पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Agnishtoma अग्निष्टोम

In order to know the mysteries of puraanic description of Agnishtoma yaaga, it is necessary to the ritual procedure for performing the yaaga. The whole procedure is covered by Shrouta Kosha(Vol.) published by Vedic Samshodhana Mandala, Pune. First of all, one has to choose a proper place for yaaga. The place may be barren, or green, or surrounded by water or slanted in different directions. The choice depends on the desire the performer of yaaga wants to fulfill. In case of puraanic story, the selection was done by throwing a lotus flower. The place which was selected has the property that one starts having memories of previous births and way how to make progress in his penances.

          On the first day of yaaga, the performer of yaaga gets initiation along with his wife. According to puraanic story, Saavitri, the wife of lord Brahmaa could not reach at proper time for initiation and Brahmaa had to adopt another wife Gaayatri for this purpose. This story apparently has no vedic origin. But it may throw light on an important ritual of yaaga. At the start and end of the day in yaaga, Subrahmanyaa is invoked along with wives of gods. The exact meaning of the sentences is not yet known, but holy texts say that the purpose of invocation is to spread the advantages of yaaga over the whole world. This indicates that Saavitri of puraanic story is another form of Subrahmanyaa. Saavitri is associated with horse, while Gaayatri with cow.

          Puraanic story mentions the trouble created by lord Rudra on the first day of yaaga and the subsiding of trouble on  promise of baking on earthen vessels in yaaga. In actual yaaga, there is a ritual of collecting earth for formation of earthen vessels. Mantras for pacification are also recited on this occasion.

          One of the main rituals on second day of yaaga is the ritual of marching. Nothing is known about the significance of this ritual. Puraaanic story seems to  point out the ascending of a serpent power on this day. In actual yaaga, the second day is also the day for enthronement of purchased soma creeper. This is enthroned as a guest on a chair and it remains so until other rituals of yaaga are completed. In puraanic story, the arrival of guest in yaaga has been stated to be on third day. The difference in statements is worth further investigation.

          Puraanic story mentions the eating of annus/rectum of sacrifical animal by a demon on fourth day of yaaga. In actual practice, an animal is actually to be sacrificed. What mystery puraanic story may reveal, is to be investigated.

          Puraanic story mentions the corrective steps in singing of mantras taken by a pole situated in the middle of sitting place in yaaga. In real yaaga, such a pole is really established and singing is really done by preists sitting under this pole.

First published : १९९४ A.D., Revised : April २००७ A.D., Vikrama samvat २०६४)

 
 

(उपरोक्त चित्र श्री सुधाकर मालवीय द्वारा अनुवादित ऐतरेय ब्राह्मण से साभार उद्धृत किया गया है)

अग्निष्टोम

टिप्पणी : शुक्ल यजुर्वेद के अध्याय ४ से ८.३२ तक अग्निष्टोम के मन्त्र हैं । जैमिनीय ब्राह्मण १.६६ - १.३६४ में अग्निष्टोम की व्याख्या दी गई है । राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक कात्यायन यज्ञ पद्धति में कात्यायन श्रौत सूत्र और शतपथ ब्राह्मण के आधार पर अग्निष्टोम यज्ञ का हिन्दी में विस्तृत वर्णन किया गया है ।

           स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में वर्णित ब्रह्मा के अग्निष्टोम यज्ञ को समझने के लिए यह जानना उपयोगी होगा कि वर्तमान में अग्निष्टोम यज्ञ का निष्पादन किस प्रकार किया जाता है । वैदिक संशोधन मण्डल, पुणे से प्रकाशित श्रौत कोश के द्वितीय ग्रन्थ, संस्कृत विभाग प्रथम में वर्तमान में निष्पादित होने वाले अग्निष्टोम याग की विधि पूर्ण विस्तार से दी गई है । इस याग का निष्पादन पांच दिनों में किया जाता है । सर्वप्रथम देवयजन तथा ऋत्विक् - वरण होता है । श्रौत कोश के वर्णन के अनुसार वेदी के स्थान का चयन यजमान की कामना पर निर्भर करता है । वेदी की भूमि का ढाल किस ओर होना चाहिए, वेदी हरित क्षेत्र में बनाई जाए या जल से प्लावित क्षेत्र में आदि । स्कन्द पुराण के वर्णन के अनुसार ब्रह्मा ने अपने देवयजन का चयन पुष्कर क्षेपण द्वारा निर्धारित किया । पुष्कर स्थान के महत्त्व को ब्रह्माण्ड पुराण के आधार पर समझा जा सकता है । पुष्कर तीन हैं - ज्येष्ठ पुष्कर, मध्यम पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर । ब्रह्माण्ड पुराण में वर्णन आता है कि परशुराम मध्यम पुष्कर में तपस्या कर रहे थे लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी । तब उन्होंने एक मृग व मृगी को परस्पर वार्तालाप करते हुए सुना जिन्हें अपने पूर्व जन्म की स्मृति जाग्रत हो गई थी । वह कह रहे थे कि यदि परशुराम कनिष्ठ पुष्कर में जाकर अगस्त्य से कृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र ग्रहण कर ले तो उसे सफलता मिल सकती है । यह संकेत करता है कि पुष्कर साधना का वह स्थान है जहां पूर्व जन्म की स्मृतियां जाग्रत होकर व्यक्ति को दिशा निर्देश देने लगती हैं ।

          अग्निष्टोम याग के प्रथम दिन यजमान और उसकी पत्नी दीक्षा ग्रहण करते हैं । स्कन्द पुराण में दीक्षा के संदर्भ में ब्रह्मा द्वारा सावित्री के स्थान पर गायत्री पत्नी के साथ दीक्षा ग्रहण करने की कथा का कोई प्रत्यक्ष वैदिक स्रोत नहीं है । लेकिन पुराणों की कथा एक महत्त्वपूर्ण तथ्य को उजागर करती प्रतीत होती है । अग्निष्टोम याग में बहुत से अवसरों पर, सुब्रह्मण्या आह्वान होता है, विशेष रूप से प्रतिदिन याग के आरम्भ में तथा अन्त में । यह आह्वान इन शब्दों में होता है - सुब्रह्मण्यों सुब्रह्मण्यों सुब्रह्मण्यों इन्द्रागच्छ हरिव आगच्छ मेधातिथेर्मेष वृषणश्वस्य मेने गौरावस्कन्दिन् अहल्यायै जार कौशिक ब्राह्मण गौतमब्रुवाण अद्य/श्व: सुत्यामागच्छ मघवन् आगच्छ देवा ब्रह्माण: । सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते पृथिवी पाद: सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते अन्तरिक्षं पाद: सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते द्यौ: पाद: सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते दिशः पाद: परोरजास्ते पंचम: पाद: । इस सुब्रह्मण्या निगद का क्या तात्पर्य है, यह अभी अज्ञात है । षड्-विंश ब्राह्मण आदि का कथन है कि याग द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति होती है । इस ब्रह्म को सुब्रह्मण्या आह्वान के द्वारा सुब्रह्म बनाना है, सारे विश्व में इसका विस्तार करना है । सुब्रह्मण्या आह्वान से पूर्व देव - पत्नियों का आह्वान किया जाता है । यह संकेत करता है कि पुराणों में सुब्रह्मण्या आह्वान को सावित्री का रूप दिया गया है । गायत्री गौ से सम्बन्धित है जबकि सावित्री अश्व से ।

          पुराणों में यज्ञ के अन्त में ब्रह्मा की पत्नी सावित्री के यज्ञ में आगमन के संदर्भ में, यज्ञ के अन्तिम दिन तृतीय सवन में सावित्र ग्रह का वर्णन आता है ( शतपथ ब्राह्मण ४.४.१.१) । सावित्री को सविता नामक आदित्य की पत्नी कहा जाता है । सविता अर्थात् सवन करने वाला, शोधन करने वाला अथवा प्रेरणा देने वाला । पुराणों में सत्यवान् - सावित्री कथा में अश्वपति द्वारा सावित्री की उपासना के माध्यम से सावित्री को अश्व से सम्बद्ध किया गया है, जबकि गायत्री को गौ कहा जाता है । गौ प्राणों से सम्बन्धित है, जबकि अश्व मन से । प्राण को समझने के लिए कौशीतकी उपनिषद ३.३ का यह कथन उपयोगी है कि प्राण प्रज्ञात्मा है । सबसे पहले वाक् रूपी ऋक् या योषा है जिसकी प्रतिष्ठा प्राण साम में है ( छान्दोग्य उपनिषद १.१.५) । प्राण ब्रह्म के लिए मन दूत का काम करता है ( कौशीतकी उपनिषद २.१) । अतः अग्निष्टोम यज्ञ में पहले वाक् और प्राण की प्रतिष्ठा की जाती है और उसके पश्चात् मन रूपी अश्व की प्रतिष्ठा हेतु सावित्री के प्राकट्य का विधान किया गया है । शतपथ ब्राह्मण ४.४.१.१ के अनुसार मन प्राण का सविता है तो प्राण मन का । सावित्री द्वारा देवों को शाप आदि के निहितार्थ अन्वेषणीय हैं ।

          अग्निष्टोम याग के प्रथम दिन के कृत्यों में से एक प्रवर्ग्य संभरण है । प्रवर्ग्य संभरण से तात्पर्य यह है कि यज्ञ में प्रवर्ग्य के निर्माण हेतु जिन मृत्तिका पात्रों की आवश्यकता होती है, जैसे महावीर पात्र, रोहिण कपाल आदि, उन पात्रों के निर्माण के लिए एक छेनी द्वारा मृत्तिका को खोदकर उसे कृष्णाजिन पर एकत्र किया जाता है । इस अवसर पर शान्ति पाठ भी किया जाता है । यह संकेत करता है कि स्कन्द पुराण में यज्ञ के प्रथम दिन जिस रुद्र के कपाल द्वारा उपद्रव करने और उसकी शान्ति करने का वर्णन है, वह वास्तविक यज्ञ के प्रवर्ग्य संभरण से सम्बन्धित हो सकता है ।

          अग्निष्टोम याग के दूसरे दिन के मुख्य कर्मों में प्रायणीय इष्टि, सोमक्रयण, सोमशकटारोहण, आतिथ्येष्टि तथा प्रवर्ग्य - उपसद कर्म हैं । यह उल्लेखनीय है कि याग के प्रारम्भ में प्रायणीय तथा अन्त में उदयनीय इष्टियां होती हैं । प्रायणीय इष्टि को यज्ञ हेतु प्रयाण कह सकते हैं जिसमें पथ्यास्वस्ति, अग्नि, सोम, सविता और अदिति नामक ५ देवताओं का यजन किया जाता है । यज्ञ के अन्त में होने वाली उदयनीय इष्टि का महत्त्व तो कथासरित्सागर की राजा उदयन की सम्पर्ण कथा के आधार पर समझा जा सकता है लेकिन प्रायणीय इष्टि के महत्त्व के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है । स्कन्द पुराण के अनुसार दूसरे दिन सनातन का हास्य-प्रिय पुत्र बटु याग में एक डुण्डुभ सर्प छोड देता है जो होता का वेष्टन कर लेता है । इस पर बटु को सर्प बन जाने का शाप प्राप्त होता है । हो सकता है कि पुराणों का डुण्डुभ शब्द किसी प्रकार से दुन्दुभि से सम्बन्ध रखता हो जो किसी कार्य के आरम्भ होने की सूचना देती है ।

          अग्निष्टोम याग में दूसरे दिन से प्रवर्ग्य कर्म आरम्भ हो जाता है । प्रवर्ग्य इष्टि से पूर्व सोम का क्रय तथा उसकी अतिथि रूप में आसन्दी पर प्रतिष्ठा की जाती है । पुराणों में यज्ञ के तीसरे दिन अतिथि के प्रकट होने और उसके द्वारा अपनी सिद्धियों की प्राप्ति के उपायों के रूप में ६ गुरुओं से शिक्षा प्राप्ति का वर्णन है । वास्तविक यज्ञ में सोम रूपी अतिथि के लिए आतिथ्य इष्टि यज्ञ के दूसरे दिन की जाती है । इसका अर्थ होगा कि यद्यपि आतिथ्य इष्टि दूसरे दिन की जाती है, लेकिन उस इष्टि के प्रभाव तीसरे दिन ही प्रकट होते हैं । यह उल्लेखनीय है कि यज्ञ के आरम्भ से ही सोम के रूप को विकसित करने के प्रयास चल  रहे हैं । श्येन द्वारा अपहृत सोम अन्धा था, तक्र था । फिर यजमान गौ के बदले सोम का क्रय करता है । इस सोम को दो बैलों वाली शकट पर लादते हैं । इसके पश्चात् सोम को अतिथि का रूप देना होता है जो कलाओं से रहित होता है । इसके प्रतीक रूप में यजमान दो बैलों की शकट में सोमलता को ढोकर पहले उसे राजासन्दी पर रखता है और फिर शकट के बैलों/अनड्वान् को एक एक करके शकट से अलग कर देता है । अब शकट स्थिर हो जाती है । शकट अथवा रथ से उतरने पर ही अतिथि का स्वागत - सत्कार किया जाता है । उसे बांहों में भरा जाता है । यह अन्वेषणीय है कि अतिथि रूपी सोम के ६ गुरुओं के रूप में यज्ञ के किस अङ्ग की व्याख्या की गई है ।    प्रवर्ग्य कर्म को प्रातः और सायंकाल दो बार किया जाता है तथा यह कर्म चौथे दिन तक प्रतिदिन किया जाता है । इस प्रकार कुल मिलाकर ६ प्रवर्ग्य तथा ६ उपसद इष्टियां सम्पन्न होती हैं । तीसरे दिन के कर्मों में वेदिमान ( महावेदी की स्थापना ) प्रमुख कर्म है ।

          चतुर्थ दिन के कृत्यों में अग्नीषोमीय याग प्रमुख कर्म है जिसमें पशु का संज्ञपन/वध किया जाता है । इसके अतिरिक्त सदोमध्य में औदुम्बरी शाखा की स्थापना की जाती है । पुराणों में यज्ञ के चतुर्थ दिन राक्षस रूप धारी विश्वावसु गन्धर्व द्वारा यज्ञार्थ पशु के अङ्गों में से गुदा भक्षण का उल्लेख है । वास्तविक यज्ञ में चतुर्थ दिन अग्नीषोमीय पशु का संज्ञपन किया जाता है और उसकी गुदा का उपयोग आहुति देने के लिए किया जाता है । निहितार्थ अपेक्षित है । यज्ञ के वर्णन के अनुसार पशु के हृदय, जिह्वा आदि अङ्गों में से गुदा ही एक ऐसा भाग है जिसके स्थ, सूक्ष्म आदि तीन भाग किए जाते हैं । इस गुदा में जो आसुरी तत्त्व है, उसका विश्वावसु राक्षण भक्षण करके उसे सूक्ष्म बना देता है ।

          यज्ञ का पांचवां दिन सुत्या अह कहलाता है और यही दिन सबसे महत्त्वपूर्ण होता है । इस दिन प्रातः सवन में सोम याग, सोम का अभिसवन व चात्वाल स्थान पर बहिष्पवमान नामक सामगान होता है । माध्यन्दिन सवन में सोम अभिषवण,  सोमयाग व यजमान द्वारा ऋत्विजों को दक्षिणा दान कर्म होते हैं । तृतीय सवन में आर्भव पवमान आदि कर्म होते हैं । पुराणों में यज्ञ के पांचवें दिन उद्गाता के शङ्कु प्रचार कर्म में औदुम्बरी कन्या द्वारा प्रकट होकर उद्गाता का प्रबोधन करने तथा औदुम्बरी के स्वर्ग गमन का वर्णन है । वास्तविक यज्ञ में औदुम्बरी शाखा का सदोमध्य में रोपण चतुर्थ दिन किया जाता है । शतपथ ब्राह्मण ३.५.१.१ तथा ३.६.१.१ के अनुसार उद्गाता विभिन्न दिशाओं में शंकुओं ( शं कुरुते इति शंकु ) की स्थापना द्वारा स्त्री शरीर रूपी यज्ञ वेदी का निर्माण करता है । सदोमध्य में औदुम्बरी शाखा की स्थापना की जाती है । कहा गया है कि औदुम्बरी शाखा की ऊंचाई पुरुष जितनी होती है । उदुम्बर पुरुष की ऊर्जा का रूप है, यह ओंकार की शक्ति है । उद्गाता का शंकु कर्म तभी सफल होगा जब औदुम्बरी शक्ति प्रकट हो जाएगी ।

          वास्तविक अग्निष्टोम याग में छठे दिन अवभृथ स्नान आदि किया जाता है और इसके पश्चात् उदयनीय व उदवसानीय इष्टियां सम्पन्न की जाती हैं ।

           स्कन्द पुराण में वर्णित यज्ञ क्रम के अनुसार सर्वप्रथम तक्र बेचती हुई गोपकन्या का गायत्री में रूपान्तरण किया जाता है । शतपथ  ब्राह्मण ३.२.४.१ के अनुसार यज्ञ का आरम्भ सोम प्राप्ति के प्रयासों से होता है जिसमें श्येन द्वारा स्वर्ग से अपहृत सोम को वेद जानने वाले गन्धर्व हर लेते हैं और वाक् रूपी पत्नी के बदले उसे मुक्त करते हैं । इसके पश्चात् यजमान द्वारा सोमविक्रयी से गौ, अज, हिरण्य आदि के बदले सोम के विधिवत् क्रय का वर्णन आता है । स्कन्द पुराण में जिस गोपकन्या को पकड कर गौ शरीर से पारण कराकर गायत्री बनाया गया, वह एक दम कहां से आ गई ? ऐसा अनुमान है कि सोम संस्था पर आधारित अग्निष्टोम यज्ञ के पूर्व अग्निहोत्र आदि हविर्यज्ञों का अनुष्ठान करना होता है और यह वाक् रूपी गोपकन्या, जो अपने सिर पर तक्र रूपी सोम ढो रही है, का विकास उन्हीं हविर्यज्ञों से हुआ होगा( पुष्टि के लिए द्रष्टव्य : जैमिनीय ब्राह्मण २.५०) । उन यज्ञों से प्राप्त सोम का रूप तक्र जैसा है । डा. फतहसिंह का विचार है कि गोपकन्या ऊर्ध्वमुखी चेतना रूपी गौ की मनोमय कोश के स्तर पर अवतरित शक्ति है । मनोमय के स्तर पर आकर यह तक्र ही बेच सकती है , पयस् तो ऊपर के कोशों में ही रह गया । इन्द्र रूपी परब्रह्म परमात्मा को इस तक्र की आवश्यकता नहीं है, वह इसे फेंक देता है । इस गोपकन्या को मेध्य बनाने के लिए इन्द्र इसे ऊर्ध्वमुखी चित्तवृत्तियों रूपी गौ के मुख में डालता है । ऐसा भी संभव है कि हविर्यज्ञों द्वारा वाक् की व्याप्ति मनोमय कोश में हो जाती हो जबकि प्राणमय कोश रूपी गौ में वाक् की व्याप्ति अथवा प्राणमय कोश को सचेतन बनाने का प्रयत्न अग्निष्टोम द्वारा करना पडता हो ।

          स्कन्द पुराण में ब्रह्मा के अग्निष्टोम यज्ञ में जिन १६ ऋत्विजों के नामों का उल्लेख है, उसी की पुनरावृत्ति पद्म पुराण १.३४.१३ में भी की गई है । अग्निष्टोम यज्ञ के विभिन्न कर्मों में ऋत्विजों के कार्यों के अनुसार पुराणों में ऋत्विजों के नामों की पुष्टि अपेक्षित है । शतपथ ब्राह्मण में यजमान द्वारा ऋत्विजों को दक्षिणा दान के संदर्भ में ही कुछ एक ऋत्विजों के नामों का उल्लेख आया है, जैसे होता रुद्र( पुराणों में भृगु), उद्गाता बृहस्पति( पुराणों में गोभिल ), ब्रह्मा यम ( पुराणों में नारद ) ।

          स्कन्द पुराण में ब्रह्मा द्वारा अग्निष्टोम - द्वय के यजन के संदर्भ में, ब्राह्मण ग्रन्थों में १२ दिनों में सम्पन्न होने वाले द्वादशाह नामक यज्ञ का वर्णन आता है । इस यज्ञ के पहले तीन दिनों की संज्ञा क्रमशः ज्योति, गौ व आयु है । इन तीन दिनों की विकसित रूप में पुनरावृत्ति अन्य ९ दिनों में होती है । छठे दिन वृत्र का मरण होता है । इसके पश्चात् तीन दिनों की संज्ञा छन्दोम है । १०वें दिन अतीन्द्रिय स्थिति हो जाती है ( ऐतरेय ब्राह्मण ) । अङ्गिरस ऋषि गण द्वादशाह के माध्यम से प्रगति करते हैं । लेकिन आदित्य गण तीव्र गति से एक दिन में ही साधना पूरी करना चाहते हैं । अतः अग्निष्टोम के पांचवें सुत्या अह के प्रातःसवन को प्रथम त्रिरात्र का रूप, माध्यन्दिन सवन को द्वितीय त्रिरात्र और तृतीय सवन को तृतीय त्रिरात्र का रूप दिया गया है । दसवां दिन स्वयं अग्निष्टोम है ( ताण्ड्य ब्राह्मण १०.५.१७, जैमिनीय ब्राह्मण ३.८) । यह तीन सवन क्रमशः पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग लोकों के प्रतीक हैं । जैमिनीय ब्राह्मण २.३४० के अनुसार ज्योति, गौ व आयु त्रिवृत् अग्निष्टुत् की अग्निष्टोम संज्ञा होती है । षड्-विंश ब्राह्मण ४.३.१ में भी अग्निष्टोम को त्रिवृत्~ कहा गया है । अन्यत्र ( ताण्ड्य ब्राह्मण २०.१.३, तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.५.६, तैत्तिरीय संहिता ७.१.५.३ आदि ) कहा गया है कि पृथिवी लोक में वसुओं की जय अग्निष्टोम द्वारा, अन्तरिक्ष में रुद्रों की उक्थ्य यज्ञ द्वारा और द्युलोक में आदित्यों की अतिरात्र यज्ञ द्वारा होती है । यहां अग्निष्टोम, उक्थ्य और अतिरात्र द्वारा क्रमशः ज्योति, गौ व आयु की प्राप्ति होती है ( जैमिनीय ब्राह्मण २.३७५) ।

          विष्णु धर्मोत्तर पुराण में वर्षा जल से तडाग की पूर्ति करने पर अग्निष्टोम फल की प्राप्ति के संदर्भ में यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि आध्यात्मिक रूप में वर्षा आदि का क्या अर्थ है । जैमिनीय ब्राह्मण २.५१ के अनुसार चक्षु का ( आनन्द से) आर्द्र होना वर्षा है जिसका विराट् स्तर पर रूप पर्जन्य वर्षण होता है । इससे आगे अन्य ऋतुओं का वर्णन आता है । जैमिनीय ब्राह्मण २.३७८ में भी अग्निष्टोम को वर्षा करने वाला कहा गया है । यह विचारणीय है कि क्या यह आनन्द अश्रुओं की वर्षा सोम अतिथि के आगमन के कारण उत्पन्न हर्ष से होती है ।

          भविष्य पुराण में सूर्यदेव का जल से अभिषेक करने पर अग्निष्टोम फल की प्राप्ति के उल्लेख के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि अग्निष्टोम द्वारा पहले आदित्य को उदित किया जाता है । अग्निष्टोम के पांचवें दिन तृतीय सवन में आदित्य ग्रह का उल्लेख आता है । ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है कि आदित्य की उदित होती हुई अवस्था अग्निष्टोम है, जब सूर्य मध्य में होता है तो वह ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ का रूप हो जाता है । आदित्य के उदित होने के पश्चात् उसका अभिषेक किया जाता है । भविष्य पुराण से मिलता जुलता उल्लेख जैमिनीय ब्राह्मण १.३८ में भी आया है ।

          पुराणों में सार्वत्रिक रूप से अग्निष्टुत्/अग्निष्टोम को चाक्षुष मनु के पुत्र कहने के संदर्भ में काठक संहिता ३४.८, तैत्तिरीय संहिता ७.२.९.१ आदि में उल्लेख है कि साधना के प्रथम चरण में अग्नि को अग्निष्टोम/अग्नि-स्तोम का रूप दिया जाता है । दूसरे चरण में अतिरात्र यज्ञ रूपी चक्षुओं में अग्निष्टोम - द्वय रूपी कनीनिकाओं( आंख के अन्दर काला भाग ) की स्थापना की जाती है । जैमिनीय ब्राह्मण २.४९ के अनुसार प्राण ही अग्निष्टोम स्तोम है । उससे पूर्व जो यज्ञ हैं, उनके द्वारा वाक् की प्रतिष्ठा की जाती है । अग्निष्टोम के पश्चात् जो यज्ञ है, वह चक्षुओं के समान हैं । जैमिनीय ब्राह्मण २.५१ के अनुसार साधना में चक्षुओं का ( आनन्द से) आर्द्र होना वर्षा के समान है । विराट् स्तर पर इसका रूप पर्जन्य वर्षण हो जाता है । तैत्तिरीय संहिता ७.२.९.२ में ज्योतिष्पक्षा गायत्री श्येन के पक्षों को अग्निष्टोम - द्वय कहा गया है । ताण्ड्य ब्राह्मण १९.१०.१ के अनुसार पक्षी स्तोम का रूप है । इस स्तोम के ९, १५, १७, २१, २०, ३३ आदि विभिन्न स्तर होते हैं जो क्रमशः प्राण/तेज/ब्रह्मवर्चस, वीर्य और आत्मा, पशु/अन्न, प्रतिष्ठा व वर्ष्म/शरीर/ब्रध्नस्य विष्टप के प्रतीक हैं । ताण्ड्य ब्राह्मण में विभिन्न स्थानों पर इन स्तोमों द्वारा विभिन्न कामनाओं की प्राप्ति के वर्णन हैं । ऐतरेय ब्राह्मण की कण्डिका ३.३९ से आरम्भ करके कुछ कण्डिकाओं में अग्निष्टोम शब्द की व्युत्पत्ति आदि का वर्णन किया गया है ।

 

संदर्भ

*तद्वै तदग्निहोत्रं त्र्यहमेव पयसा जुहुयात्। तद्वा अग्निष्टोमस्य रूपम् जै.ब्रा. १.३८

*ज्येष्ठयज्ञो वा एष प्रजापतियज्ञः यदग्निष्टोमः जै.ब्रा. १.६७

*एतावान् वाव यज्ञो यावानग्निष्टोमः जै.ब्रा. १.१७९

*स एष वा अग्निष्टोमो य एष (सूर्यः) तपत्येष इन्द्र एष प्रजापतिरेष एवेदं सर्वम् जै.ब्रा. १.३१४

*अयमेवाग्निष्टोमो योऽयं (वायुः) पवते जै.ब्रा. २.४९

*प्राण एवाग्निष्टोमस्तोमः। ये प्राञ्चो यज्ञक्रतवो वाक् ते निदानेन। य उत्तरे यज्ञक्रतवश् चक्षुस् ते निदानेन जै.ब्रा. २.४९

*एष वाव यज्ञानां विषुवान् यदग्निष्टोमः जै.ब्रा. २.४९

*वाक् का इष्ट हविर्यज्ञों से, प्राण का अग्निष्टोम से, वीक्षण का उत्तर यज्ञक्रतुओं से जै.ब्रा. २.५०

*अग्निष्टोमो विषुवान् जै.ब्रा. २.५०

*अग्निष्टोम यज्ञा वा आदित्या उक्थयज्ञा अङ्गिरसः जै.ब्रा. २.१२१

*उक्थ्यं अग्निष्टोमे अग्निष्टोमं इष्टिपशुबन्धयोः इष्टिपशुबन्धा वाग्निहोत्रे षड्.ब्रा. ५.२.१

*अग्निर्वा एष वैश्वानर उपावसृज्यते यदग्निष्टोमः कपि.क.सं. ४०.४

*अग्निप्रतिष्ठानो ह्यग्निष्टोमः काठ.सं. १४.९

*अस्मिन्नेव (पृथिवी-)लोकेऽग्निष्टोमेन प्रतितिष्ठति अन्तरिक्षे उक्थेन -- -स्वर्गे षोडशिना स्तोत्रेण काठ.सं. १४.९

*अन्तो वा अग्निष्टोमः काठ.सं. २६.१, कपि.क.सं. ४०.४

*अग्निर्वै पूर्वोऽग्निष्टोमस्सूर्य उत्तरः अतिरात्र चक्षुषी पूर्वो कनीनिका अ. उत्तरो काठ.सं. ३४.८

*त्रिवृद् अग्निष्टोमः तस्येषुं विष्टुतिं कृत्वा अभिचरन् यजेत षड्.ब्रा. ४.३.१

*वैश्वानरः अग्निष्टोमः काठ.सं. ३४.१६

*ब्रह्मवर्चसं वा अग्निष्टोमः काठ.सं. ३७.७

*स वा एष संवत्सर एव यदग्निष्टोमश्चतुर्विंशत्यर्धमासो वै संवत्सरश्चतुर्विंशतिरग्निष्टोमस्य स्तुतशस्त्राणि तं यथा समुद्रं स्रोत्या एवं सर्वे यज्ञक्रतवोऽपियन्ति ऐ.ब्रा. ३.३९

*अग्निर् अग्निष्टोमः ऐ.ब्रा. ३.४१

*स वा एषोऽग्निरेव यदग्निष्टोमस्तं यदस्तुवंस्तस्मादग्निस्तोमस्तमग्निस्तोमं संतमग्निष्टोममित्याचक्षते परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः ऐ.ब्रा. ३.४३

*यो वा एष (सूर्यः) तपत्येषोऽग्निष्टोम एव साह्नः ऐ.ब्रा. ३.४४

*अग्निष्टोमो वै संवत्सरः ऐ.ब्रा. ४.१२

*विराड् वा अग्निष्टोमः कौ.ब्रा. १५.५

*अग्निष्टोमो वै यज्ञानां मुखम् कौ.ब्रा. १९.८

*ब्रह्म वा अग्निष्टोमः कौ.ब्रा. २१.५, जै.ब्रा. १.२०७, शां.आ. २.१८

*ज्योतिर् वा अग्निष्टोमः कौ.ब्रा. २५.९

*प्रतिष्ठा वा अग्निष्टोमः कौ.ब्रा. २५.१४, तै.ब्रा. २.७.१.१

*यमराज्यं वा अग्निष्टोमेनाभिजयति मै.सं. १.८.६

*अग्निष्टोमाद् (चातुर्मास्यानाम्) वैश्वदेवं यज्ञक्रतुं निर्माय प्रजापतिः प्रजा असृजत। - मै.सं. १.१०.५, काठ.सं. ३५.२०, कपि.क.सं. ४८.१८

*एषा वै यज्ञस्य मात्रा यदग्निष्टोमः मै.सं. ३.४.४

*तस्य (अग्निष्टोमस्य) वा एतास्तन्वो यद् धिष्ण्याः मै.सं. ३.८.१०

*संवत्सरो वा अग्निष्टोमः मै.सं. ३.८.१०, ४.५.७, काठ.सं. २६.१, कपि.क.सं. ४०.४

*आग्नेयो हि अग्निष्टोमः मै.सं. ३.९.५

*यज्ञमुखं वा अग्निष्टोमः मै.सं. ४.४.१०. तां.ब्रा. १८.८.१, तै.ब्रा. १.८.७.१

*द्वादशाग्निष्टोमे स्तोत्राणि मै.सं. ४.५.४

*इममेव लोकं पशुबन्धेनाभिजयति। अथो अग्निष्टोमेन। अन्तरिक्षं उक्थेन स्वर अतिरात्रेण तै.ब्रा. ३.१२.५.६

*एतावान् वै यज्ञो यावानग्निष्टोमः तै.सं. ५.४.१०.२, काठ.सं.२२.१, २८.१, कपि.क.सं, ४४.१, तै.आ. ५.६.३

*सोऽग्निष्टोमेन वसूनयाजयत् त इमं (पृथिवी-) लोकमजयन् , उक्थेयन रुद्रान्, अतिरात्रेण आदित्यान् तै.सं. ७.१.५.३

*चक्षुषी वै एते यज्ञस्य यदतिरात्रौ, कनीनिके अग्निष्टोमा इति तै.सं. ७.२.९.१, काठ.सं. ३४.८

*कनीनिके अग्निष्टोमौ तै.सं. ७.२.९.१, तां.ब्रा. १०.४.२

*यावग्निष्टोमौ तौ पक्षौ(गायत्री ज्योतिष्पक्षस्य) तै.सं. ७.२.९.२

(प्रातःसवन में १ बहिष्पवमान + ४ आज्यस्तोत्राणि, माध्यन्दिनसवन में १ माध्यन्दिन पवमान + ४ पृष्टस्तोत्राणि, सायंसवन में १ आर्भव पवमान + १ यज्ञायज्ञीय स्तोत्र)

*पुरुषसंमितो वाऽअग्निष्टोमः मा.श. ३.९.३.३२

*अग्निर् वा अग्निष्टोमः मा.श. ३.९.३.३२

*यदाग्निष्टोममास्ते प्राणस्यैवास्यान्तं गच्छति, सर्वमायुरेति कपि.क.सं. ४४.१

*यो ह वा एष (सूर्यः) तपत्येषोऽग्निष्टोम एष साह्नः गो.ब्रा. २.४.१०

*एष वै यज्ञः स्वर्ग्यो यदग्निष्टोमः तां.ब्रा. ४.२.११

*द्वादशाग्निष्टोमस्य स्तोत्राणि तां.ब्रा. ४.२.१२, तै.ब्रा. १.२.२.१

*वीर्यं वा अग्निष्टोमः तां.ब्रा. ४.५.२१

*वीर्यं वा अग्निष्टोमो तां.ब्रा. ४.५.२१

*एष वाव यज्ञो यदग्निष्टोमः, एकस्मा अन्यो यज्ञः कामायाह्रियते सर्व्वेभ्योऽग्निष्टोमः तां.ब्रा. ६.३.१-२

*ज्येष्ठयज्ञो वा एष यदग्निष्टोमः तां.ब्रा. ६.३.८

*द्वादशस्तोत्राण्यग्निष्टोमः। एषा वा अग्निष्टोमस्य सम्मा यद् रात्रिः। तां.ब्रा. ९.१.२४

*अग्निष्टोमेन वै देवा इमं लोकम्(भूलोकम्) अभ्यजयन्( उक्थ से अन्तरिक्ष, अतिरात्र से स्वर्ग) तां.ब्रा. ९.२.९, २०.१.३

*आत्मा वा अग्निष्टोमः तां.ब्रा. १९.५.११

*आत्मा वा अग्निष्टोमः पशवः छन्दांसि आत्मन्येव तत् पशून् प्रतिष्ठापयति तां.ब्रा. १९.५.११

*ज्योतिर्वा एषोऽग्निष्टोमो ज्योतिष्मन्तं पुण्यं लोकञ्जयति य एवं विद्वानेतेन यजते तां.ब्रा. १९.११.११

*एषा वाव यज्ञस्य मात्रा यदग्निष्टोमः तां.ब्रा. २०.११.८