पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Agastya अगस्त्य

अगस्त्य मुनि की कथा के माध्यम से आत्मज्ञान द्वारा आत्मभाव के विस्तार एवं महत्त्व का चित्रण

 - राधा गुप्ता

अरण्यकाण्ड (सर्ग 11 से 13) में वर्णित अगस्त्य मुनि की कथा का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है -

कथा का संक्षिप्त स्वरूप

सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में निवास करते हुए एक दिन जब राम के मन में मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य के दर्शन की इच्छा हुई, तब सुतीक्ष्ण ने उन्हें अगस्त्य आश्रम में पहुँचने हेतु मार्ग का यथायोग्य दिशा - निर्देश दिया। तदनुसार राम लक्ष्मण और सीता के साथ अगस्त्य आश्रम की ओर चल दिए। मार्ग में चलते हुए राम ने अगस्त्य के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा कि अगस्त्य जी ने एक बार लोकहित की कामना से दो असुरों को दग्ध किया था और दक्षिण दिशा को शरण लेने योग्य बना दिया था। असुरों का वर्णन करते हुए राम ने कहा कि इन्वल और वातापि नाम के दो असुर थे। वे दोनों भाई साथ - साथ रहते थेर ब्राह्मणों की हत्या करते थे। इल्वल ब्राह्मणों को श्राद्ध - भोजन के लिए निमन्त्रित करता था और वातापि को शाक के रूप में पकाकर ब्राह्मणों को खिला देता था। जब ब्राह्मण भोजन कर लेते थे, तब इल्वल वातापि को पुकारता था और इल्वल की पुकार सुनकर वातापि ब्राह्मणों का पेट फाडकर बाहर निकल आता था। एक बार देवताओं की प्रार्थना से महामुनि अगस्त्य ने भी जानबूझकर शाकरूपधारी वातापि का भक्षण किया था। जब वे भोजन कर चुके और हमेशा की तरह इल्वन ने वातापि को पुकारा, तब वातापि बाहर नहीं आ सका क्योंकि अगस्त्य ने वातापि को पचा लिया था और वह यमलोक जा चुका था। अब इल्वल ने क्रोधपूर्वक अगस्त्य को मारना चाहा परन्तु अगस्त्य ने अपने उद्दीप्त तेज से इल्वल को भी मार डाला।

     अगस्त्य के प्रभाव का वर्णन करते हुए राम ने पुनः कहा कि एक बार पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य जब सूर्य का मार्ग रोकने के लिए बढा तब अगस्त्य के कहने से ही वह नम्र हो गया और उनके आदेश का पालन करता हुआ फिर कभी नहीं बढा।

     इस प्रकार अगस्त्य के प्रभाव का अनेक प्रकार से वर्णन करते हुए राम लक्ष्मण और सीता के साथ अगस्त्य के आश्रम में पहुँच गए। परस्पर मिलकर सभी बहुत आनन्दित हुए और एक दूसरे का यथायोग्य सत्कार हुआ। अगस्त्य ने राम को विजय प्राप्ति हेतु विष्णु का दिया हुआ दिव्य धनुष, ब्रह्मा जी का दिया हुआ उत्तम बाण, इन्द्र के दिए हुए दो तूणीर तथा एक तलवार प्रदान की। राम द्वारा निवास हेतु स्थान पूछने पर अगस्त्य ने उन्हें पञ्चवटी में रहने का परामर्श दिया। तदनुसार राम पञ्चवटी की ओर प्रस्थित हो गए।

कथा की प्रतीकात्मकता

कथा प्रतीकात्मक है। अतः प्रतीकों को समझना उपयोगी है।

1- अगस्त्य - अगस्त्य शब्द अग और स्त्य नामक दो शब्दों के मिलने से बना है। अग(अ+ग) का अर्थ है - अगति अर्थात् गतिहीन। गतिहीन (परिवर्तनहीन) केवल आत्मा है, अतः अग शब्द आत्मा का वाचक है। स्त्य शब्द का अर्थ है - विस्तार या फैलाव। अतः अगस्त्य शब्द का अर्थ हुआ - आत्मा का विस्तार या फैलाव। पौराणिक साहित्य में अगस्त्य के समान पुरस्त्य (पुलस्त्य) शब्द का प्रयोग भी प्रचुरता से हुआ है, जिसका अर्थ है - पुर(शरीर) का विस्तार या फैलाव। मनुष्य के जीवन की दो विशेष स्थितियाँ हैं। एक स्थिति है - आत्मा के फैलाव की अर्थात् सबको आत्मा के भाव से देखने की तथा दूसरी स्थिति है - शरीर के फैलाव की अर्थात् सबको शरीर के भाव से देखने की।

     अगस्त्य को समझने के लिए ऐसा भी कहा जा सकता है कि मनुष्य की साधना के दो पक्ष हैं। एक है - व्यक्तिगत विकास का पक्ष जिसके अन्तर्गत मनुष्य स्वयं को शरीर न समझकर आत्मा समझने का सतत् अभ्यास करता है और एक न एक दिन स्वयं को स्वस्वरूप - आत्मस्वरूप में स्थित कर लेता है। दूसरा है - सामाजिक पक्ष जिसके अन्तर्गत मनुष्य आत्मस्वरूप में स्थित होता हुआ अपने से भिन्न दूसरों को भी आत्मस्वरूप में देखने का अभ्यास करता है और एक न एक दिन आत्मा के विस्तार में स्थित हो जाता है अर्थात् सभी को आत्मभाव से देखने लगता है।

     प्रस्तुत कथा  में राम और अगस्त्य का मिलन यह इंगित करता है कि अब आत्मस्वरूप में स्थित मनुष्य (राम) सबके प्रति आत्मभाव (अगस्त्य) से युक्त हो गया है।

2- इल्वल - इल्वल शब्द इल् तथा वल से बना है। इल् धातु चलने - फिरने अथवा जाने के अर्थ में प्रयुक्त होती है तथा वल का अर्थ है - मुडना या आकृष्ट होना। अतः इल्वल का अर्थ है - ऐसा मन जो चलने - फिरने वाले शरीर की ओर मुड गया है अथवा आकृष्ट हो गया है। शास्त्रों की भाषा में इसे ही देह का अभिमान कहा जाता है क्योंकि देहाभिमान का अर्थ ही है - अपने वास्तविक स्वरूप - आत्मस्वरूप को भूल जाने के कारण अपनी गलत पहचान शरीर (मैं शरीर हूँ) से जुड जाना। चूंकि देह का अभिमान या देहभाव एक नकारात्मक शक्ति है, इसलिए इसे कथा में असुर कहा गया है।

3- वातापि - वातापि शब्द वा अव्यय के साथ तापि के योग से बना है। तापि का अर्थ है - ताप देने वाला। यह शब्द गागर में सागर कीतरह उन सभी बातों को अपने भीतर समेटे हुए है, जो बातें देहभाव में रहने पर मनुष्य को ताप (दुःख) प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिए,

1- अपने आपको शरीर समझने के कारण जब मनुष्य अपने और पराए के भेद से भर जाता है, तब अपनों के प्रति तथा अपनी वस्तुओं के प्रति भी जिस आसक्ति से युक्त हो जाता है, वही आसक्ति उसे ताप देती है।

2- अपने आपको शरीर समझने के कारण जब मनुष्य अपनी विभिन्न भूमिकाओं को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझ लेता है, तब उस - उस भूमिका के प्रति कही हुई छोटी सी बात भी उसे ताप प्रदान करती है।

2- अपने आपको शरीर समझते हुए जब मनुष्य पारस्परिक सम्बन्धों में व्यवहार करता है, तब प्रत्येक सम्बन्ध में इतनी आशाओं, अपेक्षाओं से युक्त हो जाता है कि वे आशाएँ, अपेक्षाएँ ही ताप का कारण बन जाती हैं।

4- अपने आपको शरीर समझने के कारण ही मनुष्य अपने सही होने के विचार से इतनी प्रगाढता से संयुक्त हो जाता है कि दूसरे को गलत ठहराता है और अपनी पसन्द को ही उचित मानकर नापसन्द के प्रति क्रोधित तक हो जाता है। क्रोध आदि विकार नकारात्मक ऊर्जाएँ हैं जो उसे ही ताप प्रदान करती हैं।

5- अपने आपको शरीर समझने के बाद भी मनुष्य प्रत्येक शरीर (स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण) की पूर्ण भिन्नता को स्वीकार नहीं करता और विचार शरीर (सोच) की समानता के प्रति इतना आग्रहशील होता है कि असम्भव कार्य के कभी सम्भव न होने से अन्ततः स्वयं को ही ताप प्रदान करता है।

6- स्वयं को शरीर समझने के कारण मनुष्य यह भूल ही जाता है कि उसका प्रत्येक विचार उसकी अपनी रचना है। कोई भी स्थिति अथवा परिस्थिति उत्प्रेरक तो हो सकती है परन्तु उस स्थिति - परिस्थिति को लेकर विचार की रचना करना प्रत्येक मनुष्य के अपने हाथ में है। इस ज्ञान से अपरिचित होने के कारण मनुष्य या तो दोषारोपण वृत्ति से युक्त हो जाता है अथवा स्वयं को ही बेचारा समझकर तापयुक्त हो जाता है।

     ये मात्र कुछ उदाहरण हैं जो मनुष्य को ताप प्रदान करते हैं और उसी की सात्त्विक प्रकृति अथवा सकारात्मक विचारों को नष्ट करते हैं। इसी तथ्य कोकथा में यह कहकर संकेतित किया गया है कि इल्वल नामक असुर वातापि के मांस को छद्म रूप से पकाकर ब्राह्मणों को खिला देता था जिससे वातापि तो पुनः जीवित हो जाता परन्तु ब्राह्मण नष्ट हो जाते।

     तापि शब्द के साथ वा अव्यय को जोडकर यह संकेत किया गया है कि ताप देने वाली उपर्युक्त वर्णित बातें केवल उसी मनुष्य को संतप्त करती हैं जो देह - भाव में जीता है। आत्म - भाव में जीने वाला मनुष्य तो इन सब बातों से पूर्णतः अछूता रहकर न केवल ताप को विनष्ट करता है, अपितु देहभाव का भी पूर्णतः विनाशक हो जाता है जिसे कथा में मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य द्वारा पहले वातापि को पचा लेने और फिर उसके भाई इल्वल को भी दग्ध कर देने के रूप में इंगित किया गया है।

4- ब्राह्मण - ब्राह्मण शब्द मनुष्य की सात्त्विक प्रकृति अथवा सकारात्मक विचारों को इंगित करता प्रतीत होता है। ब्राह्मणों द्वारा वातापि के मांस को छद्मयुक्त भोजन के रूप में खा लेने का अर्थ है - सात्त्विक प्रकृति मनुष्य का देहाभिमान के कारण किसी न किसी बात को लेकर संताप युकत रहना। ब्राह्मणों का पेट फाडकर वातापि के बाहर निकल जाने परन्तु ब्राह्मणों के मर जाने का अर्थ है - देहाभिमान के कारण उत्पन्न हुए संतापों का तो ज्यों का त्यों बने रहना परन्तु उन संतापों के कारण उत्पन्न हुए नकारात्मक विचारों के कारण सात्त्विक प्रकृति का विनष्ट हो जाना। अगस्त्य द्वारा वातापि को पचा लेने, अतः वातापि के मर जाने का अर्थ है - सबके प्रति आत्मभाव का फैलाव हो जाने पर किसी भी सम्बन्ध में आशा, अपेक्षा, आसक्ति आदि न होने के कारण मनुष्य का संताप - मुक्त हो जाना।

5- विन्ध्य पर्वत - विन्ध्य का अर्थ है - बींधने योग्य तथा पर्वत का अर्थ है - सुदृढ या ऊंचा। अतः विन्ध्य पर्वत अहंकार को इंगित करता प्रतीत होता है। यद्यपि अहंकार ही आत्मा रूपी सूर्य के उदय और प्रसार में सबसे बडी बाधा है परन्तु आत्मभाव का फैलाव हो जानेपर यही अहंकार नम हो जाता है - झुक जाता है जिसे कथा में अगस्त्य के कहने से विन्ध्यपर्वत के विनम्र होने के रूप में इंगित किया गया है।

6 - दक्षिण दिशा - वेदों तथा पुराणों में दक्षिण दिशा दक्षता प्राप्ति की दिशाकही जाता ही। दक्षता प्राप्त करने के लिए मनुष्य के मार्ग की सबसे बडी बाधा है - उसका अपना अहंकार। अहंकार के झुकने पर ही मनुष्य के लिए दक्षता प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

7 - राम को अगस्त्य से दिव्य शस्त्रों की प्राप्ति - प्रत्येक मनुष्य को जन्म से प्राप्त हुए अहं बुद्धि, मन तथा इन्द्रिय आदि तत्त्व वे महत्त्वपूर्ण संसाधन (शस्त्र ) हैं जिनका उपयोग वह हर समय किसी न किसी रूप में करता है। देहभाव में स्थित रहने पर ये सब संसाधन (शस्त्र ) अपने मूल स्वरूप - दिव्य स्वरूप को खोकर अदिव्यता को धारण कर लेते हैं। परन्तु आत्मभाव का विस्तार हो जाने पर यही संसाधन पुनः अपने मूलस्वरूप - दिव्य स्वरूप में लौट आते हैं। विष्णु के धनुष, ब्रह्मा के बाण, इन्द्र के तूणीर तथा तलवार के रूप में इसी तथ्य की ओर संकेत किया गया प्रतीत होता है।

कथा का अभिप्राय

     प्रस्तुत कथा के माध्यम से दो महत्त्वपूर्ण तथ्यों का चित्रण किया गया है। पहला तथ्य यह है कि अपनी सही पहचान - आत्मज्ञान में स्थित होने पर ही मनुष्य सबके प्रति आत्मभाव में स्थित हो सकता है तथा दूसरा तथ्य यह है कि सबके प्रति आत्मभाव रखकर मनुष्य अनेक प्रकार से लाभान्वित होता है।

पहला तथ्य - आध्यात्मिक साधना के पथ पर चलने वाले मनुष्य का सबसे पहला लक्ष्य है  - अपने वास्तविक स्वरूप - आत्मस्वरूप को पहचान लेना अर्थात् अपनीइस पहचान में स्थित होना कि मैं शरीर नहीं हूं, अपितु शरीर को चलाने वाला अजर - अमर - अविनाशी चैतन्य शक्ति आत्मा हूं। आत्म स्वरूप में स्थित होकर ही मनुष्य अपने समस्त विचारों का निर्माता और नियन्ता बनता है और पहली बार यह समझ पाता है कि आत्मा होने के कारण वह आत्मा के गुणों - सुख, शान्ति, शक्ति, शुद्धता, ज्ञान,प्रेम तथा आनन्द से भरपूर है। अपने वास्तविक स्वरूप - आत्मस्वरूप की यह पहचान अत्यन्त श्रेष्ठ स्थिति है जिसे रामकथा में राम के रूप में दर्शाया गया है।

     प्रस्तु कथा संकेत करती है कि अपने वास्तविक स्वरूप - आत्मस्वरूप में स्थित होना अत्यन्त श्रेष्ठ है और अनिवार्य भी परन्तु फिर भी वह आध्यात्मिक साधना का व्यक्तिगत एकांगी पक्ष ही है। साधना की पूर्णता के लिए स्वस्वरूप - आत्मस्वरूप में स्थित रहते हुए सबके प्रति आत्मभाव रखना भी आवश्यक है। यही साधना का सामाजिक पक्ष है जिसे कथा में मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य (अर्थात् आत्मा के विस्तार) के रूप में संकेतित किया गया है।

दूसरा तथ्य - सबके प्रति आत्मभाव रखना (राम - अगस्त्य मिलन) मनुष्य को अनेक प्रकार से लाभान्वित करता है।

     पहला लाभ है - देहभाव (मैं शरीर हूं - इस भाव में रहना) के कारण अनेक स्रोतों से आ रहे संताप (दुःख) कीसमाप्ति जिसे इल्वल और वातापि नामक दो असुरों की कथा के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया है। यहां इस कथा में मनुष्य का देहभाव ही इल्वल है और संताप ही वातापि नामक असुर है। प्रस्तुत कथा यह संकेत करती है कि अपने आपको शरीर समझने के कारण सात्त्विक प्रकृति वाला मनुष्य कभी आसक्ति से पीडित होता है तो कभी भूमिकाओं को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझकर किसी की कही हुई छोटी - छोटी बातों से दुःखी हो जाता है। कभी पारस्परिक सम्बन्धों में रहते हुए आशाओं - अपेक्षाओं को रखने और फिर उनके पूरा न होने के कारण दुःख का अनुभव करता है तो कभी एक दूसरे कीपसन्द - नापसन्द कोही बहुत बडा विषय बनाकर संतप्त होता है। कभी दूसरों को बदले जैसे असम्भव कार्य को भी सम्भव बनाने की व्यर्थ कोशिश में पीडित होता है तो कभी अपनी कमजोर आत्मशक्ति के कारण अपने ऊपर ही नियन्त्रण न रहने से संतप्त होता है। इसी सम्पूर्ण तथ्य को कथा में ब्राह्मणों द्वारा वातापि को भोजन के रूप में खा लेने के रूप में इंगित किया गया है।

     कथा पुनः संकेत करती है कि सबके प्रति आत्मभाव में रहकर मनुष्य इन सब संतापों से छूट जाता है क्योंकि सभी को आत्मरूप समझकर अब वह सबके प्रति समत्व दृष्टि से युक्त हो जाता है ौर सभी के शरीरों की भिन्नता के प्रति पूर्ण स्वीकार भाव को धारण कर लेता है। इस संताप - मुक्ति को ही कथा में अगस्त्य द्वारा वातापि असुर को पचा लेने के रूप में इंगित किया गया है।

     दूसरा लाभ है - देहभाव के कारण अनेक स्रोतों से उत्पन्न हुए अहंकार का झुक जाना जिसे विन्ध्य पर्वत के झुकने के रूप में संकेतित किया गया है। मनुष्य के जीवन में धन, यश,पद, नाम तथा रूप आदि अनेक स्रोतों से जो अहंकार उत्पन्न हो जाता है, वही उसके आत्मिक धन (सुख, शान्ति, शक्ति, शुद्धता, ज्ञान, प्रेम तथा आनन्द) को व्यवहार क्षेत्र में व्यक्त नहीं होने देता। परिणामस्वरूप मनुष्य गुणों का धनी होते हुए भी निर्धन जैसा बना रहता है।

     कथा संकेत करती है कि सबके प्रति आत्मभाव रखने से जब मनुष्य का अहंकार झुक जाता है तब ही मनुष्य की उन्नति का मार्ग सदा - सदा के लिए खुल जाता है जिसे कथा में अगस्त्य मुनि द्वारा दक्षिण दिशा को निर्मल बना देने के रूप में इंगित किया गया है।

     तीसरा लाभ है - आत्मा के विस्तार(सबके प्रति आत्मभाव) से आत्मस्थ मनुष्य को दिव्यता की प्राप्ति जिसे कथा में मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य से राम को प्राप्त हुएदिव्य अस्त्रों के रूप में इंगित किया गया है। विष्णु के धनुष, ब्रह्मा के बाण, इन्द्र के तरकस तथा तलवार रूप दिव्य अस्त्रों के द्वारा सम्भवतः यह संकेत किया गया है कि आत्मस्थ मनुष्य (राम) को जन्म से ही प्राप्त हुए अहं (मैं तत्त्व), बुद्धि, मन तथा इन्द्रिय रूपी सभी संसाधन अब अपने अर्जित (मलिन) स्वरूप का परित्याग करके पुनः अपने मूलस्वरूप - दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं।

प्रथम लेखन - 8-8-2014ई.( श्रावण शुक्ल द्वादशी, विक्रम संवत् 2071)

Importance of Self expansion through the story of sage Agastya

- Radha Gupta

In Aranya Kanda (chapter 11 to 13), there is a story of sage Agastya. It is said that once Rama with Sita and Lakshmana went to meet sage Agastya. On the way, Rama told Lakshmana about the significance of Agastya. Rama told that there were two demons Ilwal and Vaatapi who were brothers and lived together. Ilwal used to invite brahmins for food and used to feed them disguised food made from the flesh of Vaatapi. When brahmins used to finish their food, Ilwal used to call his brother Vaatapi and Vaatapi used to come out from the stomachs of those brahmins. This way, lots of brahmins died.

            Once sage Agastya also went there and finished his food. But as soon as Ilwal called his brother as before, Vaatapi could not come out as sage Agastya had digested him. Seeing this end of Vaatapi, Ilwal got angry and tried to kill Agastya but Ilwal was killed by sage Agastya.

            Rama also told Lakshmana that once mountain Vindhya rose high and to stop the way of sun but on Agastya's request, it bent on one side and gave way to sun and never rose again.

            Thus narrating the importance of Agastya, Rama reached to his hermitage where all greeted each other and received divine weapons from sage Agastya.

            The story is related to the expansion of Self symbolized as sage Agastya.

            The story describes significance of this expansion but prior to this expansion, the knowledge of Self is compulsory symbolized as Rama. A person knowing the Self is able in its expansion.

            The knowledge of Self, i.e., Atmajnaana is a marvellous achievement in one's life. It makes a person capable to create and control own thoughts and for the first time he knows his own real wealth of happiness, peace, power, purity, love, knowledge and bliss.

            This knowledge of Self is unparalled yet is the first step of one's spiritual journey. The second step is still awaiting to be fulfilled. This second step is known as the expansion of Self symbolized as the meeting of Rama with sage Agastya.

            The story describes benefits of this expansion. Firstly, all sorrows, miseries and misfortunes diminish as soon as the Self expands. This is symbolized through the story of demon Ilwal and Vaatapei.

            Living in body - consciousness, a virtuous person lives his life with attachments, desires, expectations and blames. His ego gets hurt. He gets entangled in liking and disliking. This all destroys his positivity symbolized as the dying of brahmins by eating disguised food served by demon Ilwal.

            But this situation changes when the Self expands. Now a person lives in equanimity. He accepts everyone as it is. Hence all types of pains come to an end symbolized as the digestion of demon Vaatapi by sage Agastya.

            Secondly, one's own ego bends as soon as Self expands symbolized as the bending of mountain Vindhya by sage Agastya. It is important to know that the ego is a big obstacle in the path of progress as all qualities hide in its presence. But as soon as ego falls, all qualities again start radiating.

            Thirdly, a person gets divine weapons as soon as the Self expands symbolized as having divine weapons by Rama from Agastya. It appears that the resources like intellect, mind and senses etc. are like weapons which transform into divinity when the Self expands.

 

अगस्त्य का वैदिक पक्ष

-    विपिन कुमार

विष्णुधर्मोत्तर पुराण 1.66 में उल्लेख आता है कि परशुराम ने कार्यसिद्धि के पश्चात् तूणीर तो अगस्त्य को दिया और चाप या धनुष राम को। वाल्मीकि रामायण आदि में उल्लेख आता है कि जब राम अगस्त्य के आश्रम में गए, तो अगस्त्य ने वह तूणीर राम को भेंट कर दिया। अगस्त्य को समझने के लिए तूणीर या तरकस अर्थात् बाण रखने के पात्र को समझना पडेगा।  सामान्य रूप से तूणीर शब्द को तूण – भरणे धातु के आधार पर समझ सकते हैं। लेकिन वेद में एक शब्द तूर्णि प्रकट हुआ है जिसकी निरुक्ति तुर् – त्वरिते, शीघ्रे धातु के आधार पर की जाती है। ऋग्वेद 1.3.8 के सायण भाष्य में तूर्णयः शब्द की निरुक्ति ञित्वरा - संभ्रमे के आधार पर की गई है। उणादि कोश 4.51 में तूर्णि शब्द की निरुक्ति त्वरि में नित् प्रत्यय जोडने के द्वारा की गई है। यह महत्त्वपूर्ण है कि इस सूत्र के टीकाकार ने त्वरति का अर्थ सम्यग्भ्रमतीति तूर्णिः मनो वा किया है। इन उल्लेखों से यह संकेत मिलता है कि तूण या तूणीर में कहीं न कहीं भ्रमण छिपा है। यह भ्रमण वही हो सकता है कि जो पृथिवी अपनी धुरि पर स्थित होकर करती है, अपने ही परितः घूमती है। आधुनिक विज्ञान में इसे स्पिन या भ्रमि कहते हैं। विद्युत की स्थिति में, जब विद्युत चक्राकार रूप में घूमती है, तब चक्र के केन्द्र पर एक बल उत्पन्न हो जाता है। आजकल जो मोटर आदि चल रहे हैं, उनका सिद्धान्त यही है। तूणीर का सिद्धान्त भी यही प्रतीत होता है कि जब कोई विचार, कोई अभीप्सा या कोई इच्छा बार – बार चक्कर काटती है तो उसका बल केन्द्र पर, अंगुष्ठ पुरुष पर उत्पन्न हो जाता है। यह तीर हो सकता है। कथासरित्सागर आदि में सर्प को वश में करने पर उसके तूणीर में रूपान्तरित होने की कथाएं आती हैं। ऋग्वेद 1.165 से 1.191 तक के सूक्त अगस्त्य ऋषि के हैं जिनमें अन्तिम ऋचा की टेक विद्यामेषं वृजनं जीरदानुं है। इसका अर्थ है कि हम इष को वृजन अर्थात् पापों की नाश करने वाली और जीरदानु अर्थात् जीवन दान देने वाली के रूप में जानें। इष इच्छा या अभीप्सा, तीव्र चाह को कहते हैं। इष से इषु, इषुधि आदि शब्द बनते हैं। इषु तीर को कहते हैं तथा इषुधि तूणीर या तरकस को। इसका अर्थ हुआ कि तरकस में जो तीर रखे हैं,वह अपनी इच्छाओं को अपने परितः घुमाने से उत्पन्न हुए हैं। अतः जब डा. फतहसिंह अगस्त्य की निरुक्ति अग( जिसमें गति न हो) का स्त्यान या फैलाव के रूप में करते हैं तो उससे यही तात्पर्य निकाला जा सकता है कि हमारी जो इच्छाएं फैली हुई हैं, हम चाहें तो उनको अपने परितः एकत्रित कर सकते हैं ।

     यह विचित्र है कि अगस्त्य ऋषि की कोई व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थों में उपलब्ध नहीं होती। अतः पुराणों में अगस्त्य की कथाएं एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बन जाता है। पुराणों में सार्वत्रिक रूप से अगस्त्य के विन्ध्याचल को पार करके उत्तर से दक्षिण में जाने के उल्लेख मिलते हैं। अगस्त्य द्वारा वातापि असुर को पचा लेने की कथा से संकेत मिलता है कि वात में अचेतन प्राण विद्यमान हैं( मृत्यु पर सारे प्राण वात का रूप धारण कर लेते हैं)। इन अचेतन प्राणों को चेतन रूप देने वाला इन्द्र है, इसलिए उसे वेद(ऋ. 1.187.8-10) में वातापि कहा गया है(द्र. – वातापि पर टिप्पणी) – वातापे पीव इद् भव। हे वातापि इन्द्र, तुम मोटे – ताजे होओ। ऊपर राधा द्वारा की गई टिप्पणी में वातापि का अर्थ वा-तापि अर्थात् विकल्प से ताप देने वाला किया गया है। कोई घटना हमें तपा भी सकती है, नहीं भी। यह अर्थ अगस्त्य की कथा के संदर्भ में बहुत अच्छा सिद्ध होता है, जैसा कि आगे चलकर स्पष्ट होगा। अतः पुराणों की कथा में विन्ध्याचल को अचेतन प्राणों का रूप समझा जा सकता है जिसको पार कर लेने पर दक्षिण की, दक्षता प्राप्ति की, चेतन प्राणों की स्थिति आ जाती है।

            यद्यपि अगस्त्य ऋषि के सूक्तों का विस्तार ऋग्वेद में 1.165 से 1.191 तक है, लेकिन इन सूकतों में से प्रथम सूक्त कया शुभा सवयसः सनीडाः इत्यादि का विनियोग ही श्रौत और ब्राह्मण ग्रन्थों में अधिकांश रूप में किया गया है। इस सूक्त पर विचार करने से पहले यह उल्लेख कर देना उचित होगा कि इस सूक्त में अगस्त्य ऋषि ने क्या कहा है। इस सूक्त में मरुतों के जन्म के महत्त्व को प्रदर्शित किया गया है। पुराणों की कथा के अनुसार कश्यप – पत्नी दिति ने इन्द्र के वर्चस्व से छुटकारा पाने के लिए इन्द्र के समान पुत्र प्राप्ति के लिए गर्भ धारण किया लेकिन इन्द्र ने उस गर्भ के टुकडे – टुकडे कर दिए जिससे वह मरुतों के रूप में उत्पन्न हुए। दिति की इच्छा थी कि मेरे गर्भ से उत्पन्न पुत्र इन्द्र से लडे, लेकिन इन्द्र ने मरुतों को अपना सखा बना लिया। इस सूक्त में इन्द्र मरुतों से कह रहा है कि तुम्हारी मित्रता से मुझे क्या लाभ हुआ। जब मैं वृत्र या अहि को मार रहा था तो तुमने तो मुझे अकेला ही छोड दिया था। तुम्हारा स्वधा नामक बल उस समय कहां था(क्व स्या वो मरुतः स्वधासीद् यन्मामेकं समधत्ताहिहत्ये)। सूक्त की अन्तिम तीन ऋचाओं में अगस्त्य ऋषि मरुतों से अपने कल्याण की प्रार्थना कर रहा है(इन्द्र से नहीं)। अतः यह कहा जा सकता है कि मरुतों की अपने जीवन में प्रतिष्ठा करना ही अगस्त्य ऋषि का लक्ष्य है। मोटे रूप में, हमारी चेतना  में व्याप्त छोटे – छोटे, टुकडों में बंटे प्राणों को मरुत कहा जा सकता है। इससे अगस्त्य नाम की सार्थकता बैठती है। केवल स्वयं को अमर बना लेना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु अपने परितः स्थित सृष्टि को भी अमर बना लेना, अपने अनुकूल बना लेना अगस्त्य का लक्ष्य है ( स्कन्द पुराण 7.1.17 में अगस्ति पुष्प की विशेषता के रूप में अनुकूलता का उल्लेख है) । 

ऐतरेय ब्राह्मण 5.16 में द्वादशाह के सप्तम अह के संदर्भ में इस सूक्त(कया शुभा सवयसः सनीळाः इति) का विनियोग इसलिए किया गया है क्योंकि इस सूक्त की नवम ऋचा में सप्तम अह का लक्षण जातवत् प्रकट होताहै ( न जायमानो नशते न जातो यानि करिष्या कृणुहि प्रवृद्ध)। सोमयाग में सप्तम अह की स्थिति तब होती है जब साधक एकान्तिक साधना द्वारा अपने पापों का नाशतो कर देता है, लेकिन उसका लाभ सामान्य व्यक्तित्व को, सामाजिक जीवन को नहीं मिला होता। यज्ञ की भाषा में इस सप्तम अह को 3 छन्दोमों अहों का प्रथम अह कहा जाता है। इससे आगे सप्तम अह को समझने के लिए भागवत पुराण के सप्तम स्कन्ध का आश्रय लिया जा सकता है। भागवत पुराण के षष्ठम् स्कन्ध में तो अजामिल(जामि स्थिति किसी एक ही कार्य की पुनरावृत्ति के कारण उत्पन्न हुई अरुचि की स्थिति होती है) की कथा है, राजा चित्रकेतु  के वृत्र बनने और फिर वृत्र योनि से मुक्ति की कथा है। सप्तम स्कन्ध में विष्णु के पार्षदों जय – विजय के हिरण्यकशिपु व हिरण्याक्ष असुर बनने, उनके वध व प्रह्लाद का वृत्तान्त है। जब ऐतरेय ब्राह्मण सप्तम अह के जातवत् लक्षण का उल्लेख करता है, उससे तात्पर्य प्रह्लाद के जन्म से लिया जाना चाहिए। डा. फतहसिंह के शब्दों में, अब साधना कठोर साधना, एकान्तिक साधना नहीं रह गई है,अपितु आनन्द देने वाली साधना बन गई है, प्रह्लाद बन गई है। जय – विजय, हिरण्यकशिपु – हिरण्याक्ष तक साधना एकान्तिक थी, कठोर, कष्टप्रद थी। अतः ऐतरेय ब्राह्मण का विनियोग यह संकेत करता है कि अगस्त्य के सूक्त का उद्देश्य साधना को आनन्दप्रद स्थिति तक ले जाना है।

ऐतरेय ब्राह्मण 5.16 में कयाशुभीयम् सूक्त को संज्ञान संतनि सूक्त की संज्ञा दी गई है जिसके द्वारा इन्द्र, अगस्त्य व मरुतों ने एक दूसरे को जाना। संतनि का अर्थ सायण भाष्य में संतान देने वाला किया गया है। संज्ञान शब्द की और आगे व्याख्या की जा सकती है। पद्म पुराण 5.6.12 में राम अगस्त्य से कहते हैं कि आप तो भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं (लोकातीतं भवद्भावि सर्वं जानासि सर्वतः)। वराह पुराण आदि में अगस्त्य राजा भद्राश्व को उसके पूर्व जन्म का वृत्तान्त बताते हैं कि एक वैश्य मन्दिर में दीपक जलाकर चला आता था। रात्रि में उस दीपक की रक्षा करने वाला एक शूद्र व उसकी पत्नी थे जिसके कारण वह अगले जन्म में राजा भद्राश्व व उसकी रानी बने। ऐसी ही अगस्त्य के सम्बन्ध में और कथाएं भी मिल जाएंगी जहां अगस्त्य केवल अपना ही नहीं, दूसरों का भी जाति ज्ञान रखते हैं। योगवासिष्ठ ग्रन्थ का आरम्भ इस कथा से होता है कि अगस्त्य का शिष्य सुतीक्ष्ण अगस्त्य से पूछता है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए ज्ञान व कर्म में से कौन सा श्रेष्ठ है और उत्तर के रूप में अगस्त्य उसे वसिष्ठ और राम के बीच घटित वार्तालाप का वर्णन करते हैं जो पूरे योगवासिष्ठ ग्रन्थ का रूप लेता है। ज्ञान की एक व्याख्या यह की गई है कि किसी भी कर्म के सम्पादन से पूर्व उसके विषय में सम्यक् ज्ञान होना आवश्यक है। अगस्त्य शब्द की निरुक्ति के संदर्भ में, डा. फतहसिंह के मत के अनुसार यदि अग को गति न करने वाला कहा जाए तो इस कथन को अपने शरीर पर ढालने पर हमारे अग शरीर को गति देने वाले हमारे हाथ पैर हैं जो कर्म का प्रतीक हैं। अतः हमारा शरीर भी अगस्त्य हो सकता है।

अगस्त्य – भार्या लोपामुद्रा के संदर्भ में, लुप् धातु विमोहने अर्थ में है जिसके दो अर्थ हो सकते हैं – मोहन से दूर ले जाने वाला और मोहन के समीप लाने वाला। वर्तमान संदर्भ में विमोहन का अर्थ मोहन से दूर ले जाने वाला उपयुक्त होगा। पद्म पुराण 5.6.5 में अगस्त्य को लोपामुद्रा –पति कहने के साथ ही अलोलुप भी कहा गया है(अलोलुपस्य किं कार्यं करवाणि मुनीश्वर।)। अतः लोलुपता का लोप होना अगस्त्य की भार्या बनना है। यदि किसी विषय या घटना के सम्बन्ध में लोलुपता विद्यमान होगी तो वह ताप का कारण बन सकता है(वातापि पर राधा की टिप्पणी)। भागवत पुराण के आठवें स्कन्ध में गज –ग्राह व विष्णु के मोहिनी बनने की कथा आती है जिसने दैत्यों से अमृत का हरण कर देवों में वितरित कर दिया।

पुराणों में अगस्त्य को अर्घ्य प्रदान करने वाले मन्त्र काश पुष्प प्रतीकाशं इत्यादि में अगस्त्य को लंका में वास करने वाला कहा गया है। इसका अर्थ हुआ कि अपनी चेतना का शोधन लंका की स्थिति तक, जहां अंग्रेजी भाषा का शब्द लक या भाग्य ही सब कुछ होता है, करना है।

     ऋग्वेद 7.33.13 की  ऋचा निम्नलिखित है –

सत्रे ह जाताविषिता नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम् ।

ततो ह मान उदियाय मध्यात्ततो जातमृषिमाहुर्वसिष्ठम् ॥

इस सूक्त की पृष्ठभूमि यह है कि उर्वशी को देखकर मित्रावरुण का वीर्य स्खलित हुआ जिसे एक कुम्भ में स्थापित कर दिया गया। उस कुम्भ से वसिष्ठ और अगस्त्य का जन्म हुआ। वसिष्ठ तो कुम्भ के मध्य से सीधे ऊपर उठते गए,जबकि अगस्त्य को प्रजा दूर ले गई (तत्ते जन्मोतैकं वसिष्ठागस्त्यो यत्त्वा विश आजभार ॥)। इसे भी तूणीर या तरकस के आधार पर समझा जा सकता है।

प्रथम लेखन – 7-10-2014ई. (आश्विन् शुक्ल चतुर्दशी,विक्रम संवत् 2071), संशोधन – 19-10-2014ई.(कार्तिक कृष्ण एकादशी, विक्रम संवत् 2071)

 अगस्त्य सूक्त

,१६५.०१  कया शुभा सवयसः सनीळाः समान्या मरुतः सं मिमिक्षुः ।

,१६५.०१ कया मती कुत एतास एतेऽर्चन्ति शुष्मं वृषणो वसूया ॥

,१६५.०२  कस्य ब्रह्माणि जुजुषुर्युवानः को अध्वरे मरुत आ ववर्त ।

,१६५.०२ श्येनां इव ध्रजतो अन्तरिक्षे केन महा मनसा रीरमाम ॥

,१६५.०३  कुतस्त्वमिन्द्र माहिनः सन्नेको यासि सत्पते किं त इत्था ।

,१६५.०३ सं पृच्छसे समराणः शुभानैर्वोचेस्तन्नो हरिवो यत्ते अस्मे ॥

,१६५.०४  ब्रह्माणि मे मतयः शं सुतासः शुष्म इयर्ति प्रभृतो मे अद्रिः ।

,१६५.०४ आ शासते प्रति हर्यन्त्युक्थेमा हरी वहतस्ता नो अच्छ ॥

,१६५.०५  अतो वयमन्तमेभिर्युजानाः स्वक्षत्रेभिस्तन्वः शुम्भमानाः ।

,१६५.०५ महोभिरेतां उप युज्महे न्विन्द्र स्वधामनु हि नो बभूथ ॥

,१६५.०६  क्व स्या वो मरुतः स्वधासीद्यन्मामेकं समधत्ताहिहत्ये ।

,१६५.०६ अहं ह्युग्रस्तविषस्तुविष्मान्विश्वस्य शत्रोरनमं वधस्नैः ॥

,१६५.०७  भूरि चकर्थ युज्येभिरस्मे समानेभिर्वृषभ पौंस्येभिः ।

,१६५.०७ भूरीणि हि कृणवामा शविष्ठेन्द्र क्रत्वा मरुतो यद्वशाम ॥

,१६५.०८  वधीं वृत्रं मरुत इन्द्रियेण स्वेन भामेन तविषो बभूवान् ।

,१६५.०८ अहमेता मनवे विश्वश्चन्द्राः सुगा अपश्चकर वज्रबाहुः ॥

,१६५.०९  अनुत्तमा ते मघवन्नकिर्नु न त्वावां अस्ति देवता विदानः ।

,१६५.०९ न जायमानो नशते न जातो यानि करिष्या कृणुहि प्रवृद्ध ॥

,१६५.१०  एकस्य चिन्मे विभ्वस्त्वोजो या नु दधृष्वान्कृणवै मनीषा ।

,१६५.१० अहं ह्युग्रो मरुतो विदानो यानि च्यवमिन्द्र इदीश एषाम् ॥

,१६५.११  अमन्दन्मा मरुत स्तोमो अत्र यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र ।

,१६५.११ इन्द्राय वृष्णे सुमखाय मह्यं सख्ये सखायस्तन्वे तनूभिः ॥

,१६५.१२  एवेदेते प्रति मा रोचमाना अनेद्यः श्रव एषो दधानाः ।

,१६५.१२ संचक्ष्या मरुतश्चन्द्रवर्णा अच्छान्त मे छदयाथा च नूनम् ॥

,१६५.१३  को न्वत्र मरुतो मामहे वः प्र यातन सखींरच्छा सखायः ।

,१६५.१३ मन्मानि चित्रा अपिवातयन्त एषां भूत नवेदा म ऋतानाम् ॥

,१६५.१४  आ यद्दुवस्याद्दुवसे न कारुरस्माञ्चक्रे मान्यस्य मेधा ।

,१६५.१४ ओ षु वर्त्त मरुतो विप्रमच्छेमा ब्रह्माणि जरिता वो अर्चत् ॥

,१६५.१५  एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः ।

,१६५.१५ एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥