्ति । - जै.ब्रा. ३.६१

*तद् आहुर् जामीव वा एतत् क्रियते यत् एता इळाभिर् इळा उपयन्ति । इषोवृधीयेनैवारभ्यम् अजामिताया इति । अन्तर्हितं ह तु तथा पयः पशुभ्य स्यात् । अथ राथन्तरम् । जामि द्वादशाहस्यास्तीत्य~ आहु: । बार्हत षष्ठम् अहर् बार्हत सप्तमम् । पवमाने रथन्तरं प्रोहन्त्य~ अजामितायै । - जै.ब्रा. ३.१४५

*जामि वा एतत्कुर्वन्ति । यत्सद्यो दीक्षयन्ति सद्य: सोमं क्रीणन्ति । पुण्डरिस्रजा प्रयच्छत्यजामित्वाय । - तै.ब्रा. १.८.२.१

*उप त्वा जामयो गिर इति प्रतिपद्भवति - तै.ब्रा. १.८.८.१

*एवमहमिमं क्षेत्रियाज्जामिशंसात् । द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात् । - तै.ब्रा. २.५.६.३

*जामि स्यात् । यद्यजुषाऽऽज्यं यजुषाऽप उत्पुनीयात् । छन्दसाऽप उत्पुनात्यजामित्वाय । अथो मिथुनत्वाय । सावित्रियर्चा । - तै.ब्रा. ३.३.४.६

*आशायै जामिम् । प्रतीक्षायै कुमारीम् - तै.ब्रा. ३.४.१९.१

*अभिस्तृणीहि परि धेहि वेदिम् । जामिं मा हिंसीरमुया शयाना । होतृषदना हरिता: सुवर्णाः । निष्का इमे यजमानस्य ब्रध्ने । - तै.ब्रा. ३.७.५.१३

*सजातशंसादुत वा जामिशंसात् । ज्यायसः शंसादुत वा कनीयसः । - तै.ब्रा. ३.७.१२.२

*अग्निष्ठेन्यान्पशूनुपाकरोति । इतरेषु यूपेष्वष्टादशिनो ऽजामित्वाय । - तै.ब्रा. ३.९.१.२

*तदु वा आहुर्जामि वा एतद् यज्ञे क्रियते यत्र समानीभ्यामृग्भ्यां समानेऽहन् यजतीति(धातारमेव सर्वासां पुरस्तात् पुरस्तादाज्येन परियजेत् तदासु सर्वासु मिथुनं दधातीति ) - ऐ.ब्रा. ३.४७ ४८