पुराण विषय अनुक्रमणिका(अ-अनन्त) Purana Subject Index

Adhvaryu - Adhvaa अध्वर्यु - अध्वा

अध्वर

टिप्पणी : जिस यज्ञ में असुरों की हिंसा की आवश्यकता न रह गई हो, उसे अध्वर कहते हैं। - फतहसिंह

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

अध्वर्यु

टिप्पणी : उणादि कोश के अनुसार अध्वर्यु का अर्थ होता है अध्वर से जोडने वाला। यज्ञ कर्म में अध्वर्यु ऋत्विज के महत्त्व को समझने के संदर्भ में प्राणाग्निहोत्र उपनिषद ४ में उल्लेख है कि आध्यात्मिक यज्ञ में आत्मा यजमान है और अहंकार अध्वर्यु है लेकिन इस कथन की वैदिक साहित्य में अन्यत्र पुनरुक्ति नहीं हुई है। संभवतः शतपथ ब्राह्मण ३.७.१.३० में अध्वर्यु द्वारा यूप शकल की आहुति के द्वारा अहंकार की व्याख्या की जा सकती है। शतपथ ब्राह्मण १.५.१.२१, ४.६.७.२० तथा १२.१.१.४ में अध्वर्यु को मन कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण ११.२.७.३२ के अनुसार यजमान संवत्सर है जिसका ऋतु रूपी ऋत्विज यजन करते हैं। इन ऋतुओं में ग्रीष्म ऋतु अध्वर्यु है। वह यजमान का तापन करती है। बृहदारण्यक उपनिषद ३.१.४ के अनुसार चक्षु अध्वर्यु है जिसकी सहायता से यजमान अहोरात्र की आप्ति से मुक्त होता है। चक्षु रूपी अध्वर्यु ही आकाश का आदित्य है। तैत्तिरीय आरण्यक १०.६४.१ तथा गोपथ ब्राह्मण २.५.४ के अनुसार आत्मा यजमान है, श्रद्धा पत्नी, - - - - चक्षु अध्वर्यु, मन ब्रह्मा इत्यादि। षड्-विंश ब्राह्मण २.५.२ में तीन सवनों में अध्वर्यु के तीन रूप कहे गए हैं। प्रातः, माध्यन्दिन और सायं सवनों में यजमान क्रमशःप्राण, अपान और उदान रूप है जबकि अध्वर्यु क्रमशः आदित्य, चक्षु व अपान का रूप है। तैत्तिरीय आरण्यक ३.२.१ में चार, पांच, छह और सात होताओं के अन्तर्गत क्रमशः द्यौ, अश्विनौ, वात और सत्यहवि को अध्वर्यु कहा गया है। गोपथ ब्राह्मण १.१.१३ तथा १.२.२४ में प्रजापति के यज्ञ में वायु को अध्वर्यु कहा गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.३.९.१२ के अनुसार यज्ञ का अध्वर्यु होने का अधिकारी वह है जो यज्ञ को जोड सकता हो। वात द्वारा अध्वर्यु यज्ञ को जोड सकता है(प्रयुंक्ते)।

     अध्वर्यु को चक्षु कहने का तात्पर्य कर्मकाण्ड में अध्वर्यु द्वारा दो बैलों(अनड्वान्) की अनः/शकट पर सोमलता को लादकर वेदीस्थल तक लाने के प्रकरण से समझा जा सकता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.३.७.५ के अनुसार जैसे अनः या रथ को जोडते हैं, ऐसे ही अध्वर्यु यज्ञ को जोडता है। अथर्ववेद ७.५५.५ तथा ११.६.१३ के अनुसार अनड्वान प्राण को कहते हैं जिसके दो रूप होते हैं प्राण और अपान। यही गाडी के दो बैल हैं। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.९.३ तथा गोपथ ब्राह्मण १.२.११ के अनुसार प्राणापानौ अध्वर्यु-द्वय हैं। शतपथ ब्राह्मण ४.२.५.३, ५.५.१.११ तथा १२.७.३.२२ के अनुसार प्राणोदानौ(प्राण-उदान) अध्वर्यु-द्वय हैं। पुराणों में शिव के गण नन्दी को भी अनड्वान कहा जाता है। नन्दी की प्रकृति भी यही है कि वह एक भी है, दो भी। यह श्वास-प्रश्वास का रूप है जो साधना के एक स्तर पर पहुंचने पर आनन्द उत्पन्न करने लगता है अन्दर जाता हुआ श्वास भी आनन्द देता है, बाहर निकलता हुआ श्वास भी। ऋग्वेद ८.२४.१६ में इसे मधु कहा गया है जिसकी प्राप्ति अध्वर्यु अन्धस् सोम से करता है। जैसा कि अन्तरिक्ष शब्द की टिप्पणी में कहा गया है, प्राण का आयतन अन्तरिक्ष होता है क्योंकि वायु अन्तरिक्ष में ही होती है। शरीर में अन्तरिक्ष का सर्वोच्च स्थान भ्रूमध्य होता है। यह ॐ रूपी वायु है, तीसरा चक्षु है। इसके विकसित होने पर अन्तरिक्ष अन्धकारमय नहीं रहता, अपितु ज्योति से पूर्ण हो जाता है। जैमिनीय ब्राह्मण २.२०२ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण १.८.२.३ के अनुसार अग्निष्टोम यज्ञ में अध्वर्यु को दक्षिणा स्वरूप प्रकाश-द्वय मिलते हैं। यह प्रकाश-द्वय चक्षु-द्वय के सूर्य और चन्द्रमा रूप हो सकते हैं। अथर्ववेद ७.७.७.५, तैत्तिरीय आरण्यक ५.५.३ तथा शतपथ ब्राह्मण १४.१.३.३३ में प्रवर्ग्य कर्म के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि चक्षु के विकास से पूर्व घर्म/गरमी उत्पन्न होती है जिसमें रुचि/दीप्ति उत्पन्न करना अध्वर्यु का कर्तव्य है। चक्षु रूपी प्रकाश के उत्पन्न होने के पश्चात् इस ज्योति को आकाश में प्रतिष्ठित करना होता है। अध्वर्यु यजमान रूपी सूर्य के तेज का क्रमशः विकास करता है। उस सूर्य को आकाश में विचरण करने योग्य, पतन रहित, १२ मास के १२ सूर्यों और १३वें मास के सूर्य को धारण करने वाला, चन्द्रमा, नक्षत्रों और ऋतुओं को धारण करने वाला बनाता है(अपश्यं गोपामनिपद्यमानं इत्यादि तैत्तिरीय आरण्यक ४.७.१ तथा ५.६.११)।

     प्राणापानौ के अध्वर्यु-द्वय होने के उपरोक्त वर्णन के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद २.१४ आदि सूक्तों में अध्वर्यु शब्द का प्रयोग बहुवचन में हुआ है। सायण भाष्य में अध्वर्यवः शब्द की व्याख्या यज्ञ के १० चमसाध्वर्युओं के द्वारा की गई है जो यज्ञ में ऋत्विजों के पात्रों का मार्जन आदि कर्म करते हैं। दूसरी संभावना यह है कि अध्वर्यु ऋत्विज के सहायकों के रूप में प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा और उन्नेता ऋत्विजों का नाम आता है। वह अध्वर्यवः हो सकते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में जब भी अध्वर्यु-द्वय(अध्वर्यू) शब्द की व्याख्या करनी होती तो वह अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता द्वारा की जाती है।प्रतिप्रस्थाता में कुछ आसुरी पक्ष होता है(काठक संहिता २७.५)। वह यजमान-पत्नी के साथ गार्हपत्य अग्नि पर रहता है, जबकि अध्वर्यु यजमान के साथ आहवनीय अग्नि पर बैठता है। अध्वर्यु का कार्य जहां यजमान रूपी सूर्य को आकाश में प्रतिष्ठित करना होता है, प्रतिप्रस्थाता का कार्य यजमान-पत्नी को १० दिशाओं में व्याप्त होने वाली बनाना होता है। तैत्तिरीय आरण्यक में प्रवर्ग्य कर्म के अन्तर्गत वर्णन आता है कि यज्ञ की वेदी रूपी यजमान-पत्नी विस्तीर्ण चेतना को प्राप्त करके उत्तरवेदी बन जाती है। यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद ६.४१.२ तथा ८.४.११ ऋचाओं की व्याख्या सायण भाष्य में अध्वर्यु के हविर्धान स्थान से उत्तरवेदी को जाने के द्वारा की गई है। पुराणों में यजमान रूपी सूर्य और यजमान-पत्नी रूपी वडवा के उत्तरवेदी में पहुंचने पर अश्विनौ के जन्म का सार्वत्रिक वर्णन आता है। ब्राह्मण ग्रन्थों जैसे शतपथ ब्राह्मण ४.१.५.१५ व १२.८.२.२२, जैमिनीय ब्राह्मण ३.३७४ तथा ऋग्वेद १०.४१.३ व १०.५२.२ में अश्विनौ को देवताओं के अध्वर्यु-द्वय कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण आदि में च्यवन-सुकन्या आख्यान द्वारा यह भी वर्णन किया गया है कि अश्विनौ देवताओं के अध्वर्यु कैसे बने। ऋग्वेद १०.४१.३ की ऋचा में अश्विनौ को मधु पाणि वाला कहा गया है जो देवताओं को सोम प्रस्तुत करते हैं। तैत्तिरीय संहिता ६.४.३.१ के अनुसार ऐसे अध्वर्यु का चुनाव करना चाहिए जो सब देवताओं को सोम प्रस्तुत कर सके। इस प्रकार अध्वर्यु हृदे त्वा इत्यादि मन्त्र से मनुष्यों को, मनसे त्वा इत्यादि से पितरों को तथा दिवे त्वा सूर्याय त्वा इत्यादि मन्त्र से देवों को सोम प्रस्तुत करता है। इस प्रकार अध्वर्यु के तीन रूप हैं जिनमें देव रूप अश्विनौ के माध्यम से स्पष्ट हो जाता है। मन से पितरों को प्रस्तुति के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण १.५.१.२१ आदि में अध्वर्यु को मन कहा गया है। इसके अतिरिक्त, यज्ञ कर्म में अध्वर्यु बहुत से कार्य मन से करता है(उदाहरण के लिए, आश्वलायन श्रौत सूत्र ८.१३.२०)। शतपथ ब्राह्मण ४.६.७.२० के अनुसार मन अध्वर्यु पुर की भांति विचरण करता है। हो सकता है कि यह पुराणों में अग्निष्टोम यज्ञ में पुलस्त्य(पुरस्त्यान, पुर का विस्तार) ऋषि को अध्वर्यु बनाने की व्याख्या हो। पुराणों में पुलस्त्य ऋषि की उत्पत्ति उदान प्राण से होने के तथ्य को भी व्याख्या करते समय ध्यान में रखना आवश्यक है।

     मनुष्य कोटि के अध्वर्यु के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण १.८.१.२७ में कहा गया है कि जो गौ का वत्स बनना जानता है, वह दैविक अध्वर्यु है, अन्य अध्वर्यु मानुषी हैं। कर्मकाण्ड में अध्वर्यु सोम विक्रयी से गौ के बदले सोमलता का क्रय करता है(शतपथ ब्राह्मण ३.३.३.३ तथा तैत्तिरीय संहिता ६.१.१०.१)। सोमविक्रयी अपने सोम की महिमा का वर्णन करने में असमर्थ होता है, जबकि अध्वर्यु को गौ के अंग-अंग की महिमा का ज्ञान होता है जिसका वह सोमविक्रयी को लालच देता है। अन्त में अध्वर्यु सोम भी प्राप्त कर लेता है और गौ भी अपने और यजमान के लिए रख लेता है। शतपथ ब्राह्मण १४.३.१.३३ में प्रवर्ग्य् कर्म की दक्षिणा के रूप में अध्वर्यु द्वारा घर्मदुघा(गौ) प्राप्त करने का उल्लेख है। यह ध्यान देने योग्य है कि पुराणों में अध्वर्युओं के रूप में जिन ऋषियों का नाम आया है, उनमें जमदग्नि, वसिष्ठ और गौतम गौ रखने वाले हैं, जबकि विश्वामित्र गौ प्राप्ति का यत्न करते हैं। गौ के वत्स का कार्य गौ को पयःदान के लिए केवल प्रेरित करना होता है। पयः का उपयोग यजमान आदि यज्ञ कार्य में करते हैं। कर्मकाण्ड में ओ श्रावय बोलकर विराज गौ का आह्वान करते हैं, अस्तु श्रौषट् से वत्स के बन्धन खोलते हैं, यज से स्तनों को वत्स के मुख में देते हैं आदि आदि। इस वाक्य समूह में ओ(ओम) श्रावय तथा यज यह आदेश अध्वर्यु के लिए होता है जिससे वह पुरोवात(ओ श्रावय) और विद्युत(यज) का मन से ध्यान करता है। अन्य आदेश अन्य ऋत्विजों के लिए होते हैं(शतपथ ब्राह्मण १.५.२.१९, ३.३.७.३ तथा काण्व शतपथ २.४.४.९)। जब विद्युत उत्पन्न होती है तो यह अभ्र/बादलों और पुरोवात का एकीकरण कर देती है। अन्त में वषट्कार बोलने पर वर्षा होती है। ऋग्वेद ७.१०३.८ में अध्वर्युओं की तुलना मण्डूकों से की गई है जो घर्म से पीडित होकर वर्षा की कामना करते रहते हैं।

     अध्वर्यु के उल्लेखनीय कार्यों में से एक है दिव्य जल या सोम को ग्रहों/पात्रों में ग्रहण करना, उसका मार्जन करना और उसे यजमान के लिए प्रस्तुत करना(ऋग्वेद सूक्त २.१४ व १०.३०, १.१३५.६, ३.४६.५, ८.२४.१६, शतपथ ब्राह्मण १.३.३.१, २.६.१.१४, ३.५.२.४ तथा १३.२.७.१)। सोम को छानने वाली छलनी पवित्र के संदर्भ में आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १९.६.८ में उल्लेख है कि अध्वर्यु का पवित्र अज और अवि के लोमों से बना होता है, जबकि प्रतिप्रस्थाता का गौ और अश्व के लोमों से। अध्वर्यु पयः को छानता है, जबकि प्रतिप्रस्थाता सुरा को। ऐसा अनुमान है कि अध्वर्यु सोम को छानने का कार्य प्राणों अथवा वायुओं द्वारा करता है। ऋग्वेद २.१४ सूक्त की १२ ऋचाओं में इन्द्र द्वारा विभिन्न शत्रुओं के निग्रह के उल्लेखों के साथ-साथ अध्वर्युओं से भी इन्द्र के लिए सोम का सिंचन करने का अनुरोध किया गया है जिसका अर्थ होगा कि ब्राह्मण अध्वर्यु और क्षत्र इन्द्र दोनों को सोम प्रदान करने और ग्रहण करने के लिए तैयारी करनी पडती है।

     शतपथ ब्राह्मण ५.३.४.४ में राजसूय यज्ञ में यजमान के अभिषेक हेतु अध्वर्यु द्वारा आपः/जल की १६ प्रकार की ऊर्मियों के संग्रह का वर्णन है। उनके द्वारा वह यजमान का अभिषेक करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन ऊर्मि वाले जलों का सम्बन्ध ऋग्वेद १०.३० के सूक्त से है।

     अध्वर्यु की प्रकृति के बारे में कुछ प्रकाश होता और अध्वर्यु के सम्बन्धों के वर्णन से मिलता है। शतपथ ब्राह्मण १३.५.२.१२ में होता अध्वर्यु से पूछता है कि एकाकी विचरण कौन करता है? अध्वर्यु उत्तर देता है कि सूर्य एकाकी विचरण करता है। फिर अध्वर्यु होता से प्रश्न करता है कि सूर्य समान ज्योति कौन सी है? होता उत्तर देता है कि ब्रह्म ही सूर्य समान ज्योति है, इत्यादि। तैत्तिरीय संहिता ६.३.१.५ में होता को यज्ञ की नाभि कहा गया है।

     स्कन्द पुराण में त्रिशंकु के यज्ञ में विश्वामित्र के अध्वर्यु होने के संदर्भ में ऐसा कहा जा सकता है कि अध्वर्यु-द्वय का स्वरूप प्रायः प्राणापानौ का होता है जहां अपान का कार्य दुर्गुणों को, मल को निकाल फेंकने का है। शतपथ ब्राह्मण ५.५.१.११ में प्राणोदानौ को मित्रावरुण और अध्वर्यु-द्वय कहा गया है। ऋग्वेद ३.५.४ में उल्लेख है कि इषिर और दमूना(?) बनने पर अध्वर्यु सिन्धुओं और पर्वतों का मित्र हो जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि उदान प्राण का विकास होने पर अध्वर्यु मित्र/विश्वामित्र बन जाता है। पुराणों में अध्वर्यु के रूप में प्रायः भृगु का उल्लेख आया है। जमदग्नि भी भार्गव गोत्रीय हैं। भृगु अर्थात् भून देने वाला, हमारे कर्मों को जला डालने वाला। भृगु की उत्पत्ति के संदर्भ में ब्राह्मण ग्रन्थों में उल्लेख आता है कि प्रजापत से उत्पन्न पहली ज्वाला तो आदित्य बन गई, दूसरी भृगु बनी और तीसरी अंगार/अग्नि। जैमिनीय ब्राह्मण ३.१८८ में गौर आंगिरस के अध्वर्यु होने का उल्लेख है। गोपथ ब्राह्मण १.२.९ का कथन है कि अग्नि, आदित्य और यम यह अङ्गिरस हैं। यह इदं सर्वं का समाप्नुवन करते हैं। दूसरी ोर, वायु, आपः व चन्द्रमा भार्गव हैं। यह इदं सर्वं का समाप्यायन करते हैं। पुराणों में भृगु ऋषि द्वारा सोते हुए विष्णु के वक्ष पर पदाघात करने और विष्णु द्वारा भृगु के पद को अपने हृदय में धारण करने का वर्णन आता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णन आता है कि जितने स्थान में विष्णु लेटकर सो गए, वह स्थान देवताओं के यज्ञ की वेदी हो गया। शेष स्थान असुरों को मिला। बाद में विष्णु ने अपने शरीर का विस्तार कर लिया और उन्होंने सारी पृथिवी को व्याप्त कर लिया। शतपथ ब्राह्मण ३.५.३.२१ में दक्षिण हविर्धान को टेक लगाते समय अध्वर्यु जिस मन्त्र का पाठ करता है, उसमें भी विष्णु के तीन उरुक्रमों का उल्लेख है। अतः यह विचारणीय है कि भृगु ऋषि विष्णु को यज्ञ रूपी वेदी का विस्तार करने के लिए किस प्रकार प्रेरित करते हैं।

     ब्राह्मण ग्रन्थों में अध्वर्युओं के जिन नामों का उल्लेख आया है, वह इस प्रकार हैं : ऐतरेय ब्राह्मण ७.१६ में हरिश्चन्द्र के राजसूय यज्ञ में जमदग्नि अध्वर्यु हैं तथा विश्वामित्र होता। अथर्ववेद १८.४.१५ में प्रेत कर्म के संदर्भ में अग्नि होता और बृहस्पति अध्वर्यु का उल्लेख है। जैमिनीय ब्राह्मण १.३६३ में सोमप्रख्य गृहपतियों के सत्र में शितिबाहु ऐषकृत अध्वर्यु थे। जैमिनीय ब्राह्मण ३.२३४ में मेधातिथि गृहपतियों के सत्र में सनक-नवक-द्वय अध्वर्यु थे। शतपथ ब्राह्मण ११.४.२.१७ में अयःस्थूण गृहपतियों के सत्र में शौल्बायन अध्वर्यु थे।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

अध्वा

टिप्पणी : अध्वा मार्ग को कहते हैं। ऋग्वेद ३.३०.१२ में सूर्य के गमन मार्ग को अध्वा कहा गया है। वेदों के विभिन्न मन्त्रों में विभिन्न देवों, विशेषकर अग्नि से अध्वा को सुगमता से पार कर लेने की प्रार्थना की गई है। अग्नि इस अध्वा पथ को अच्छी तरह जानता है(ऋग्वेद ६.१६.३)। ऋग्वेद ८.३१.११ में पूषा देवता से इस उरु अध्वा में स्वस्ति के लिए धन आदि लाने की प्रार्थना की गई है। इस अध्वा को या तो रथ पर बैठकर पार किया जा सकता है(ऋग्वेद १०.५१.६) अथवा अश्व द्वारा। यह पथ कौन सा है, यह पुराण में ६ अध्वों के रूप में स्पष्ट किया गया है। यज्ञ में अध्वर्यु नामक ऋत्विज का लक्ष्य यजमान को अध्वा के पार कराना है, ऐसा प्रतीत होता है। अध्वर्यु को  षड्-विंश ब्राह्मण २.७ आदि में अपान कहा गया है। अतः यह कल्पना कर सकते हैं कि प्राण रूप में जो शक्ति प्राप्त हुई है, उसका जीवन रूपी यज्ञ में, अध्वा में सम्यक् उपयोग करने का, उसे अपान बनाने का, यज्ञ से असुरों को निकाल बाहर करने का कार्य अध्वर्यु का है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

              

 

 

अध्वर

टिप्पणी : जिस यज्ञ में असुरों की हिंसा की आवश्यकता न रह गई हो, उसे अध्वर कहते हैं। - फतहसिंह

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

अध्वर्यु

टिप्पणी : उणादि कोश के अनुसार अध्वर्यु का अर्थ होता है अध्वर से जोडने वाला। यज्ञ कर्म में अध्वर्यु ऋत्विज के महत्त्व को समझने के संदर्भ में प्राणाग्निहोत्र उपनिषद ४ में उल्लेख है कि आध्यात्मिक यज्ञ में आत्मा यजमान है और अहंकार अध्वर्यु है लेकिन इस कथन की वैदिक साहित्य में अन्यत्र पुनरुक्ति नहीं हुई है। संभवतः शतपथ ब्राह्मण ३.७.१.३० में अध्वर्यु द्वारा यूप शकल की आहुति के द्वारा अहंकार की व्याख्या की जा सकती है। शतपथ ब्राह्मण १.५.१.२१, ४.६.७.२० तथा १२.१.१.४ में अध्वर्यु को मन कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण ११.२.७.३२ के अनुसार यजमान संवत्सर है जिसका ऋतु रूपी ऋत्विज यजन करते हैं। इन ऋतुओं में ग्रीष्म ऋतु अध्वर्यु है। वह यजमान का तापन करती है। बृहदारण्यक उपनिषद ३.१.४ के अनुसार चक्षु अध्वर्यु है जिसकी सहायता से यजमान अहोरात्र की आप्ति से मुक्त होता है। चक्षु रूपी अध्वर्यु ही आकाश का आदित्य है। तैत्तिरीय आरण्यक १०.६४.१ तथा गोपथ ब्राह्मण २.५.४ के अनुसार आत्मा यजमान है, श्रद्धा पत्नी, - - - - चक्षु अध्वर्यु, मन ब्रह्मा इत्यादि। षड्-विंश ब्राह्मण २.५.२ में तीन सवनों में अध्वर्यु के तीन रूप कहे गए हैं। प्रातः, माध्यन्दिन और सायं सवनों में यजमान क्रमशःप्राण, अपान और उदान रूप है जबकि अध्वर्यु क्रमशः आदित्य, चक्षु व अपान का रूप है। तैत्तिरीय आरण्यक ३.२.१ में चार, पांच, छह और सात होताओं के अन्तर्गत क्रमशः द्यौ, अश्विनौ, वात और सत्यहवि को अध्वर्यु कहा गया है। गोपथ ब्राह्मण १.१.१३ तथा १.२.२४ में प्रजापति के यज्ञ में वायु को अध्वर्यु कहा गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.३.९.१२ के अनुसार यज्ञ का अध्वर्यु होने का अधिकारी वह है जो यज्ञ को जोड सकता हो। वात द्वारा अध्वर्यु यज्ञ को जोड सकता है(प्रयुंक्ते)।

     अध्वर्यु को चक्षु कहने का तात्पर्य कर्मकाण्ड में अध्वर्यु द्वारा दो बैलों(अनड्वान्) की अनः/शकट पर सोमलता को लादकर वेदीस्थल तक लाने के प्रकरण से समझा जा सकता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.३.७.५ के अनुसार जैसे अनः या रथ को जोडते हैं, ऐसे ही अध्वर्यु यज्ञ को जोडता है। अथर्ववेद ७.५५.५ तथा ११.६.१३ के अनुसार अनड्वान प्राण को कहते हैं जिसके दो रूप होते हैं प्राण और अपान। यही गाडी के दो बैल हैं। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.९.३ तथा गोपथ ब्राह्मण १.२.११ के अनुसार प्राणापानौ अध्वर्यु-द्वय हैं। शतपथ ब्राह्मण ४.२.५.३, ५.५.१.११ तथा १२.७.३.२२ के अनुसार प्राणोदानौ(प्राण-उदान) अध्वर्यु-द्वय हैं। पुराणों में शिव के गण नन्दी को भी अनड्वान कहा जाता है। नन्दी की प्रकृति भी यही है कि वह एक भी है, दो भी। यह श्वास-प्रश्वास का रूप है जो साधना के एक स्तर पर पहुंचने पर आनन्द उत्पन्न करने लगता है अन्दर जाता हुआ श्वास भी आनन्द देता है, बाहर निकलता हुआ श्वास भी। ऋग्वेद ८.२४.१६ में इसे मधु कहा गया है जिसकी प्राप्ति अध्वर्यु अन्धस् सोम से करता है। जैसा कि अन्तरिक्ष शब्द की टिप्पणी में कहा गया है, प्राण का आयतन अन्तरिक्ष होता है क्योंकि वायु अन्तरिक्ष में ही होती है। शरीर में अन्तरिक्ष का सर्वोच्च स्थान भ्रूमध्य होता है। यह ॐ रूपी वायु है, तीसरा चक्षु है। इसके विकसित होने पर अन्तरिक्ष अन्धकारमय नहीं रहता, अपितु ज्योति से पूर्ण हो जाता है। जैमिनीय ब्राह्मण २.२०२ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण १.८.२.३ के अनुसार अग्निष्टोम यज्ञ में अध्वर्यु को दक्षिणा स्वरूप प्रकाश-द्वय मिलते हैं। यह प्रकाश-द्वय चक्षु-द्वय के सूर्य और चन्द्रमा रूप हो सकते हैं। अथर्ववेद ७.७.७.५, तैत्तिरीय आरण्यक ५.५.३ तथा शतपथ ब्राह्मण १४.१.३.३३ में प्रवर्ग्य कर्म के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि चक्षु के विकास से पूर्व घर्म/गरमी उत्पन्न होती है जिसमें रुचि/दीप्ति उत्पन्न करना अध्वर्यु का कर्तव्य है। चक्षु रूपी प्रकाश के उत्पन्न होने के पश्चात् इस ज्योति को आकाश में प्रतिष्ठित करना होता है। अध्वर्यु यजमान रूपी सूर्य के तेज का क्रमशः विकास करता है। उस सूर्य को आकाश में विचरण करने योग्य, पतन रहित, १२ मास के १२ सूर्यों और १३वें मास के सूर्य को धारण करने वाला, चन्द्रमा, नक्षत्रों और ऋतुओं को धारण करने वाला बनाता है(अपश्यं गोपामनिपद्यमानं इत्यादि तैत्तिरीय आरण्यक ४.७.१ तथा ५.६.११)।

     प्राणापानौ के अध्वर्यु-द्वय होने के उपरोक्त वर्णन के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद २.१४ आदि सूक्तों में अध्वर्यु शब्द का प्रयोग बहुवचन में हुआ है। सायण भाष्य में अध्वर्यवः शब्द की व्याख्या यज्ञ के १० चमसाध्वर्युओं के द्वारा की गई है जो यज्ञ में ऋत्विजों के पात्रों का मार्जन आदि कर्म करते हैं। दूसरी संभावना यह है कि अध्वर्यु ऋत्विज के सहायकों के रूप में प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा और उन्नेता ऋत्विजों का नाम आता है। वह अध्वर्यवः हो सकते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में जब भी अध्वर्यु-द्वय(अध्वर्यू) शब्द की व्याख्या करनी होती तो वह अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता द्वारा की जाती है।प्रतिप्रस्थाता में कुछ आसुरी पक्ष होता है(काठक संहिता २७.५)। वह यजमान-पत्नी के साथ गार्हपत्य अग्नि पर रहता है, जबकि अध्वर्यु यजमान के साथ आहवनीय अग्नि पर बैठता है। अध्वर्यु का कार्य जहां यजमान रूपी सूर्य को आकाश में प्रतिष्ठित करना होता है, प्रतिप्रस्थाता का कार्य यजमान-पत्नी को १० दिशाओं में व्याप्त होने वाली बनाना होता है। तैत्तिरीय आरण्यक में प्रवर्ग्य कर्म के अन्तर्गत वर्णन आता है कि यज्ञ की वेदी रूपी यजमान-पत्नी विस्तीर्ण चेतना को प्राप्त करके उत्तरवेदी बन जाती है। यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद ६.४१.२ तथा ८.४.११ ऋचाओं की व्याख्या सायण भाष्य में अध्वर्यु के हविर्धान स्थान से उत्तरवेदी को जाने के द्वारा की गई है। पुराणों में यजमान रूपी सूर्य और यजमान-पत्नी रूपी वडवा के उत्तरवेदी में पहुंचने पर अश्विनौ के जन्म का सार्वत्रिक वर्णन आता है। ब्राह्मण ग्रन्थों जैसे शतपथ ब्राह्मण ४.१.५.१५ व १२.८.२.२२, जैमिनीय ब्राह्मण ३.३७४ तथा ऋग्वेद १०.४१.३ व १०.५२.२ में अश्विनौ को देवताओं के अध्वर्यु-द्वय कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण आदि में च्यवन-सुकन्या आख्यान द्वारा यह भी वर्णन किया गया है कि अश्विनौ देवताओं के अध्वर्यु कैसे बने। ऋग्वेद १०.४१.३ की ऋचा में अश्विनौ को मधु पाणि वाला कहा गया है जो देवताओं को सोम प्रस्तुत करते हैं। तैत्तिरीय संहिता ६.४.३.१ के अनुसार ऐसे अध्वर्यु का चुनाव करना चाहिए जो सब देवताओं को सोम प्रस्तुत कर सके। इस प्रकार अध्वर्यु हृदे त्वा इत्यादि मन्त्र से मनुष्यों को, मनसे त्वा इत्यादि से पितरों को तथा दिवे त्वा सूर्याय त्वा इत्यादि मन्त्र से देवों को सोम प्रस्तुत करता है। इस प्रकार अध्वर्यु के तीन रूप हैं जिनमें देव रूप अश्विनौ के माध्यम से स्पष्ट हो जाता है। मन से पितरों को प्रस्तुति के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण १.५.१.२१ आदि में अध्वर्यु को मन कहा गया है। इसके अतिरिक्त, यज्ञ कर्म में अध्वर्यु बहुत से कार्य मन से करता है(उदाहरण के लिए, आश्वलायन श्रौत सूत्र ८.१३.२०)। शतपथ ब्राह्मण ४.६.७.२० के अनुसार मन अध्वर्यु पुर की भांति विचरण करता है। हो सकता है कि यह पुराणों में अग्निष्टोम यज्ञ में पुलस्त्य(पुरस्त्यान, पुर का विस्तार) ऋषि को अध्वर्यु बनाने की व्याख्या हो। पुराणों में पुलस्त्य ऋषि की उत्पत्ति उदान प्राण से होने के तथ्य को भी व्याख्या करते समय ध्यान में रखना आवश्यक है।

     मनुष्य कोटि के अध्वर्यु के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण १.८.१.२७ में कहा गया है कि जो गौ का वत्स बनना जानता है, वह दैविक अध्वर्यु है, अन्य अध्वर्यु मानुषी हैं। कर्मकाण्ड में अध्वर्यु सोम विक्रयी से गौ के बदले सोमलता का क्रय करता है(शतपथ ब्राह्मण ३.३.३.३ तथा तैत्तिरीय संहिता ६.१.१०.१)। सोमविक्रयी अपने सोम की महिमा का वर्णन करने में असमर्थ होता है, जबकि अध्वर्यु को गौ के अंग-अंग की महिमा का ज्ञान होता है जिसका वह सोमविक्रयी को लालच देता है। अन्त में अध्वर्यु सोम भी प्राप्त कर लेता है और गौ भी अपने और यजमान के लिए रख लेता है। शतपथ ब्राह्मण १४.३.१.३३ में प्रवर्ग्य् कर्म की दक्षिणा के रूप में अध्वर्यु द्वारा घर्मदुघा(गौ) प्राप्त करने का उल्लेख है। यह ध्यान देने योग्य है कि पुराणों में अध्वर्युओं के रूप में जिन ऋषियों का नाम आया है, उनमें जमदग्नि, वसिष्ठ और गौतम गौ रखने वाले हैं, जबकि विश्वामित्र गौ प्राप्ति का यत्न करते हैं। गौ के वत्स का कार्य गौ को पयःदान के लिए केवल प्रेरित करना होता है। पयः का उपयोग यजमान आदि यज्ञ कार्य में करते हैं। कर्मकाण्ड में ओ श्रावय बोलकर विराज गौ का आह्वान करते हैं, अस्तु श्रौषट् से वत्स के बन्धन खोलते हैं, यज से स्तनों को वत्स के मुख में देते हैं आदि आदि। इस वाक्य समूह में ओ(ओम) श्रावय तथा यज यह आदेश अध्वर्यु के लिए होता है जिससे वह पुरोवात(ओ श्रावय) और विद्युत(यज) का मन से ध्यान करता है। अन्य आदेश अन्य ऋत्विजों के लिए होते हैं(शतपथ ब्राह्मण १.५.२.१९, ३.३.७.३ तथा काण्व शतपथ २.४.४.९)। जब विद्युत उत्पन्न होती है तो यह अभ्र/बादलों और पुरोवात का एकीकरण कर देती है। अन्त में वषट्कार बोलने पर वर्षा होती है। ऋग्वेद ७.१०३.८ में अध्वर्युओं की तुलना मण्डूकों से की गई है जो घर्म से पीडित होकर वर्षा की कामना करते रहते हैं।

     अध्वर्यु के उल्लेखनीय कार्यों में से एक है दिव्य जल या सोम को ग्रहों/पात्रों में ग्रहण करना, उसका मार्जन करना और उसे यजमान के लिए प्रस्तुत करना(ऋग्वेद सूक्त २.१४ व १०.३०, १.१३५.६, ३.४६.५, ८.२४.१६, शतपथ ब्राह्मण १.३.३.१, २.६.१.१४, ३.५.२.४ तथा १३.२.७.१)। सोम को छानने वाली छलनी पवित्र के संदर्भ में आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १९.६.८ में उल्लेख है कि अध्वर्यु का पवित्र अज और अवि के लोमों से बना होता है, जबकि प्रतिप्रस्थाता का गौ और अश्व के लोमों से। अध्वर्यु पयः को छानता है, जबकि प्रतिप्रस्थाता सुरा को। ऐसा अनुमान है कि अध्वर्यु सोम को छानने का कार्य प्राणों अथवा वायुओं द्वारा करता है। ऋग्वेद २.१४ सूक्त की १२ ऋचाओं में इन्द्र द्वारा विभिन्न शत्रुओं के निग्रह के उल्लेखों के साथ-साथ अध्वर्युओं से भी इन्द्र के लिए सोम का सिंचन करने का अनुरोध किया गया है जिसका अर्थ होगा कि ब्राह्मण अध्वर्यु और क्षत्र इन्द्र दोनों को सोम प्रदान करने और ग्रहण करने के लिए तैयारी करनी पडती है।

     शतपथ ब्राह्मण ५.३.४.४ में राजसूय यज्ञ में यजमान के अभिषेक हेतु अध्वर्यु द्वारा आपः/जल की १६ प्रकार की ऊर्मियों के संग्रह का वर्णन है। उनके द्वारा वह यजमान का अभिषेक करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन ऊर्मि वाले जलों का सम्बन्ध ऋग्वेद १०.३० के सूक्त से है।

     अध्वर्यु की प्रकृति के बारे में कुछ प्रकाश होता और अध्वर्यु के सम्बन्धों के वर्णन से मिलता है। शतपथ ब्राह्मण १३.५.२.१२ में होता अध्वर्यु से पूछता है कि एकाकी विचरण कौन करता है? अध्वर्यु उत्तर देता है कि सूर्य एकाकी विचरण करता है। फिर अध्वर्यु होता से प्रश्न करता है कि सूर्य समान ज्योति कौन सी है? होता उत्तर देता है कि ब्रह्म ही सूर्य समान ज्योति है, इत्यादि। तैत्तिरीय संहिता ६.३.१.५ में होता को यज्ञ की नाभि कहा गया है।

     स्कन्द पुराण में त्रिशंकु के यज्ञ में विश्वामित्र के अध्वर्यु होने के संदर्भ में ऐसा कहा जा सकता है कि अध्वर्यु-द्वय का स्वरूप प्रायः प्राणापानौ का होता है जहां अपान का कार्य दुर्गुणों को, मल को निकाल फेंकने का है। शतपथ ब्राह्मण ५.५.१.११ में प्राणोदानौ को मित्रावरुण और अध्वर्यु-द्वय कहा गया है। ऋग्वेद ३.५.४ में उल्लेख है कि इषिर और दमूना(?) बनने पर अध्वर्यु सिन्धुओं और पर्वतों का मित्र हो जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि उदान प्राण का विकास होने पर अध्वर्यु मित्र/विश्वामित्र बन जाता है। पुराणों में अध्वर्यु के रूप में प्रायः भृगु का उल्लेख आया है। जमदग्नि भी भार्गव गोत्रीय हैं। भृगु अर्थात् भून देने वाला, हमारे कर्मों को जला डालने वाला। भृगु की उत्पत्ति के संदर्भ में ब्राह्मण ग्रन्थों में उल्लेख आता है कि प्रजापत से उत्पन्न पहली ज्वाला तो आदित्य बन गई, दूसरी भृगु बनी और तीसरी अंगार/अग्नि। जैमिनीय ब्राह्मण ३.१८८ में गौर आंगिरस के अध्वर्यु होने का उल्लेख है। गोपथ ब्राह्मण १.२.९ का कथन है कि अग्नि, आदित्य और यम यह अङ्गिरस हैं। यह इदं सर्वं का समाप्नुवन करते हैं। दूसरी ोर, वायु, आपः व चन्द्रमा भार्गव हैं। यह इदं सर्वं का समाप्यायन करते हैं। पुराणों में भृगु ऋषि द्वारा सोते हुए विष्णु के वक्ष पर पदाघात करने और विष्णु द्वारा भृगु के पद को अपने हृदय में धारण करने का वर्णन आता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णन आता है कि जितने स्थान में विष्णु लेटकर सो गए, वह स्थान देवताओं के यज्ञ की वेदी हो गया। शेष स्थान असुरों को मिला। बाद में विष्णु ने अपने शरीर का विस्तार कर लिया और उन्होंने सारी पृथिवी को व्याप्त कर लिया। शतपथ ब्राह्मण ३.५.३.२१ में दक्षिण हविर्धान को टेक लगाते समय अध्वर्यु जिस मन्त्र का पाठ करता है, उसमें भी विष्णु के तीन उरुक्रमों का उल्लेख है। अतः यह विचारणीय है कि भृगु ऋषि विष्णु को यज्ञ रूपी वेदी का विस्तार करने के लिए किस प्रकार प्रेरित करते हैं।

     ब्राह्मण ग्रन्थों में अध्वर्युओं के जिन नामों का उल्लेख आया है, वह इस प्रकार हैं : ऐतरेय ब्राह्मण ७.१६ में हरिश्चन्द्र के राजसूय यज्ञ में जमदग्नि अध्वर्यु हैं तथा विश्वामित्र होता। अथर्ववेद १८.४.१५ में प्रेत कर्म के संदर्भ में अग्नि होता और बृहस्पति अध्वर्यु का उल्लेख है। जैमिनीय ब्राह्मण १.३६३ में सोमप्रख्य गृहपतियों के सत्र में शितिबाहु ऐषकृत अध्वर्यु थे। जैमिनीय ब्राह्मण ३.२३४ में मेधातिथि गृहपतियों के सत्र में सनक-नवक-द्वय अध्वर्यु थे। शतपथ ब्राह्मण ११.४.२.१७ में अयःस्थूण गृहपतियों के सत्र में शौल्बायन अध्वर्यु थे।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

अध्वा

टिप्पणी : अध्वा मार्ग को कहते हैं। ऋग्वेद ३.३०.१२ में सूर्य के गमन मार्ग को अध्वा कहा गया है। वेदों के विभिन्न मन्त्रों में विभिन्न देवों, विशेषकर अग्नि से अध्वा को सुगमता से पार कर लेने की प्रार्थना की गई है। अग्नि इस अध्वा पथ को अच्छी तरह जानता है(ऋग्वेद ६.१६.३)। ऋग्वेद ८.३१.११ में पूषा देवता से इस उरु अध्वा में स्वस्ति के लिए धन आदि लाने की प्रार्थना की गई है। इस अध्वा को या तो रथ पर बैठकर पार किया जा सकता है(ऋग्वेद १०.५१.६) अथवा अश्व द्वारा। यह पथ कौन सा है, यह पुराण में ६ अध्वों के रूप में स्पष्ट किया गया है। यज्ञ में अध्वर्यु नामक ऋत्विज का लक्ष्य यजमान को अध्वा के पार कराना है, ऐसा प्रतीत होता है। अध्वर्यु को  षड्-विंश ब्राह्मण २.७ आदि में अपान कहा गया है। अतः यह कल्पना कर सकते हैं कि प्राण रूप में जो शक्ति प्राप्त हुई है, उसका जीवन रूपी यज्ञ में, अध्वा में सम्यक् उपयोग करने का, उसे अपान बनाने का, यज्ञ से असुरों को निकाल बाहर करने का कार्य अध्वर्यु का है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

              

 

 

 

अध्वर

टिप्पणी : जिस यज्ञ में असुरों की हिंसा की आवश्यकता न रह गई हो, उसे अध्वर कहते हैं। - फतहसिंह

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

अध्वर्यु

टिप्पणी : उणादि कोश के अनुसार अध्वर्यु का अर्थ होता है अध्वर से जोडने वाला। यज्ञ कर्म में अध्वर्यु ऋत्विज के महत्त्व को समझने के संदर्भ में प्राणाग्निहोत्र उपनिषद ४ में उल्लेख है कि आध्यात्मिक यज्ञ में आत्मा यजमान है और अहंकार अध्वर्यु है लेकिन इस कथन की वैदिक साहित्य में अन्यत्र पुनरुक्ति नहीं हुई है। संभवतः शतपथ ब्राह्मण ३.७.१.३० में अध्वर्यु द्वारा यूप शकल की आहुति के द्वारा अहंकार की व्याख्या की जा सकती है। शतपथ ब्राह्मण १.५.१.२१, ४.६.७.२० तथा १२.१.१.४ में अध्वर्यु को मन कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण ११.२.७.३२ के अनुसार यजमान संवत्सर है जिसका ऋतु रूपी ऋत्विज यजन करते हैं। इन ऋतुओं में ग्रीष्म ऋतु अध्वर्यु है। वह यजमान का तापन करती है। बृहदारण्यक उपनिषद ३.१.४ के अनुसार चक्षु अध्वर्यु है जिसकी सहायता से यजमान अहोरात्र की आप्ति से मुक्त होता है। चक्षु रूपी अध्वर्यु ही आकाश का आदित्य है। तैत्तिरीय आरण्यक १०.६४.१ तथा गोपथ ब्राह्मण २.५.४ के अनुसार आत्मा यजमान है, श्रद्धा पत्नी, - - - - चक्षु अध्वर्यु, मन ब्रह्मा इत्यादि। षड्-विंश ब्राह्मण २.५.२ में तीन सवनों में अध्वर्यु के तीन रूप कहे गए हैं। प्रातः, माध्यन्दिन और सायं सवनों में यजमान क्रमशःप्राण, अपान और उदान रूप है जबकि अध्वर्यु क्रमशः आदित्य, चक्षु व अपान का रूप है। तैत्तिरीय आरण्यक ३.२.१ में चार, पांच, छह और सात होताओं के अन्तर्गत क्रमशः द्यौ, अश्विनौ, वात और सत्यहवि को अध्वर्यु कहा गया है। गोपथ ब्राह्मण १.१.१३ तथा १.२.२४ में प्रजापति के यज्ञ में वायु को अध्वर्यु कहा गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.३.९.१२ के अनुसार यज्ञ का अध्वर्यु होने का अधिकारी वह है जो यज्ञ को जोड सकता हो। वात द्वारा अध्वर्यु यज्ञ को जोड सकता है(प्रयुंक्ते)।

     अध्वर्यु को चक्षु कहने का तात्पर्य कर्मकाण्ड में अध्वर्यु द्वारा दो बैलों(अनड्वान्) की अनः/शकट पर सोमलता को लादकर वेदीस्थल तक लाने के प्रकरण से समझा जा सकता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.३.७.५ के अनुसार जैसे अनः या रथ को जोडते हैं, ऐसे ही अध्वर्यु यज्ञ को जोडता है। अथर्ववेद ७.५५.५ तथा ११.६.१३ के अनुसार अनड्वान प्राण को कहते हैं जिसके दो रूप होते हैं प्राण और अपान। यही गाडी के दो बैल हैं। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.९.३ तथा गोपथ ब्राह्मण १.२.११ के अनुसार प्राणापानौ अध्वर्यु-द्वय हैं। शतपथ ब्राह्मण ४.२.५.३, ५.५.१.११ तथा १२.७.३.२२ के अनुसार प्राणोदानौ(प्राण-उदान) अध्वर्यु-द्वय हैं। पुराणों में शिव के गण नन्दी को भी अनड्वान कहा जाता है। नन्दी की प्रकृति भी यही है कि वह एक भी है, दो भी। यह श्वास-प्रश्वास का रूप है जो साधना के एक स्तर पर पहुंचने पर आनन्द उत्पन्न करने लगता है अन्दर जाता हुआ श्वास भी आनन्द देता है, बाहर निकलता हुआ श्वास भी। ऋग्वेद ८.२४.१६ में इसे मधु कहा गया है जिसकी प्राप्ति अध्वर्यु अन्धस् सोम से करता है। जैसा कि अन्तरिक्ष शब्द की टिप्पणी में कहा गया है, प्राण का आयतन अन्तरिक्ष होता है क्योंकि वायु अन्तरिक्ष में ही होती है। शरीर में अन्तरिक्ष का सर्वोच्च स्थान भ्रूमध्य होता है। यह ॐ रूपी वायु है, तीसरा चक्षु है। इसके विकसित होने पर अन्तरिक्ष अन्धकारमय नहीं रहता, अपितु ज्योति से पूर्ण हो जाता है। जैमिनीय ब्राह्मण २.२०२ तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण १.८.२.३ के अनुसार अग्निष्टोम यज्ञ में अध्वर्यु को दक्षिणा स्वरूप प्रकाश-द्वय मिलते हैं। यह प्रकाश-द्वय चक्षु-द्वय के सूर्य और चन्द्रमा रूप हो सकते हैं। अथर्ववेद ७.७.७.५, तैत्तिरीय आरण्यक ५.५.३ तथा शतपथ ब्राह्मण १४.१.३.३३ में प्रवर्ग्य कर्म के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि चक्षु के विकास से पूर्व घर्म/गरमी उत्पन्न होती है जिसमें रुचि/दीप्ति उत्पन्न करना अध्वर्यु का कर्तव्य है। चक्षु रूपी प्रकाश के उत्पन्न होने के पश्चात् इस ज्योति को आकाश में प्रतिष्ठित करना होता है। अध्वर्यु यजमान रूपी सूर्य के तेज का क्रमशः विकास करता है। उस सूर्य को आकाश में विचरण करने योग्य, पतन रहित, १२ मास के १२ सूर्यों और १३वें मास के सूर्य को धारण करने वाला, चन्द्रमा, नक्षत्रों और ऋतुओं को धारण करने वाला बनाता है(अपश्यं गोपामनिपद्यमानं इत्यादि तैत्तिरीय आरण्यक ४.७.१ तथा ५.६.११)।

     प्राणापानौ के अध्वर्यु-द्वय होने के उपरोक्त वर्णन के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद २.१४ आदि सूक्तों में अध्वर्यु शब्द का प्रयोग बहुवचन में हुआ है। सायण भाष्य में अध्वर्यवः शब्द की व्याख्या यज्ञ के १० चमसाध्वर्युओं के द्वारा की गई है जो यज्ञ में ऋत्विजों के पात्रों का मार्जन आदि कर्म करते हैं। दूसरी संभावना यह है कि अध्वर्यु ऋत्विज के सहायकों के रूप में प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा और उन्नेता ऋत्विजों का नाम आता है। वह अध्वर्यवः हो सकते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में जब भी अध्वर्यु-द्वय(अध्वर्यू) शब्द की व्याख्या करनी होती तो वह अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता द्वारा की जाती है।प्रतिप्रस्थाता में कुछ आसुरी पक्ष होता है(काठक संहिता २७.५)। वह यजमान-पत्नी के साथ गार्हपत्य अग्नि पर रहता है, जबकि अध्वर्यु यजमान के साथ आहवनीय अग्नि पर बैठता है। अध्वर्यु का कार्य जहां यजमान रूपी सूर्य को आकाश में प्रतिष्ठित करना होता है, प्रतिप्रस्थाता का कार्य यजमान-पत्नी को १० दिशाओं में व्याप्त होने वाली बनाना होता है। तैत्तिरीय आरण्यक में प्रवर्ग्य कर्म के अन्तर्गत वर्णन आता है कि यज्ञ की वेदी रूपी यजमान-पत्नी विस्तीर्ण चेतना को प्राप्त करके उत्तरवेदी बन जाती है। यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद ६.४१.२ तथा ८.४.११ ऋचाओं की व्याख्या सायण भाष्य में अध्वर्यु के हविर्धान स्थान से उत्तरवेदी को जाने के द्वारा की गई है। पुराणों में यजमान रूपी सूर्य और यजमान-पत्नी रूपी वडवा के उत्तरवेदी में पहुंचने पर अश्विनौ के जन्म का सार्वत्रिक वर्णन आता है। ब्राह्मण ग्रन्थों जैसे शतपथ ब्राह्मण ४.१.५.१५ व १२.८.२.२२, जैमिनीय ब्राह्मण ३.३७४ तथा ऋग्वेद १०.४१.३ व १०.५२.२ में अश्विनौ को देवताओं के अध्वर्यु-द्वय कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण आदि में च्यवन-सुकन्या आख्यान द्वारा यह भी वर्णन किया गया है कि अश्विनौ देवताओं के अध्वर्यु कैसे बने। ऋग्वेद १०.४१.३ की ऋचा में अश्विनौ को मधु पाणि वाला कहा गया है जो देवताओं को सोम प्रस्तुत करते हैं। तैत्तिरीय संहिता ६.४.३.१ के अनुसार ऐसे अध्वर्यु का चुनाव करना चाहिए जो सब देवताओं को सोम प्रस्तुत कर सके। इस प्रकार अध्वर्यु हृदे त्वा इत्यादि मन्त्र से मनुष्यों को, मनसे त्वा इत्यादि से पितरों को तथा दिवे त्वा सूर्याय त्वा इत्यादि मन्त्र से देवों को सोम प्रस्तुत करता है। इस प्रकार अध्वर्यु के तीन रूप हैं जिनमें देव रूप अश्विनौ के माध्यम से स्पष्ट हो जाता है। मन से पितरों को प्रस्तुति के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण १.५.१.२१ आदि में अध्वर्यु को मन कहा गया है। इसके अतिरिक्त, यज्ञ कर्म में अध्वर्यु बहुत से कार्य मन से करता है(उदाहरण के लिए, आश्वलायन श्रौत सूत्र ८.१३.२०)। शतपथ ब्राह्मण ४.६.७.२० के अनुसार मन अध्वर्यु पुर की भांति विचरण करता है। हो सकता है कि यह पुराणों में अग्निष्टोम यज्ञ में पुलस्त्य(पुरस्त्यान, पुर का विस्तार) ऋषि को अध्वर्यु बनाने की व्याख्या हो। पुराणों में पुलस्त्य ऋषि की उत्पत्ति उदान प्राण से होने के तथ्य को भी व्याख्या करते समय ध्यान में रखना आवश्यक है।

     मनुष्य कोटि के अध्वर्यु के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण १.८.१.२७ में कहा गया है कि जो गौ का वत्स बनना जानता है, वह दैविक अध्वर्यु है, अन्य अध्वर्यु मानुषी हैं। कर्मकाण्ड में अध्वर्यु सोम विक्रयी से गौ के बदले सोमलता का क्रय करता है(शतपथ ब्राह्मण ३.३.३.३ तथा तैत्तिरीय संहिता ६.१.१०.१)। सोमविक्रयी अपने सोम की महिमा का वर्णन करने में असमर्थ होता है, जबकि अध्वर्यु को गौ के अंग-अंग की महिमा का ज्ञान होता है जिसका वह सोमविक्रयी को लालच देता है। अन्त में अध्वर्यु सोम भी प्राप्त कर लेता है और गौ भी अपने और यजमान के लिए रख लेता है। शतपथ ब्राह्मण १४.३.१.३३ में प्रवर्ग्य् कर्म की दक्षिणा के रूप में अध्वर्यु द्वारा घर्मदुघा(गौ) प्राप्त करने का उल्लेख है। यह ध्यान देने योग्य है कि पुराणों में अध्वर्युओं के रूप में जिन ऋषियों का नाम आया है, उनमें जमदग्नि, वसिष्ठ और गौतम गौ रखने वाले हैं, जबकि विश्वामित्र गौ प्राप्ति का यत्न करते हैं। गौ के वत्स का कार्य गौ को पयःदान के लिए केवल प्रेरित करना होता है। पयः का उपयोग यजमान आदि यज्ञ कार्य में करते हैं। कर्मकाण्ड में ओ श्रावय बोलकर विराज गौ का आह्वान करते हैं, अस्तु श्रौषट् से वत्स के बन्धन खोलते हैं, यज से स्तनों को वत्स के मुख में देते हैं आदि आदि। इस वाक्य समूह में ओ(ओम) श्रावय तथा यज यह आदेश अध्वर्यु के लिए होता है जिससे वह पुरोवात(ओ श्रावय) और विद्युत(यज) का मन से ध्यान करता है। अन्य आदेश अन्य ऋत्विजों के लिए होते हैं(शतपथ ब्राह्मण १.५.२.१९, ३.३.७.३ तथा काण्व शतपथ २.४.४.९)। जब विद्युत उत्पन्न होती है तो यह अभ्र/बादलों और पुरोवात का एकीकरण कर देती है। अन्त में वषट्कार बोलने पर वर्षा होती है। ऋग्वेद ७.१०३.८ में अध्वर्युओं की तुलना मण्डूकों से की गई है जो घर्म से पीडित होकर वर्षा की कामना करते रहते हैं।

     अध्वर्यु के उल्लेखनीय कार्यों में से एक है दिव्य जल या सोम को ग्रहों/पात्रों में ग्रहण करना, उसका मार्जन करना और उसे यजमान के लिए प्रस्तुत करना(ऋग्वेद सूक्त २.१४ व १०.३०, १.१३५.६, ३.४६.५, ८.२४.१६, शतपथ ब्राह्मण १.३.३.१, २.६.१.१४, ३.५.२.४ तथा १३.२.७.१)। सोम को छानने वाली छलनी पवित्र के संदर्भ में आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १९.६.८ में उल्लेख है कि अध्वर्यु का पवित्र अज और अवि के लोमों से बना होता है, जबकि प्रतिप्रस्थाता का गौ और अश्व के लोमों से। अध्वर्यु पयः को छानता है, जबकि प्रतिप्रस्थाता सुरा को। ऐसा अनुमान है कि अध्वर्यु सोम को छानने का कार्य प्राणों अथवा वायुओं द्वारा करता है। ऋग्वेद २.१४ सूक्त की १२ ऋचाओं में इन्द्र द्वारा विभिन्न शत्रुओं के निग्रह के उल्लेखों के साथ-साथ अध्वर्युओं से भी इन्द्र के लिए सोम का सिंचन करने का अनुरोध किया गया है जिसका अर्थ होगा कि ब्राह्मण अध्वर्यु और क्षत्र इन्द्र दोनों को सोम प्रदान करने और ग्रहण करने के लिए तैयारी करनी पडती है।

     शतपथ ब्राह्मण ५.३.४.४ में राजसूय यज्ञ में यजमान के अभिषेक हेतु अध्वर्यु द्वारा आपः/जल की १६ प्रकार की ऊर्मियों के संग्रह का वर्णन है। उनके द्वारा वह यजमान का अभिषेक करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन ऊर्मि वाले जलों का सम्बन्ध ऋग्वेद १०.३० के सूक्त से है।

     अध्वर्यु की प्रकृति के बारे में कुछ प्रकाश होता और अध्वर्यु के सम्बन्धों के वर्णन से मिलता है। शतपथ ब्राह्मण १३.५.२.१२ में होता अध्वर्यु से पूछता है कि एकाकी विचरण कौन करता है? अध्वर्यु उत्तर देता है कि सूर्य एकाकी विचरण करता है। फिर अध्वर्यु होता से प्रश्न करता है कि सूर्य समान ज्योति कौन सी है? होता उत्तर देता है कि ब्रह्म ही सूर्य समान ज्योति है, इत्यादि। तैत्तिरीय संहिता ६.३.१.५ में होता को यज्ञ की नाभि कहा गया है।

     स्कन्द पुराण में त्रिशंकु के यज्ञ में विश्वामित्र के अध्वर्यु होने के संदर्भ में ऐसा कहा जा सकता है कि अध्वर्यु-द्वय का स्वरूप प्रायः प्राणापानौ का होता है जहां अपान का कार्य दुर्गुणों को, मल को निकाल फेंकने का है। शतपथ ब्राह्मण ५.५.१.११ में प्राणोदानौ को मित्रावरुण और अध्वर्यु-द्वय कहा गया है। ऋग्वेद ३.५.४ में उल्लेख है कि इषिर और दमूना(?) बनने पर अध्वर्यु सिन्धुओं और पर्वतों का मित्र हो जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि उदान प्राण का विकास होने पर अध्वर्यु मित्र/विश्वामित्र बन जाता है। पुराणों में अध्वर्यु के रूप में प्रायः भृगु का उल्लेख आया है। जमदग्नि भी भार्गव गोत्रीय हैं। भृगु अर्थात् भून देने वाला, हमारे कर्मों को जला डालने वाला। भृगु की उत्पत्ति के संदर्भ में ब्राह्मण ग्रन्थों में उल्लेख आता है कि प्रजापत से उत्पन्न पहली ज्वाला तो आदित्य बन गई, दूसरी भृगु बनी और तीसरी अंगार/अग्नि। जैमिनीय ब्राह्मण ३.१८८ में गौर आंगिरस के अध्वर्यु होने का उल्लेख है। गोपथ ब्राह्मण १.२.९ का कथन है कि अग्नि, आदित्य और यम यह अङ्गिरस हैं। यह इदं सर्वं का समाप्नुवन करते हैं। दूसरी ोर, वायु, आपः व चन्द्रमा भार्गव हैं। यह इदं सर्वं का समाप्यायन करते हैं। पुराणों में भृगु ऋषि द्वारा सोते हुए विष्णु के वक्ष पर पदाघात करने और विष्णु द्वारा भृगु के पद को अपने हृदय में धारण करने का वर्णन आता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णन आता है कि जितने स्थान में विष्णु लेटकर सो गए, वह स्थान देवताओं के यज्ञ की वेदी हो गया। शेष स्थान असुरों को मिला। बाद में विष्णु ने अपने शरीर का विस्तार कर लिया और उन्होंने सारी पृथिवी को व्याप्त कर लिया। शतपथ ब्राह्मण ३.५.३.२१ में दक्षिण हविर्धान को टेक लगाते समय अध्वर्यु जिस मन्त्र का पाठ करता है, उसमें भी विष्णु के तीन उरुक्रमों का उल्लेख है। अतः यह विचारणीय है कि भृगु ऋषि विष्णु को यज्ञ रूपी वेदी का विस्तार करने के लिए किस प्रकार प्रेरित करते हैं।

     ब्राह्मण ग्रन्थों में अध्वर्युओं के जिन नामों का उल्लेख आया है, वह इस प्रकार हैं : ऐतरेय ब्राह्मण ७.१६ में हरिश्चन्द्र के राजसूय यज्ञ में जमदग्नि अध्वर्यु हैं तथा विश्वामित्र होता। अथर्ववेद १८.४.१५ में प्रेत कर्म के संदर्भ में अग्नि होता और बृहस्पति अध्वर्यु का उल्लेख है। जैमिनीय ब्राह्मण १.३६३ में सोमप्रख्य गृहपतियों के सत्र में शितिबाहु ऐषकृत अध्वर्यु थे। जैमिनीय ब्राह्मण ३.२३४ में मेधातिथि गृहपतियों के सत्र में सनक-नवक-द्वय अध्वर्यु थे। शतपथ ब्राह्मण ११.४.२.१७ में अयःस्थूण गृहपतियों के सत्र में शौल्बायन अध्वर्यु थे।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.

 

अध्वा

टिप्पणी : अध्वा मार्ग को कहते हैं। ऋग्वेद ३.३०.१२ में सूर्य के गमन मार्ग को अध्वा कहा गया है। वेदों के विभिन्न मन्त्रों में विभिन्न देवों, विशेषकर अग्नि से अध्वा को सुगमता से पार कर लेने की प्रार्थना की गई है। अग्नि इस अध्वा पथ को अच्छी तरह जानता है(ऋग्वेद ६.१६.३)। ऋग्वेद ८.३१.११ में पूषा देवता से इस उरु अध्वा में स्वस्ति के लिए धन आदि लाने की प्रार्थना की गई है। इस अध्वा को या तो रथ पर बैठकर पार किया जा सकता है(ऋग्वेद १०.५१.६) अथवा अश्व द्वारा। यह पथ कौन सा है, यह पुराण में ६ अध्वों के रूप में स्पष्ट किया गया है। यज्ञ में अध्वर्यु नामक ऋत्विज का लक्ष्य यजमान को अध्वा के पार कराना है, ऐसा प्रतीत होता है। अध्वर्यु को  षड्-विंश ब्राह्मण २.७ आदि में अपान कहा गया है। अतः यह कल्पना कर सकते हैं कि प्राण रूप में जो शक्ति प्राप्त हुई है, उसका जीवन रूपी यज्ञ में, अध्वा में सम्यक् उपयोग करने का, उसे अपान बनाने का, यज्ञ से असुरों को निकाल बाहर करने का कार्य अध्वर्यु का है।

प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई.