पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Agneeshoma अग्नीषोम

अग्नीषोम

टिप्पणी : हमारे भीतर ही जो ऊर्जा नीचे से ऊपर को जाती है, यह है अग्नि। ऊपर से नीचे की ओर आने वाली ऊर्जा सोम कहलाती है। इन दोनों के मिलन से एक ज्योति उत्पन्न होती है जिस पर ध्यान केन्द्रित करने से सारी चित्तवृत्तियां समाहित हो जाती हैं, बंध जाती हैं। यही अग्नीषोमीय पशु है। -- फतहसिंह

महाभारत अनुशासन पर्व में स्वर्ण के अग्नीषोमात्मक होने का कथन अग्नीषोम सम्बन्धी कथाओं को समझने की पहली कुंजी है। शिव पुराण आदि में इस स्वर्णिम अवस्था को भस्म नाम दिया गया है। शतपथ ब्राह्मण १.६.३.१९ में पौर्णमास यज्ञ के अन्तर्गत अग्नीषोम के संदर्भ में इन्द्र द्वारा त्वष्टा-पुत्र विश्वरूप व वृत्र वध का आख्यान वर्णित है लेकिन इस कथा का पूर्ण रूप केवल महाभारत शान्ति पर्व में ही उपलब्ध है जहां हिरण्यकशिपु हिरण्यगर्भ/वसिष्ठ के बदले विश्वरूप को अपना पुरोहित बना लेता है। तब इन्द्र विश्वरूप व तत्पश्चात् वृत्र का वध करते हैं। इसका निहितार्थ होगा कि अग्नीषोम रूपी स्वर्णिम ज्योति का विकास सबसे पहले हिरण्यकशिपु के रूप में होता है जिसका उपयोग चाहे तो वसिष्ठ पुरोहित द्वारा देवभाग को पुष्ट करने के लिए किया जा सकता है, अथवा विश्वरूप पुरोहित के रूप में आसुरी भाग को पुष्ट करने में। कथा में विश्वरूप के तीन शिरों का इन्द्र द्वारा छेदन की कथा का मूल वेदमन्त्रों में ढूंढना अपेक्षित है। हो सकता है कि तीन सिर आहवनीय अग्नि, गार्हपत्य अग्नि और दक्षिणाग्नि से सम्बन्धित हों। वृत्र की उत्पत्ति के संदर्भ में पुराण कथाओं में त्वष्टा द्वारा अवशिष्ट सोम से होम की बात कही गई है, जबकि ऋग्वेद १.९३.४ में बृसय के शेष से वृत्र की उत्पत्ति प्रतीत होती है। तैत्तिरीय ब्राह्मण २.८.७.९ में बृसय के स्थान पर प्रथय शब्द आया है। कथा में इन्द्र द्वारा वृत्र पर वज्र प्रहार करने के संदर्भ में ब्राह्मण ग्रन्थों में सार्वत्रिक रूप से वर्णन आता है ( उदाहरणार्थ, तैत्तिरीय संहिता २.५.२.१) कि वज्र प्रहार करने के समय अग्नीषोम-द्वय ने इन्द्र से कहा कि प्रहार मत करो, हम वृत्र के मुख में बैठे हुए हैं। तब इन्द्र ने उनको वृत्र के मुख से छुटकारा दिलाने का उपाय किया। अग्नीषोम-द्वय ने वृत्र के मुख से बाहर निकलने पर पुरस्कार मांगा। तब इन्द्र ने उऩ्हें पूर्णिमा को अग्नीषोमीय एकादश कपाल पुरोडाश देने की व्यवस्था की। अग्नीषोम-द्वय द्वारा वृत्र के मुख से बाहर निकलने पर उनका तेज वृत्र के अन्दर ही रह गया। तब गौ को भेजकर, जो सबकी मित्र है, उस तेज को प्राप्त किया गया। पुरस्कार के रूप में गौ के दुग्ध में घृत और पयः दोनों को रखने की व्यवस्था की गई जिसेपीकर देवता तृप्त होते हैं। पुराणों में इस आख्यान के बदले सार्वत्रिक रूप से वृत्र रूपी ब्रह्महत्या के भय से जल में कमलनाल में छिपने और नहुष द्वारा इन्द्र पद प्राप्ति आदि की कथा आती है जिसका निहितार्थ अपेक्षित है। इन्द्र द्वारा वृत्र पर चलाए गए दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र के संदर्भ में ऐसा प्रतीत होता है कि वज्र का निर्माण अमावास्या को किया गया होगा क्योंकि दर्श-पूर्णमास यज्ञ में अमावास्या को ही इन्द्र हेतु दधि की हवि का विधान है।

     पौर्णमास यज्ञ में पांच हवियों का विधान है जो इस प्रकार हैपांच प्रयाज, दो आघार, २ आज्य भाग(आग्नेय व सौम्य), आग्नेय पुरोडाश, अग्नि स्विष्टकृत्(गोपथ ब्राह्मण १.३.१० आदि)। आज्यभाग-द्वय के विषय में ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है कि वृत्र के मुख से निकलने पर अग्नीषोम-द्वय की पहली मांग यह थी कि हमें आज्य भाग प्राप्त हो। यह आज्य-द्वय सूर्य और चन्द्रमा रूपी चक्षु-द्वय के प्रतीक हैं।

     योगवासिष्ठ का यह कथन कि अग्नीषोम के द्वारा संक्रान्तियों/सन्धियों को समझना चाहिए, अग्नीषोम को समझने की दूसरी कुंजी है जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। शतपथ ब्राह्मण १.६.३.२४ के अनुसार अग्नीषोमीय उपांशु याज से अहोरात्रों को प्राप्त करते हैं तथा अग्नीषोमीय पुरोडाश से अर्धमासों को प्राप्त करते हैं। शतपथ ब्राह्मण ११.२.६.५ के अनुसार आग्नेय पुरोडाश दक्षिण पक्ष है, अग्नीषोमीय उपांशुयाज हृदय की भांति मध्य में स्थित है जबकि अग्नीषोमीय पुरोडाश उत्तर पक्ष है। उपांशु याज कर्म तूष्णीं किया जाता है, जबकि पुरोडाश कर्म उच्च स्वर में। उपांशु याज में आज्य से यजन किया जाता है जो असुरों का नाश करता है क्योंकि आज्य वज्र है(द्र. आज्य पर टिप्पणी; शतपथ ब्राह्मण १.६.३.२७)। पुरोडाश को समझने के संदर्भ में कहा जाता है कि यह कूर्म प्राण का, उदान प्राण का रूप है जिसने मेधा का, मस्तिष्क का रूप ग्रहण कर लिया है। यह पशु की, जिसको मेध्य बनाना है, एक प्रतिमा है, लघु रूप है(ऐतरेय ब्राह्मण २.९)। इस पुरोडाश में से अंगुष्ठ-द्वय मात्र निकाल कर प्रत्येक ऋत्विज भक्षण करता है। शतपथ ब्राह्मण ९.४.३.१० में अग्नि चयन के संदर्भ में दसों दिशाओं में अग्नीषोमीय पशु पुरोडाश की हवि का उल्लेख है, क्योंकि अग्नि दस दिशाओं में व्याप्त है। अग्नीषोमीय पुरोडाश कर्म के पश्चात् अग्नि स्विष्टकृत् कर्म होता है। पुरोडाश ग्रहण करने से ही अग्नि का अनिष्ट स्विष्ट में बदलता है(शतपथ ब्राह्मण ५.३.३.१०)।

     दर्शपूर्णमास याग में जहां अग्नीषोमीय-पुरोडाश के रूप में यजमान रूपी पशु की केवल प्रतिमा मात्र का संस्कार किया गया था, अग्निष्टोम नामक यज्ञ में पूरे यजमान पशु का ही संस्कार कर दिया जाता है। यज्ञ में प्रथम दिन दीक्षा कर्म होता है जो श्रद्धा का रूप है(शतपथ ब्राह्मण १२.१.२.१)। यह ऐसे है जैसे यजमान रूपी पशु को अग्नीषोम ने भोजन के लिए अपने मुख में रख लिया हो(शतपथ ब्राह्मण ३.३.४.२१)। यज्ञ के चतुर्थ दिन, जो यज्ञ के मुख्य सुत्या नामक पांचवें दिन से पहला दिन होता है, को उपवसथ संज्ञा दी गई है। इस दिन यजमान रूपी अग्नीषोमीय पशु का वास्तविक संस्कार करके उसे पांचवें दिन देवों को हवि देने योग्य बनाया जाता है। वास्तविक यज्ञ कर्म में यजमान के स्थान पर छाग(छिन्न गत यस्य स छागः ?) का उपयोग किया जाता है। अथर्ववेद ९.६.६ का कथन है कि अग्नीषोम पशु का संस्कार अतिथि को तृप्त करने जैसा है(यत् तर्पणमाहरन्ति य --- ) । जैमिनीय ब्राह्मण १.२१ के अनुसार अग्नीषोमीय कर्म गौ से दुग्ध प्राप्त कर लेने जैसा है, जबकि दुग्ध दुहने का काल अश्विनौ जैसा है। वास्तविक यज्ञ कर्म में यजमान रूपी पशु का संज्ञपन किया जाता है, उसकी चेतना को विस्तीर्ण चेतना या संज्ञा का रूप दिया जाता है जिसका यज्ञ कर्म में स्थान उत्तरवेदी होता है। हो सकता है कि महाभारत शान्तिपर्व आदि में अग्नीषोम के संदर्भ में जिस वडवामुख महर्षि द्वारा समुद्र जल के क्षारीय जल को पीकर शुद्ध करने का वर्णन है, वह चेतना की यही उत्तर स्थिति हो। ऋग्वेद १.९३.५ भी इस संदर्भ में द्रष्टव्य है जहां अग्नीषोम द्वारा सिन्धु को पाप से मुक्त करने का उल्लेख है।

     शान्ति पर्व में अग्नीषोम के संदर्भ में आख्यानों के माध्यम से क्षत्रत्व का ब्रह्मणत्व में व ब्रह्मणत्व का क्षत्रत्व में परिवर्तन वैदिक साहित्य में अग्नीषोम के वर्णन को समझने की तीसरी कुंजी है। वैदिक साहित्य में जब क्षत्रिय को शत्रुओं से रक्षा का कार्य, वृत्र वध का कार्य करना होता है, उसका निरूपण ११ अक्षरों वाले त्रिष्टुप् छन्द से किया जाता है। इसी के प्रतीक रूप में अग्नीषोमीय पुरोडाश को ११ कपाल वाला बनाया जाता है। इसके द्वारा अनिष्टकृत अग्नि स्विष्टकृत् (सु-इष्टकृत्) बनती है(शतपथ ब्राह्मण १२.८.३.१९)। जब ब्रह्मवर्चस की, सोम की प्राप्ति करनी होती है तो ८ कपालात्मक अग्नीषोमीय पुरोडाश का विधान है(तैत्तिरीय संहिता २.३.३.३)। अग्नीषोम में अग्नि अन्नाद है, अन्न का भक्षण करने वाली है, जबकि सोम अन्न है(तैत्तिरीय संहिता ३.४.३.३)। अथवा दूसरे शब्दों में यो कह सकते हैं कि अग्नि का विकास इस स्तर तक किया जाता है कि वह अन्न का भक्षण करके उसेदेवों तक पहुंचा सके। दूसरी ओर सोम को ऐसा सर्वश्रेष्ठ अन्न बनना है जिससे देवगण तृप्त हो सकें। अथर्ववेद ३.१३.५ तथा तैत्तिरीय संहिता ५.६.१.३ में कुम्भ इष्टका मन्त्र के संदर्भ में कहा गया है कि आपः भद्र हों, घृत जैसे हों जो अग्नि को बुझाएं नहीं, अपितु प्रज्वलित करें।

     ऋग्वेद १.९३, १०.१९.१ व अथर्ववेद १.८.१, ६.५४, ६.९३.३, ७.११९ सूक्त अग्नीषोम देवता के हैं लेकिन इनमें से ऋग्वेद १.९३ सूक्त का सार्वत्रिक रूप से अग्नीषोमीय कर्म में विनियोग हुआ है(उदाहरण के लिए, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.८.७.९)। तैत्तिरीय संहिता ३.४.३.१ में अग्नीषोम की सोम व अग्नि आदि से उत्पत्ति के संदर्भ में एक आख्यान का वर्णन किया गया है।

प्रथम लेखन : १९९३ ई.