पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Agni अग्नि

अग्नि

टिप्पणी : वेद में अग्नि की स्तुति में बहुत से सूक्त हैं। अग्नि का तत्त्व समझने के लिए ब्राह्मण ग्रन्थों में कुछ आख्यान रचे गए हैं। अग्नि पृथिवी पर था। देवताओं ने अग्नि से कहा तुम स्वर्ग में चलो, हम तुम्हें अपना दूत बनाएंगे। तुम्हें तरह-तरह की आहुतियां मिलेंगी। यम स्वर्ग में था। यम से पितरों ने कहा तुम पृथिवी पर चलो,  हम तुम्हें राजा बनाएंगे। इस आख्यान का निहितार्थ यह है कि इस समय जो अग्नि कामाग्नि, जाठराग्नि आदि के रूप में उपस्थित है, जो पृथिवी पर रहने वाली है, इसका असली स्थान ॐ लोक है। साधना का लक्ष्य है इस अग्नि को पृथिवी से उठा कर ब्रह्म लोक में पहुंचा देना। यह तब हो सकता है जब पितर शक्तियों के रूप में उपस्थित हमारे आवेगों जैसे भूख, प्यास, निद्रा आदि, जो हमारा पालन करते हैं, के ऊपर यम का आधिपत्य हो जाए, यह आवेग अनियन्त्रित न रह कर हमारे नियन्त्रण में आ जाएं। - फतहसिंह

     हम सभी ने अपनी आरम्भिक शिक्षा की पाठ्य पुस्तकों में यह पढा है कि प्राचीन काल में यह मान्यता थी कि पांच महाभूतों के द्वारा इस ब्रह्माण्ड की रचना हुई है और वह पांच महाभूत पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। इन पांच महाभूतों का स्रोत क्या है, यह कहना तो कठिन है, लेकिन वैदिक और पौराणिक साहित्य के दृष्टिकोण से इस कथन में सत्य का अंश बहुत है। ज्योतिष शास्त्र में मंगल ग्रह को पृथिवी का पुत्र माना जाता है। वैदिक साहित्य के अनुसार पृथिवी का सूक्ष्म रूप अग्नि है(अग्निः पृथिव्याः उदैत् जैमिनीय ब्राह्मण १,३५७, अग्निमेवास्यै पृथिव्यै वत्सं प्रजापतिः प्रायच्छत् जै.ब्रा. ३.१०७)। यह अग्नि ज्योतिष शास्त्र का मंगल ग्रह है (फिर अग्नि के सूक्ष्म रूप में वायु, वायु के सूक्ष्म रूप में आकाश का स्थान है)। ज्योतिष में मंगल कल्याणकारी भी है और विनाशकारी, रौद्र भी। पांच महाभूतों का एक दूसरा पक्ष भी है। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी, इन पांच महाभूतों की सूक्ष्म तन्मात्राओं को शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गन्ध नाम दिया गया है। डा. फतहसिंह कहा करते थे कि जैन समाज में एकसंज्ञी जीव जैसे चींटी, द्विसंज्ञी जीव इत्यादि कथन बहुत प्रचलित है। इसका तात्पर्य यह है कि जब समाधि से व्युत्थान होता है तो सर्वप्रथम एकसंज्ञी जीव की स्थिति होती है शब्द मात्र। फिर जब व्युत्थान प्रबलतर होता है तो दो संज्ञाएं प्रकट होती हैं शब्द व स्पर्श। फिर वह क्रमशः त्रिसंज्ञी आदि में बदलता जाता है और अन्त में पांचों संज्ञाएं शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गन्ध प्राप्त हो जाती हैं। न्यूनाधिक रूप में यही स्थिति तो हम सबके साथ निद्रा से व्युत्थान पर भी होती है। और मूर्ति पूजा में इष्टदेव के जागने के पश्चात् कुछ कृत्य-विशेष सम्पन्न किए जाते हैं जिनको समझकर हम वास्तविक स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं। यहां प्रश्न यह उठता है कि यदि पृथिवी की तन्मात्रा का नाम गन्ध है और पृथिवी का सूक्ष्म रूप अग्नि भी है, तो क्या गन्ध और अग्नि एक ही वस्तु हैं? इसका उत्तर अन्वेषणीय है। पुराणों के अनुसार पृथिवी तत्त्व में पांच तन्मात्राओं या गुणों का संघात है शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गन्ध, जबकि अग्नि तत्त्व में केवल तीन तन्मात्राओं का संघात है शब्द, स्पर्श व रूप।

वराह पुराण १८, कूर्म पुराण १.४ आदि में उपरोक्त तथ्यों को दूसरे रूप में प्रकट किया गया है। कहा गया है कि क्रीडा करती हुई सर्वज्ञ आत्मा को आत्मा द्वारा आत्मा का भोग करने की इच्छा हुई और तब महाभूत में क्षोभ उत्पन्न होने से विकार उत्पन्न करने में रुचि हुई। उस विकार को करते हुए महा अग्नि या महदहंकार या महत् मन या भूतादि उत्पन्न हुआ, उस अहंकार या भूतादि को विकृत करने पर शब्द उत्पन्न हुआ। शब्द से आकाश उत्पन्न हुआ। आकाश की विकृति करने पर स्पर्श तन्मात्र की उत्पत्ति हुई। उससे वायु उत्पन्न हुई। वायु को विकृत करने पर रूप या ज्योति  उत्पन्न हुई। ज्योति को विकृत करने पर रस तन्मात्रा का जन्म हुआ जिससे आपः का जन्म हुआ। आपः को विकृत करने पर गन्ध तन्मात्रा का जन्म हुआ जिससे पृथिवी का जन्म हुआ। वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण हैं। अग्नि में शब्द, स्पर्श और रूप तीन गुण हैं। आपः में शब्द, स्पर्श, रूप व रस चार गुण हैं। भूमि में शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गन्ध पांच गुण हैं। पुराणों के कथन से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि यह कथन समाधि से व्युत्थान अथवा निद्रा से जागरण के समकक्ष ही है। आकाश के एक गुण, वायु के दो गुण, अग्नि के तीन गुण आदि का जो पुराणों का कथन है, इसका वैदिक प्रमाण अन्वेषणीय है।

     वैदिक साहित्य में अग्नि को इस प्रकार समझा जा सकता है कि अग्नि का एक नाम जातवेदस् है। जातवेदस् से भी अग्नि के जिस रूप की प्रतीति होती है, वह यह है कि यह वेद, ज्ञान, चेतना के सर्वप्रथम जन्म लेने की, समाधि से व्युत्थान की, निद्रा से जागने की स्थिति है। इस सर्वप्रथम उत्पन्न हुई चेतना के परिष्कार की आवश्यकता पडती है और लगता है कि यहीं से सारा वैदिक कर्मकाण्ड आरम्भ हो जाता है। लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि एक ऐसी चेतना भी है जिसमें अन्य सारी चेतनाएं लीन हो जाती हैं। इसे समाधि की ओर प्रस्थान कहा जा सकता है। इसे रात्रि, निद्रा आदि भी कहा जा सकता है। अग्निहोत्र के संदर्भ में कहा गया है कि प्रातःकाल होने पर अग्नि का लय सूर्य में हो जाता है। इसी कारण दिन के सूर्य में दाहक शक्ति है। सायंकाल होने पर सूर्य का लय अग्नि में हो जाता है। इसी कारण रात्रि में अग्नि दूर से भी दिखाई देती है। इसका अर्थ यह हुआ कि अग्नि को केवल जातवेदा अग्नि तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता(अथर्ववेद १९६४.१)। अग्नि का रात्रि में कौन सा रूप होता है, दिन में कौन सा रूप होता है, इसका सूक्ष्म रूप से अन्वेषण करने की आवश्यकता है।

अग्नि का व्यावहारिक रूप : पौराणिक आख्यानों से संकेत मिलता है कि हमें अनुभव होने वाली कोई भी वेदना, भूख, प्यास, खुजली, दर्द, शकुन, अपशकुन आदि सब अग्नि के निम्नतर रूप हो सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि यह अग्नि बृहद् रूप धारण करे, देवों को हवि ले जाने वाली अग्नि बने। वैदिक दृष्टिकोण से, अनुभव की जाने वाली वेदना को हम वाक् कह सकते हैं। किसी भी रूप में प्रकट होने वाली वाक् को सुपर्ण का रूप देना है, उसे उडने वाली बनाना है। यदि वाक् के साथ प्राण और मन का संयोग हो जाए तो वह सुपर्ण रूप धारण कर सकती है। (वाग्वै माता, प्राणः पुत्रः - - - -एकः सुपर्णः समुद्रमाविवेश - - -तं (प्राणं) माता (वाक्) रेळिह, स(प्राणः) उ रेळिह मातरम् (वाचम्) ऐ.आ. ..६)। सुपर्ण का ही दूसरा नाम संवत्सर है। वैदिक साहित्य में संवत्सर को अग्नि का परिष्कृत रूप कहा गया है(संदर्भों के लिए ब्राह्मणोद्धार कोश में अग्नि संदर्भ की संख्याएं ७१०-७१४ द्रष्टव्य हैं, उदाहरण के लिए, शतपथ ब्राह्मण ६.७.१.१८, १०.४.५.२ इत्यादि) और वैदिक संवत्सर को भौतिक जगत के संवत्सर के आधार पर समझा जा सकता है। भौतिक संवत्सर का निर्माण पृथिवी, सूर्य व चन्द्रमा के एक-दूसरे के परितः भ्रमण करने से होता है। इसी प्रकार वैदिक संवत्सर का निर्माण क्रमशः वाक्, प्राण और मन के एक दूसरे के परितः भ्रमण करने से होता है। यदि यह तीन घटक एक दूसरे से स्वतन्त्र हो जाएं तो किसी भी संवत्सर का निर्माण नहीं हो पाएगा। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि संवत्सर रूपी अग्नि का परिष्कार करना है तो पहले तो वाक्, प्राण और मन का परिष्कार करना पडेगा और फिर इन तीनों का योग किस प्रकार हो, इसका उपाय करना पडेगा।

अग्नि के विभिन्न रूप : पुरूरवा द्वारा गन्धर्वों से जो अग्नि प्राप्त की गई, वह किस रूप में थी, इसका उल्लेख नहीं है। आपस्तम्ब श्रौत सूत्र ५.२.४ के अनुसार जो अग्नि देवों से छिपकर अश्वत्थ में छिपी, वह अश्व रूप थी (अग्नि का एक रूप अश्व से भी निम्नतर है जिसे आखु/मूषक कहा गया है)। ऐसा प्रतीत होता है कि अश्व रूप अग्नि का कार्य पाण्डित्य में प्रेम का प्रादुर्भाव करना है। फिर जब पुरूरवा ने अरणियों द्वारा मन्थन किया, तो अग्नि तीन रूपों में प्रकट हुई आहवनीय, दक्षिण और गार्हपत्य। यह कहा जा सकता है कि अश्व अग्नि दिशाओं के अनुदिश अपना विस्तार करने वाली है, जबकि पुरूरवा द्वारा अरणि मन्थन से उत्पन्न अग्नि का विस्तार ऊर्ध्व दिशा में होता है।

     जैसा कि नीचे संदर्भ में दिया गया है, आपस्तम्ब श्रौत सूत्र में अग्न्याधेय(यज्ञ हेतु अग्नि की स्थापना) के संदर्भ में तीन प्रकार की अग्नियों की स्थापना हेतु मन्त्रों का विनियोग दिया गया है ब्राह्मण की अग्नि, राजन्य की अग्नि और वैश्य की अग्नि। इसका तात्पर्य यह हुआ कि किसी भी संवेदना को तीन रूपों में विभाजित किया जा सकता है ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य। चौथी शूद्र प्रकार की संवेदना के लिए किसी मन्त्र का विधान नहीं है।

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होमकाले तु संप्राप्ते न दद्यादासनं क्वचित्। दत्ते तृप्तो भवेद्वह्निः शापं दद्याच्च दारुणम्॥४५॥ आघारौ नासिके प्रोक्तौ आज्यभागौ च चक्षुषी। प्राजापत्यं मुखं प्रोक्तं कटिर्व्याहृतिभिः स्मृता॥४६॥ शीर्षहस्तौ च पादौ च पंचवारुणमीरितम्। तथा स्विष्टकृतं विप्र श्रोत्रे पूर्णाहुतिस्तथा॥४७॥ द्विमुखं चैकहृदयं चतुःश्रोत्रं द्विनासिकम्। द्विशीर्षकं च षण्नेत्रं पिंगलं सप्तजिह्वकम्॥४८॥ सव्यभागे त्रिहस्तं च चतुर्हस्तञ्च दक्षिणे। स्रुक्स्रुवौ चाक्षमाला च या शक्तिर्दक्षिणे करे॥४९॥ त्रिमेखलं त्रिपादं च घृतपात्रं द्विचामरम्। मेषारूढं चतुःशृंगं बालादित्यसमप्रभम्॥५०॥ उपवीतसमायुक्तं जटाकुंडलमंडिमम्। ज्ञात्वैवमग्निदेहं तु होमकर्मसमाचरेत्॥५१॥ - नारद पुराण १.५१.४५

     नारद पुराण के उपरोक्त कथन में अग्नि को त्रिपाद कहा गया है जबकि गोपथ ब्राह्मण १.२.९ में षट्पाद (अग्निः षट्पादस्तस्य पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौराप ओषधिवनस्पतय इमानि भूतानि पादाः तेषां सर्वेषां वेदा गतिरात्मा प्रतिष्ठिताः) कहा गया है। अग्नि के स्वरूप के विषय में ऋग्वेद ४.५८.३ की ऋचा को प्रमाण माना जाता है : च॒त्वारि॒ शृङ्गा॒ त्रयो॑ अस्य॒ पादा॒ द्वे शी॒र्षे स॒प्त हस्ता॑सो अस्य। त्रिधा॑ ब॒द्धो वृ॑ष॒भो रो॑रवीति म॒हो दे॒वो मर्त्याँ॒ आ वि॑वेश॥ जिस सूक्त की यह ऋचा है, उसके आरम्भिक शब्द यह हैं समुद्रादूर्मिर्मधुमाँ उदारत् इत्यादि। और इस सूक्त का देवता अग्नि या सूर्य या आपः या गावः या घृतस्तुति कहे गए हैं। सायण भाष्य के अनुसार ऋचा का विनियोग द्वादश अह नामक सोमयाग के सप्तम दिन में किया जाता है(आश्वलायन श्रौत सूत्र ८.९)। सातवें दिन से लेकर नवें दिन तक दिवसों की संज्ञा छन्दोम होती है। यह छठें दिन वृत्र मरण के पश्चात् आनन्द समुद्र की स्थिति है। इन तीन दिवसों में नाम-रूप की प्रधानता रहती है। इसका अर्थ यह हुआ कि पहले ६ दिन अन्तर्जगत की साधना के हैं, बाद के तीन दिन बाह्यजगत की साधना के। सूक्त/ऋचा के विभिन्न देवताओं का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि इस स्थिति में अग्नि का स्वरूप केवल अग्नि तक ही सीमित नहीं रहेगा, अपितु वह सूर्य, आपः, गावः, घृत आदि का रूप भी धारण कर सकता है, क्योंकि यह आनन्द समुद्र की स्थिति है।

यह सूक्त यद्यपि शौनकीय अथर्ववेद में उपलब्ध नहीं है, किन्तु पैप्पलाद संहिता ८.१३ में उपलब्ध है और अथर्ववेद के गोपथ ब्राह्मण १.२.१६ में इसका स्पष्टीकरण भी उपलब्ध है। इस स्पष्टीकरण के अनुसार अग्नि के चार शृङ्गों के उल्लेख से तात्पर्य पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आपः इन चार लोकों से, या अग्नि, वायु, आदित्य व चन्द्रमा नामक चार देवों से या ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद इन चार वेदों से या होता, अध्वर्यु, उद्गाता व ब्रह्मा इन होताओं से हो सकता है। तीन पादों से तात्पर्य सोमयाग के तीन सवनों से हो सकता है, दो शीर्षों से तात्पर्य ब्रह्मौदन व प्रवर्ग्य से हो सकता है, सात हाथों से तात्पर्य सात छन्दों से हो सकता है, वृषभ के तीन बन्धनों से तात्पर्य मन्त्र, कल्प व ब्राह्मण से हो सकता है।

गोपथ ब्राह्मण १.२.१६ में अग्नि के तीन पादों के रूप में तीन सवनों का उल्लेख किया गया है। पादों से तात्पर्य होता है जो भूतों को, जड जगत को पद प्रदान करता है, गति देता है। सोमयाग के एक दिन में सोम का शोधन तीन चरणों में होता है जिन्हें सवन कहा जाता है। सोम को शुद्ध करके देवों को अर्पित किया जाता है। यद्यपि सोम को अमृत कहा गया है, लेकिन प्रकृति में अवतरित होकर वह जडीभूत हो जाता है। अतः देवों को अर्पित करने से पहले उसका शोधन करना पडता है। प्रातःसवन में जो सोम प्राप्त होता है, वह गायत्री का रूप होता है। हो सकता है कि साधना के क्षेत्र में यह प्रेम का प्रतीक हो। प्रातःसवन में जो सामगान होता है, उसे आज्यस्तोत्र कहा जाता है। आज्य अर्थात् आ-ज्योति। व्यवहार में आज्य उस घृत को कहते हैं जो दूध के ऊपर अपने आप तिर आता है, उसके लिए किसी परिश्रम की आवश्यकता नहीं पडती। जो सोम इतना शुद्ध नहीं हो सकता, उसको अगले सवनों के लिए छोड दिया जाता है। फिर माध्यन्दिन सवन में जो सोम देवों को प्रस्तुत किया जाता है, वह त्रिष्टुप् छन्द का रूप होता है। माध्यन्दिन सवन दक्षता प्राप्ति के लिए, दक्षिणा देने आदि के लिए होता है। जहां प्रेम से काम चल जाता है, वहां दक्षता सौ प्रतिशत होती है। लेकिन जहां प्रेम नहीं होता, वहां दक्षता में न्यूनता आ ही जाती है। जड प्रकृति में प्रेम के लिए कोई स्थान नहीं है, सब कार्य बिना दक्षता के ही चलता है। और आधुनिक विज्ञान के नियमों द्वारा हम जानते हैं कि किसी भी कार्य में सौ प्रतिशत दक्षता प्राप्त करना संभव नहीं है। कुछ न कुछ ऊर्जा व्यर्थ चली ही जाती है। इस बेकार ऊर्जा का, बेकार सोम का शोधन तीसरे सवन में किया जाता है। तीसरे सवन में जगती छन्द की प्रतिष्ठा होती है। इस प्रकार कोई भी सोम बिना देवों की आहुति के शेष नहीं बचना चाहिए। यह तो सोमयाग के प्रतीकों से जो समझ में आता है, उसका उल्लेख है। इस कथन को और अधिक व्यावहारिक रूप में समझने के लिए  नारद पुराण १.५०.२० में संगीत के संदर्भ में तीन सवनों का उल्लेख हमारी सहायता करता है। तीन सवनों को उर, कण्ठ व शिर का रूप दिया गया है। स्वरों का उदय प्रायः उर से होता है और फिर वह स्वर उठ कर कण्ठ और शीर्ष से टकराते हैं। संगीत विज्ञान में इन्हें मन्द्र, मध्यम और तार स्वर नाम दिया गया है(विष्णुधर्मोत्तर पुराण ३.१८.१)। किसी भी राग में मुख्य प्रयोग वाद्य के मध्यम स्वरों का ही होता है, मन्द्र और तार स्वरों का प्रयोग बहुत कम होता है। इस प्रकार विभिन्न स्वरों का उदय होता कहा गया है। उर/हृदय प्रेम का स्थान होता है, जबकि शीर्ष तर्क-वितर्क का। अग्नि के तीन पादों का विष्णु के तीन पादों (उरुक्रमों) से क्या साम्य हो सकता है, यह अन्वेषणीय है।

नारद पुराण के उपरोक्त कथन में अग्नि को सप्तजिह्व कहा गया है। महानारायणोपनिषद ८.४/२.१२.२ का कथन है कि जन्तु की आत्मा से ही सात जिह्वाएं निकलती हैं(अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः। - - - -सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्सप्तार्चिषः समिधः सप्त जिह्वाः)।  

 

गोपथ ब्राह्मण के स्पष्टीकरण में दो शीर्षों ब्रह्मौदन और प्रवर्ग्य को आगे समझने की आवश्यकता है। शीर्ष का निर्माण उदान प्राण से होता है। इसीलिए इसे ब्रह्म-ओदन/उदान कहा गया है। सारी देह को पकाकर जो फल निकलता है, शीर्ष उसका प्रतीक होता है। ऐसा अनुमान है कि ब्रह्मौदन ब्रह्माण्ड की वह ऊर्जा है जिसका उपयोग दैवी नियमों के अनुसार हो रहा है, वह नियम जिनके अनुसार ऊर्जा का क्षय नहीं होता, प्रेम। हो सकता है कि ब्रह्मौदन गौ का रूप हो। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रवर्ग्य ब्रह्माण्ड की वह ऊर्जा है जिसका उपयोग प्रकृति कर रही है और वह ऊर्जा लगातार ऋणात्मकता की ओर जा रही है, उसकी अव्यवस्था में, एण्ट्रांपी में लगातार वृद्धि हो रही है। उसे उच्छिष्ट भी कहा गया है। प्रवर्ग्य शीर्ष की यह विशेषता है कि वह देह से कट कर सारे ब्रह्माण्ड में फैल जाता है। एक आख्यान आता है कि विष्णु अपने धनुष की डोरी/गुण/ज्या पर सिर रखकर सोए हुए थे और वम्रियों/दीमकों(साधना के क्षेत्र में वर्म, कवच, सारी देह पर देवों की स्थापना, वर्म=वम्रि) ने धनुष के गुण को काट डाला जिससे विष्णु का सिर कट कर अदृश्य हो गया। विष्णु ही यज्ञ है। ऐसा अनुमान है कि जब सारी देह दिव्य वर्म/कवच से बंध जाएगी तो देह की रक्षा करने वाली प्रवर्ग्य ऊर्जा की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। जब देवों ने कुरुक्षेत्र में यज्ञ किया तो वह यज्ञ पूरा ही नहीं हो पाया क्योंकि उसका शीर्ष नहीं था। आख्यान में आगे वर्णन है कि दधीचि ऋषि ने अश्विनौ को मधु विद्या का उपदेश दिया जिसके द्वारा वे यज्ञ का शीर्ष पुनः जोड सके (इ॒च्छन्नश्व॑स्य॒ यच्छिरः॒ पर्व॑ते॒ष्वप॑श्रितम्। तद् वि॑दच्छर्य॒णाव॑ति ऋ. १.८४.१४)। इसका अर्थ हुआ कि प्रवर्ग्य शीर्ष किसी प्रकार से मधुविद्या से सम्बन्धित है। सोमयाग सम्पन्न करने हेतु सबसे पहले प्रवर्ग्य सम्भरण कृत्य सम्पन्न किया जाता है और उसके पश्चात् ही सोमलता का उपयोग देवों को आहुति देने हेतु शोधन के लिए किया जा सकता है।   प्रवर्ग्य सम्भरण का अर्थ होगा कि सभी दिशाओं से ऊर्जा की प्राप्ति जिस रूप में भी सम्भव हो, उसे प्राप्त करना। कर्मकाण्ड में प्रवर्ग्य सम्भरण इस प्रकार किया जाता है कि कच्ची मिट्टी से बने महावीर नामक पात्र में घृत भर कर उसे अग्नि पर तपाया जाता है और फिर तपते हुए घृत में गौ पयः और अज पयः का सिंचन किया जाता है जिससे बडी ऊंची ज्वालाएं उठती हैं। जब संवत्सर-पर्यन्त प्रवर्ग्य संभरण हो जाए, उसके पश्चात् ही अतिथि सोम का उपयोग देवों को आहुति देने हेतु किया जाता है। इसका अर्थ होगा कि जो भी ऊर्जा प्राप्त हो, उसका संवत्सर से एकीकरण होना चाहिए।

अग्नि देवता की जो मूर्तियां प्राप्त हो रही हैं, उनमें अग्नि द्विमुखी भी है और एकमुखी भी। इसका निहितार्थ अपेक्षित है। दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में अग्नि की जो एकमुखी मूर्तियां रखी हुई हैं, उनको अग्नि के रूप में चिह्नित करने के पीछे क्या तर्क है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

गोपथ ब्राह्मण में अग्नि के चार शृङ्गों के रूप में पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ व आपः का उल्लेख है। फिर अथवा कहकर इन्हें अग्नि, वायु, आदित्य और चन्द्रमा कह दिया गया है। फिर अथवा कहकर इन्हें ऋग्वेद, यजु, साम और अथर्व कह दिया गया है। फिर अथवा कहकर इन्हें होता, अध्वर्यु, उद्गाता व ब्रह्मा कह दिया गया है। यह कथन संकेत करता है कि स्थूल रूप में अग्नि के चार शृङ्ग पृथिवी, अन्तरिक्ष आदि हैं। सूक्ष्म रूप में प्रवेश करने पर पृथिवी की ज्योति अग्नि शृङ्ग बन जाती है, अन्तरिक्ष की ज्योति वायु है इत्यादि। इससे भी सूक्ष्म स्थिति में प्रवेश करने पर वह ऋक्, यजु आदि बन जाते हैं। इससे भी सूक्ष्म स्थिति में प्रवेश करने पर वह होता, अध्वर्यु आदि बन जाते हैं। वैदिक साहित्य में शृङ्ग का कार्य राक्षसों को नष्ट करना कहा गया है। नाद के एक प्रकार में शृङ्ग नाद होता है जिसका विनियोग शत्रु के विरुद्ध अभिचार हेतु किया गया है(शिव पुराण)। यदि शृङ्ग को शिखा के तुल्य मान लिया जाए(पर्वत शृङ्ग को शिखर कहते ही हैं) तो कथासरित्सागर में अग्निशिख की कथाओं के आधार पर अग्नि के चार शृङ्ग परा, पश्यन्ती, मध्यमा व वैखरी वाक् हो सकते हैं। जब व्यवहार में उतरते हैं तो यह शृङ्ग गड्ढे में धंस जाते हैं, सारा कार्य बिना शृङ्गों के ही सम्पन्न होता है। इन्हें उबारने की आवश्यकता है। गोपथ ब्राह्मण में इन शृङ्गों के क्रमिक विकास की क्या स्थिति होगी, इसका कथन है। ऋक् का अर्थ है वह वाक् जो किसी कार्य को सम्पन्न करने से पहले ही भूत और भविष्य का ज्ञान करा देती हो। शृङ्ग के संदर्भ में एकमात्र सूचना नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद में उपलब्ध होती है जहां प्रतीत होता है कि प्रणव के अक्षरों को शृङ्ग कहा गया है?

      

रक्तं जटाधरं वह्निं कुर्याद्वै धूम्रवाससम्। ज्वालामालाकुलं सौम्यं त्रिनेत्रं श्मश्रुधारिणम्॥१॥ चतुर्बाहुं चतुर्दंष्ट्रं देवेशं वातसारथिम्। चतुर्भिश्च शुकैर्युक्तं धूमचिह्नरथे स्थितम्॥२॥ वामोत्सङ्गगता स्वाहा शक्रस्येव शची भवेत्। रत्नपात्रकरा देवी वह्नेर्दक्षिणहस्तयोः॥३॥ ज्वालात्रिशूलौ कर्तव्यौ चाक्षमाला तु वामके। रक्तं हि तेजसो रूपं रक्तवर्णं ततः स्मृतम्॥४॥ वातसारथिता तस्य प्रत्यक्षं धूम्रक्षेत्रता। प्रत्यक्षा च तथा प्रोक्ता यागधूम्राभवस्त्रता॥५॥ अक्षमालां त्रिशूलं च जटाजूटत्रिनेत्रता। सर्वाभरणधारित्वं व्याख्यातं तस्य शम्भुना॥६॥ ज्वालाकारं परं धाम हुतं तेन प्रतीच्छति। गृहीत्वा सर्वदेवेभ्यो ततो नयति शत्रुहन्॥७॥ वाग्दण्डमथ धिग्दण्डं धनदण्डं तथैव च। चतुर्थं वधदण्डं च दंष्ट्रास्तस्य प्रकीर्तिताः॥८॥ श्मश्रु तस्य विनिर्दिष्टं दर्भाः परमपावनम्। ये वेदास्ते शुकास्तस्य रथयुक्ता महात्मनः॥९॥ आग्नेयमेतत्तव रूपमुक्तं पापापहं सिद्धिकरं नराणाम्। ध्येयं तवैतन्नृप होमकाले सर्वाग्निकर्मण्यपराजितेन॥१०॥ - विष्णुधर्मोत्तर पुराण ३.५६

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई., संशोधन : २८-१२-२०१२ई.(मार्गशीर्ष पूर्णिमा, विक्रम संवत् २०६९)

संदर्भ

*अग्ने॑ स॒मिध॒माहा॑र्षं बृहते जा॒तवे॑दसे। मे॑ श्र॒द्धां च॑ मे॒धां च॑ जा॒तवे॑दाः॒ प्र य॑च्छतु॥ - शौ.. १९.६४.

*संवत्सर एवाग्निः मा.श. १०.४.५.२

*संवत्सर एषोऽग्निः मा.श. ६.७.१.१८

*संवत्सरः खलु वा अग्नेर्योनिः तै.सं. २.२.५.६

*संवत्सरोऽग्निः तां.ब्रा. १०.१२.७, मा.श. ६.३.१.२५, ६.३.२.१०, ६.६.१.१४

*संवत्सरोऽग्निः वैश्वानरः तै.सं. ५.१.८.५, ५.२.६.१, ५.४.७.६, मै.सं. १.७.३, ऐ.ब्रा. ३.४१

*संवत्सरो वा अग्निर्वैश्वानरः तै.सं. २.२.५.१, मै.सं. २.३.५, २.५.६, ३.१.१०, ३.३.३, ३.१०.७, ४.३.७, काठ.सं. १०.३, १०.४, ११.८, कपि.क.सं. ८.४, तै.सं. १.७.२.५, मा.श. ६.६.१.२०, ८.२.२.८

*संवत्सरो वा अग्निर्नाचिकेतः तै.ब्रा. ३.११.१०.२, ३.११.१०.४

*संवत्सरो वा एष यदग्निः तै.सं. ५.६.९.२

*संवत्सरोऽग्नेर्योनिः काठ.सं. १९.९

*यदिदं घृते हुते प्रतीवार्चिरुज्ज्वलत्येषा वा अस्य (अग्नेः) सा तनूर्ययापः प्राविशत्। - काठ.सं. ८.९

*यदिदं घृते हुते शोणमिवार्चिरुज्ज्वलत्येषा वा अस्य सा तनूर्ययामुमादित्यं प्राविशत् काठ.सं. ८.९

*अग्निं गृह्णामि सुरथं यो मयोभूर्य उद्यन्तमारोहति सूर्यमह्ने। - आप.श्रौ.सू. ४.१.८

*इदमहमग्निज्येष्ठेभ्यो वसुभ्यो यज्ञं प्रब्रवीमि। - आप.श्रौ.सू. ४.२.२

*अग्न्याधेयम् अथादधाति घृतवतीभिराग्नेयीभिर्गायत्रीभिर्ब्राह्मणस्य त्रिष्टुग्भी राजन्यस्य जगतीभिर्वैश्यस्य। समिधाग्निं दुवस्यतेत्येषा। उप त्वाग्ने हविष्मतीर्घृताचीर्यन्तु हर्यत। जुषस्व समिधो मम॥ तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्येति ब्राह्मणस्य॥ समिध्यमानः प्रथमो नु धर्मः समक्तुभिरज्यते विश्ववारः। शोचिष्केशो घृतनिर्णिक् पावकः सुयज्ञो अग्निर्यजथाय देवान्। घृतप्रतीको घृतयोनिरग्निर्घृतैः समिद्धो घृतमस्यान्नम्। घृतप्रुषस्त्वा सरितो वहन्ति घृतं पिबन्सुयजा यक्षि देवान्॥ आयुर्दा अग्न इति राजन्यस्य॥ त्वामग्ने समिधानं यविष्ठ देवा दूतं चक्रिरे हव्यवाहम्। उरुज्रयसं घृतयोनिमाहुतं त्वेषं चक्षुर्दधिरे चोदयन्वति। त्वामग्ने प्रदिव आहुतं घृतेन सुम्नायवः सुषमिधा समीधिरे। स वावृधान ओषधीभिरुक्षित उरु ज्रयांसि पार्थिवा वितिष्ठसे॥ घृतप्रतीकं व ऋतस्य धूर्षदमग्निं मित्रं न समिधान ऋञ्जते। इन्धानो अक्रो विदथेषु दीद्यच्शुक्रवर्णामुदु नो यंसते धियमिति वैश्यस्य। - आप.श्रौ.सू. ५.६.२